मानवीय मुक्ति का सौन्दर्यबोध पैदा करती हैं दलित कहानियां
मानवीय मुक्ति का सौन्दर्यबोध पैदा करती हैं दलित
कहानियां
डॉ. प्रवीण कुमार
सौन्दर्यबोध ‘पदबंध’ का संबंध एक मानवीय विकास की प्रक्रिया से है। जैसे-जैसे मनुष्य की चेतना आकार ग्रहण करती गई उनके सौन्दर्यबोध ने वैसा ही स्वरूप अख्तियार किया है। एक ही व्यक्ति और समाज में समय-सापेक्ष सौन्दर्यबोध को परिवर्तित होता हुआ देखा जा सकता है। चूंकि यह परिवर्तन चेतना और चैतन्य अवस्था से विकसित विचार-मूल्यों एवं विचारधारा की सम्बद्धता से होता है। इसीलिए सौन्दर्यबोध का सम्बंध विचार-मूल्य एवं जीवन-मूल्य से सम्बद्ध है जोकि किसी भी रचना-कलाकृति में व्यक्त सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनागत संस्थाओं के बीच निर्मित मनुष्य की वैचारिकी की उपज होता है। जिसका लक्ष्य मानवीय मुक्ति चेतना को पैदा करना है। यही कला की शक्ति की होती है। इसका संबंध किसी भी कला के सिर्फ फॉर्म(रूप) से उतना नहीं है जितना कि उसकी अंतर्वस्तु से। अंतर्वस्तु में विन्यस्त विचार-मूल्य अपने अनुरूप रूप की संरचना स्वयं तैयार कर लेता है। इसलिए सौन्दर्यबोध रचना के बाह्य रूप पर बल नहीं देता है। कलाकृति के बाह्य रूप पर जोर देना पारंपरिक सौन्दर्यशास्त्र की प्रचलित धारणाएं हैं जोकि एक तरफ सौन्दर्य को सिर्फ कला(साहित्य के अतिरिक्त कला) को ध्यान में रखकर चीजों को देखती हैं तो दूसरी तरफ सिर्फ काव्य की अनुभूति तक सीमित रहा है। गद्य साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर तो अब तक विचार ही नहीं किया गया है। जिसकी पूरी संभावना थी। खैर! यह उदासीनता एवं अभाव दोनों क्यों एवं कैसे है? यह सवाल अब मायने नहीं रखता है। इससे पूर्व हिन्दी कहानी का सौन्दर्य, कहानी का सौन्दर्य और उपन्यास का सौन्दर्यशास्त्र नामक शोध आलेख में इस पर विचार किया गया है। इसी कड़ी में दलित कहानी के माध्यम से दलित कहानी के सौन्दर्यबोध पर विचार किया जा रहा है।
दलित
साहित्य जिस ऐतिहासिक सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन का प्रतिफलन है। वह हजारों वर्षों
से ‘मानवीय मूल्यों’ के लिए किए गए संघर्षों-आंदोलनों तथा
वंचना-उपेक्षा-अपमान-तिरस्कार आदि के बरक्स समता, स्वतंत्रता, मैत्री,
बंधुत्व, गरिमा,
न्याय आदि हेतु(वर्णजाति
आधारित सांस्कृतिक व्यवस्था,
असमानता, विषमता के विरूद्ध)सचेतना पैदा करता है। यह बोध ही
वर्णजाति आधारित असमानतापरक,
विषमतापरक, सामाजिक व्यवस्था, मानसिकता, प्रवृत्तियों आदि के विरूद्ध चेतना जाग्रत करता है।
उसके खिलाफ संघर्ष, आंदोलन और संवैधानिक प्रावधानों को
गतिशीलता प्रदान करता है। इस वैचारिक चेतना का आधार डॉ. अम्बेडकर, जोतिबाफुले,
सावित्रीबाई फुले, और बुद्ध का चिंतन, दर्शन
और आंदोलन है। यही दलित साहित्य की विचारधारा है जो उसके सौन्दर्यबोध को नई दिशा
देती है। यूं कह सकते हैं कि कथा साहित्य में विचार-मूल्य ही उसके सौन्दर्यबोध को
निर्धारित करता है। यही विचारमूल्य रचना,
रचना-प्रक्रिया के
साथ-साथ रचनाकार के सौन्दर्यबोध को भी रेखांकित करता है। इस शोध में दलित कहानी के
माध्यम से उसके सौन्दर्यबोध को समझने का प्रयास है।
कहानी
के सौन्दर्यबोध को उसकी संवेदना और विकास-प्रक्रिया के क्रम में ही समझा जा सकता
है। मानव की विकास यात्र में ही लोकसंस्कृति की मान्यताओं और उसमें निहित मूल्यों
की संस्कृति का भी विकास हुआ है। प्रतिरोध की संस्कृति के बीच ही दलित कहानी के
उदय को भी देखा जा सकता है। लोक में व्याप्त लोककथा और लोकगाथा से ही कहानी की
पूरी परंपरा समृद्ध होती है। यूं कह सकते हैं कि कहानी कहने की परंपरा लोक में
व्याप्त लोककथा या लोकगाथा से शुरू होती है। लोक में व्याप्त गाथाओं में निहित
जीवनमूल्यों का ही सौन्दर्य ही इन कहानियों का सौन्दर्य है। भारत में
लोककथा/लोकगाथा की परंपरा बहुत ही समृद्ध रही है। मौखिक परंपरा में यह अविरल धारा
के रूप में प्रवाहमान रही है। तत्पश्चात लिखित रूप में कहानी का उद्भव एवं विकास
को समझा जा सकता है। जिसमें जीवन का खुरदुरापन है, अनगढ़पन
है, संघर्ष है, जीवन
की कटुता है, मिठास भी है, रंग है,
रोगन है। धूल है, फूल है। सतत संघर्षशील जीवन का यथार्थ है। उस यथार्थ
की प्रामाणिकता है, अनुभूति है और उस अनुभूति की शिला पर
खिलखिलाते पुष्प की जीवंतता है। उसका मुरझायापन भी है। इन्हीं वृत्तियों में सृजित
सौन्दर्यबोध दलित कहानियों में देखने को मिलता है।
शिक्षा, शास्त्र और समाज से बहिष्कृत, वंचित समाज एवं जनसमूह की मानसिक अभिव्यक्ति का माध्यम
लोककथाएं ही रहीं हैं जो प्रभुत्वशाली शक्ति व सत्ता के विरूद्ध चुनौती देती रही
है। लोककथाएं, लोकस्मृतियां लोकमानस की प्रवृत्तियों को
पुष्ट करती हैं। वर्ण-व्यवस्था तथा शोषण के विभिन्न औजारों और जड़ मानसिकताओं के
विरूद्ध लोक में प्रतिरोध की परंपरा का प्रामाणिक इतिहास लिखा जा रहा और अभी लिखा
जाना बाकी है। दलित आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि चार्वाक, माखली गोशाल, बुद्ध, रैदास,
कबीर एवं अन्य संत
कवियों, फुले, बिरसा मुंडा, पेरियार और डॉ.
अम्बेडकर से तैयार होती है। इतने लंबे पड़ावों के बीच दलित जनमानस द्वारा लोक में
वर्चस्व के विरूद्ध चेतना का भाव मिलता है। कहानी से पहले की कहानी की परंपरा रही
है यह दीगर बात है कि उसका फॉर्म अलग रहा है। दलित वर्ग में शिक्षा और शिक्षा से
आई चेतना ने कहानी लेखन के तेवर को बदला है और इस तेवर को ऊंचाई दी है समतावादी
दृष्टि ने। फुले-अम्बेडकरवादी विचारधारा ने कहानी को जादुई, तिलिस्मी,
भूत-प्रेत, अंधविश्वासों और कर्मकांडों से मुक्त किया है। दलितों
की छवि को विद्रूप बनाने वाली कहावतों,
लोकोक्तियों आदि को झूठा
साबित किया है दलित विमर्श ने। इस संदर्भ में आधुनिक हिन्दी दलित कहानी का तेवर और
सरोकार बिलकुल स्पष्ट है। असमानता और अन्याय का पुरजोर विरोध और उसका खात्मा दलित
कहानियों की विषय-वस्तु है। लोककथा में रचे गए मिथकों को रूपांतरित-कायांतरित कर
और उसमें नवीन अर्थबोध के साथ दलित चेतना लगातार रचनात्मक माध्यम से समतापरक और
तर्कशील-वैज्ञानिक दृष्टि से समाज निर्मित करने की ओर उन्मुख हैं।
वैसे
तो ‘‘सभी लोकगाथाओं में प्रतिरोध के तत्व किसी
न किसी रूप में अवश्य मौजूद होते हैं। परंतु जब ये लोकगाथाएं वर्गीय समाज में
शोषित जाति या वर्ग के यथार्थ और आकांक्षा के बीच जन्म लेती हैं तो इनका प्रतिरोधी
स्वर शोषित वर्ग या जाति के रोजमर्रे के संघर्ष को प्रतिध्वनित करता है।’’1 दलित कहानी ही नहीं साहित्य का उदय भी
इसी संघर्ष के बीच हुआ है। दलित साहित्य के इतिहास में पहली दलित कहानी कौन सी है।
यह बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कहानियों की वैचारिकता और उसके सरोकरों
के बीच उत्पन्न सौन्दर्यबोध। यह सौन्दर्यबोध दलित समाज की चेतना को झकझोरता है।
उनमें ज्ञानबोध पैदा करता है। यह ज्ञानबोध उन्हें अपनी स्थिति का बोध कराता है।
अहसास दिलाता है कि वह कौन है। ‘मैं कौन हूं और मेरा अधिकार क्या है’ से दलित चिंतन की प्रक्रिया शुरू होती है। दलित
कहानियां इसी प्रक्रिया और ज्ञानबोध की उपज हैं। इसी से उसका सौन्दर्यबोध भी
निर्मित हो रहा है।
हिन्दी
में अम्बेडकरवादी विचारों एवं चेतना पर आधारित दलित कहानी लेखन की परंपरा सन् 80 से माना जा सकता है। दलित लेखन में चेतना, अधिकार और आत्मसम्मान की मांग के साथ इस साहित्य
द्वारा समतामूलक समाज की ओर बढ़ना क्यों लाजिम है? इसी
बोध के साथ दलित कहानी सर्जनात्मकता में रूपांतरित होती है। चेतना की जो धारा
मराठी दलित साहित्य से शुरू हुई थी। उसका विस्तार और विकास संपूर्ण भारत में अपने
समसामयिक आंदोलनों एवं संघर्षों के साथ एकाकार करते हुए दलित साहित्य एवं विमर्श
में परिणत होती है। हिन्दी की दलित कहानियों ने पिछले चार दशक से दलित चिंतन को
अपनी विशिष्टता से काफी संवर्द्धित किया है। दलित कहानीकारों की कहानियों के
माध्यम से दलित कहानी की संवेदना और सरोकारों के विविध आयाम को समझा जा सकता
है-जहां वर्ण-व्यवस्था पर चोट,
जाति की जड़ता की शिनाख्त, धार्मिक पाखंड एवं कर्मकांड पर प्रश्न चिह्न, पितृसत्ता पर सवाल, जाति-उपजाति
के अतंर्विरोध, प्रेम तथा आतंक से लेकर पूंजीवाद, भूमंडलीकरण,
बाजारवाद और नगरीय
संस्कृति के बहुविध विषयों के माध्यम से दलित कहानी के तेवर और उसकी व्यापकता को
परखा जा सकता है।
कहानी
की कथावस्तु, विशिष्टता और सरोकारों के आलोक में भारतीय
समाज की सभ्यता-समीक्षा की जा सकती है। इन कहानीकारों की सर्जना के माध्यम से दलित
जीवन की मनोवृत्तियों,
अंतर्द्वंद्वों एवं
अंतर्विरोधों को विकासमान सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में समझा
जा सकता है। कहानियों की कथावस्तु,
विशिष्टताओं और
सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों को दलित वैचारिकी के संदर्भ में देखने की जरूरत है।
दलित कहानी की संवेदना और सरोकार भारतीय समाज में व्याप्त ब्राह्मणवादी मानसिकता
और व्यवस्था के विभिन्न रूपों के विरोध और अंत के साथ शुरू होता है। इसी संदर्भ
में अमानवीय और विषमतामूलक प्रवृत्तियों को भी समझा जा सकता है। आत्मसम्मान, मानवीय अधिकारों की प्राप्ति, जीवन-मूल्यों की स्थापना आदि के लिए संघर्ष और इन
मूल्यों के आधार पर समतामूलक समाज की स्थापना दलित कहानियों में सहज ही देखा जा
सकता है। इस स्थापना में वे स्त्री-पुरुष के सवालों को अलग नहीं मानता है और न ही
अलग देखा जा सकता है। ‘मानव’ बोध
के रूप में सभी प्रश्न एक दूसरे से अनुस्यूत है। संपूर्ण प्रक्रिया में अमानवीय
परंपरा का विरोध, संघर्ष और नई स्थापना को देखा जा सकता है।
दलित
कहानियों की रचना प्रक्रिया के बारे में मोहनदास नैमिशराय लिखते हैं कि ‘एक एक कहानी की पृष्ठभूमि में दलित होने का अहसास है।’ आजादी का स्वर दलित कहानियों में व्याप्त है। ‘आवाजे’
कहानी का यह सवांद बहुत
ही मार्मिक है, जिसमें कहा जाता है-
‘‘कौन ठाकुर...’’ ‘‘गांव में कौन ठाकुर है तुझे पता नहीं...’’ ‘न,
हमै कुछ पता नाहीं। अब
कोई किसी की ठकुराहट नइ चलती है,
सब अपने अपने घर में
आजाद हैं।’’2
इतवारी
के इस कथन में स्वाधीनता का स्वर है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान डॉ. अम्बेडकर के
संघर्ष से जो चेतना दलित समाज में फैली दलित
रचनात्मकता उसी चेतना की देन है। दलित रचनात्मकता के सौन्दर्यबोध को मोहनदास
नैमिशराय की इन पंक्तियों से समझा जा सकता हैः
‘‘अंधेरे की लकीरों में बस्ती डूबने लगी थी।
आग की चिंगारी के साथ-साथ कोलाहल भी इधर-उधर बिखर गया। लेकिन उस कोलाहल का कोई
अर्थ न था क्योंकि कोलाहल करने वाला समाज अर्थहीन था। जमीन पर रेंग रहे किसी बेजान
से कीड़ो की तरह। धीरे-धीरे कोलाहल शांत हो गया। और अब रह गया है केवल हड्डियों को
चीर देने वाला सन्नाटा। फिर सन्नाटे को चीरती हुई कुछ आवाजें सुनाई दीं। सब लोग
चौंककर उन आवाजों को सुनने लगे। रात के दूसरे पहर में जहां लोग गीली आंखें लिए आकाश
की ओर निहार रहे थे, वहीं नई पौध की आंखों में परिवर्तन के लिए
अटूट विश्वास था। कल तक जो बच्चे जूठन पर लड़ते-झगड़ते थे उनके मन में कुछ कर गुजरने
की चेतना जन्म ले चुकी थी।’’3
‘कुछ कर गुजरने की चेतना’ ने दलित समाज में परिवर्तन का आगाज किया है। पहले वह
पारंपरिक व्यवसाय और उन मान्यताओं का विरोध,
उसे तोड़ने की कोशिश, हीनताबोध से मुक्ति, गुलामी
का अहसास, आत्मसम्मान, गरिमा, मैत्री आदि हेतु दलित कहानियां न केवल चेतना पैदा करती
हैं बल्कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, न्याय,
संसदीय
लोकतंत्रिकमूल्यों एवं जीवनमूल्यों की प्राप्ति हेतु प्रेरित करती हैं। उत्प्रेरित
करती हैं। यही इन कहानियों की शक्ति है और इन्हीं शक्तियों से सौन्दर्यचेतना का
निर्माण होता है और हो रहा है जो पूर्व के ब्राह्मणवादी साहित्यिक सौन्दर्य से
भिन्न है और नए प्रतिमान स्थापति कर रही हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘सलाम’
ऐसी ही कहानी है जो ‘सलाम’
की परंपरा का विरोध ही
नहीं करती है बल्कि पारंपरिक व्यवस्था का पालन न करने की चेतना पैदा करती है।
पुरानी जड़वादी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा,
रीति-रिवाज और मानसिकता
से मुक्ति की आकांक्षा उत्पन्न करती है। दलित कहानियां इन्हीं ‘मुक्ति का सौन्दर्यबोध’ जगाती
हैं।
मानव-मुक्ति
का सौन्दर्यबोध समय-स्थान सापेक्ष है। कस्बाई और महानगरीय भारतीय संस्कृति में
रहने वाले या बस गए दलितों की समस्याओं का स्वरूप भिन्न हैं जो गांव में रहने
वालें दलितों की समस्याओं का बदला हुआ परिष्कृत रूप है। समय, स्थान और परिवेश बदलने से अपमान, घृणा,
तिरस्कार और उत्पीड़न के
रूप बदल गए हैं। लेकिन वह समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा है। दलित कहानियां ऐसी
मनोवृत्तियों के प्रति भी संवेदनशीलता पैदा करती हैं। दमन और अत्याचार के खिलाफ
आवाज उठाने के लिए जागरूक और जवाबदेह भी बनाती है। दलित कहानियों की कथावस्तु का
लगातार विस्तार हो रहा है। उसका कैनवास फैल रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘सलाम’
न केवल सलाम की प्रथा को
तोड़ती है बल्कि दलितों में चेतना पैदा कर उसे स्वाभिमान की जिंदगी जीने का हौसला
देती है। कहानी के पात्र कमल और हरिश की दोस्ती सामाजिक समीकरण को बदलती है। वह
नफरत को खत्म कर दोस्ती का भाव पैदा करती है। यह न केवल ओमप्रकाश वाल्मीकि का
सृजनात्मक सौन्दर्यबोध है बल्कि दलित साहित्यांदोलन की यह नींव और सरोकार है।
‘‘कमल उसके लिए अपना था, एकदम सगा। बल्कि अपनों से कहीं ज्यादा। इस घटना ने
हरिश के मन पर कई खरोंचें डाल दी थी।’’4 वहीं हरिश की चेतना सलाम की प्रथा को तोड़ती है। ‘‘मुझे न ऐसे कपड़े चाहिए, न
बर्तन, मैं अपरिचितों के दरवाजे सलाम पर नहीं
जाऊंगा।’’5
हरिश
ने जब-जब भी किसी दूल्हे या दुल्हन को इस तरह दरवाजे-दरवाजे घूमते देखा, उसे लगता था जैसे स्वाभिमान को चिंदी-चिंदी करके
बिखेरा जा रहा है। बाजे-गाजे के साथ घूमता दूल्हा निरीह जीव दिखाई पड़ता था। ‘दामाद हो या नई नवेली दुल्हन सलाम के लिए घर-घर जाने
का रिवाज है, जो हमने नहीं पुरखों ने बनाया है। जिसे इस
तरह छोड़ देना ठीक नहीं है। गांव में रहना है। दस जरूरतें हैं।’ जुम्मन ने जोर देकर कहा। हरीश ने तीखे शब्दों में कहा, ‘‘आप चाहे जो समझें...मैं इस रिवाज को आत्मविश्वास तोड़ने
की साजिश मानता हूं। यह सलाम की रस्म बंद होनी चाहिए।’’6 इसके बावजूद ब्राह्मणवादी मानसिकता किस
प्रकार फर्ज और कर्तव्य के बहाने आत्मविश्वास को तोड़ने का काम करती है। इसे बल्लू
रांघड़ के इस कथन से समझा जा सकता है जिसमें गांव का सामंत बोलता हैः
‘‘जुम्मन तेरा जंवाई इब तक सलाम पर क्यों
नहीं आया। तेरी बेटी का ब्याह है तो हमारा भी कुछ हक बनता है। जो नेग-दस्तुर होता
है, वो तो निभाना ही पड़ेगा। हमारी बहू-बेटियां
घर में बैठी इंतजार कर रही हैं। उसे ले के जल्दी आ जा...’’ जुम्मन का सिर पर लिपटा कपड़ा उतारकर बल्लू रांघड़ के
पांव पर रखना, उसकी चेतना की हीनता को दर्शाता है। वहीं
बल्लू रांघड़ का यह कथन दलित समाज की चेतना को कुद करता है। ‘‘तभी तो कहूं-जातकों (बच्चों) कू स्कूल ना भेज्जा करो।
स्कूल जाके कोण सा इन्हें बालिस्टर बणना है। ऊपर से इनके दिमाग चढ़ जांगे। यो न घर
के रहेंगे न घाट के। गांव की नाक तो तूने पहले ही कटवा दी जो लौंडिया कू दसवीं पास
करवा दी। क्या जरूरत थी लड़की कू पढ़ाने की,
गांव की हवा बिगाड़ रहा
है तू। इब तेरा जंवाई सलाम पे जाणे से मना कर रहा है...उसे समझा देकृ सलाम के लिए
जल्दी आवे...बल्लू ने फैसला सुनाया।’’7
जुम्मन
ने गिड़गिड़ाकर रिरियाहट भरे शब्दों में कहा,
‘‘चौधरी जी मेरी लाज रख
लोख मैं तो थारा गुलाम हूं मेरा तो जीना मरना सब कुछ थारी ही गेल है। जो कहोगे
करूंगा...बस करके बेटी कू विदा हो जाण दो। मैं थारे पांव में नाक रगड़ूं...’’ ‘‘यह संवाद सवर्ण समाज की क्रूरता और असहिष्णुता का
द्योतक है और दलितों की चिर अभ्यस्त मानसिक गुलामी का। इस संवाद में आधुनिकता-बोध
कहां है? वह है, और
कहानी की पात्र योजना में है।’’8
‘‘सभी भय से सहम गए थे।
बल्लू राघड़ के जाते ही बिदाई की तैयारी शुरू हो गई थी।’’9
निश्चय
ही यह स्थिति दलित चेतना के शक्तिशाली बनने और न बनने के द्वंद्वात्मक मिलन की है।
जिसमें एक तरफ सामंती व्यवस्था की हिंसात्मक स्थिति का तनाव है तो दूसरी तरफ उसको
तोड़ती चेतना की प्रक्रिया से उत्पन्न स्थिति है। इसे क्रमशः बल्लू का भय और ‘सन्नाटे का शोर से कमल उपाध्याय की बेचैनी एवं उनका दम
घुटना और वहीं हरीश की आंखों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान के उगते सूरज की चमक और
नीम के पेड़ पर डोलती हरी नर्म पत्तियां दलित चेतना का हौसला बांधती हैं। वहीं ‘‘मुसलमान के हाथ की बणी रोट्टी मैं नी खात्ता।’’ कहने वाले लड़के में हिन्दू मानसिकता का परिचय है। वह
दलित समाज में जन्मा जरूर है लेकिन वह दलित चेतना का प्रतीक नहीं बना है। इसका
कारण हो सकता है। सलाम की प्रथा टूटने से जो आत्मविश्वास जाग रहा था वह इन आवाजों
के बीच सांस लेने लगा। इससे यह साफ होता है कि चेतना के बिना सामाजिक समीकरण का
बनना खतरा भी है। यहां दलित के साथ मुस्लिम का समीकरण देखा जा सकता है। यदि वह
मुसलमान भी है तो लड़का ब्राह्मणवादी मानसिकता का है। यह रचना प्रक्रिया है। लेखक
की चेतना है कि वह सामाजिक समीकरण को खोलता भी है और जोड़ता भी है। पक्ष और विपक्ष
दोनों में नई चेतना का काम नए संस्कार बनाने का है। नया सौन्दर्यबोध और नया आस्वाद
निर्मित करने का है।’’10 इस प्रकार दलित कहानियां परंपरा को तोड़कर
संघर्ष की चेतना को निर्मित करने की कवायद करती हैं। एक नया समीकरण बनाने की बात
की हैं। इसी नई चेतना और नये समीकरण से भारतीय समाज का एक नया स्वरूप निर्मित हो
सकता है। जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। दलित और गैर दलित संवेदना का समन्वय है।
दलित
कहानियों में दलित और गैर दलित संवेदना के अंतःसंबंधों की बारीकी को ओमप्रकाश
वाल्मीकि के ‘सलाम’ और
मोहनदास नैमिशराय की ‘महाशूद्र’ के
माध्यम से समझा जा सकता है। दोनों कहानियों के गैर-दलित पात्र स्वयं अपने ही समाज
द्वारा अपमानित और उपेक्षित किये जाने के बाद दलित जीवन की त्रसदी को ठीक से समझ
पाते हैं। सहानुभूति को स्वानुभूति में रूपांतरित करने की यह कहानियां हैं। ‘सलाम’
के कमल उपाध्याय को दलित
अपमान और उपेक्षा का बोध तब होता है जब वह दलित दोस्त हरिश के शादी में एक चाय
वाला उसे चूहड़ा समझ कर चाय नहीं पिलाता। चाय वाला कहता है-
‘‘चूहड़ा है। खुद कू बामन बतारा है। जुम्मन
चूहड़े का बाराती है। इब तुम लोग ही फैसला करो। जो यो बामन है तो चूहड़ों की बारात
में क्या मूत पीणे आया है। जात छिपाके चाय मांग रा है।’’11 वहीं मोहनदास नैमिशराय की ‘महाशूद्र’
कहानी में आचार्य जी को
बस्ती के लोग ब्राह्मण समाज पर कलंक मानते हैं। आचार्य जी के बडे लड़के ने तो
चीख-चीख कर एक दिन कहा भी ‘‘पिताजी, अब
और नहीं सहा जाता। सारी दुनिया हम पर थू-थू करती है। हमें मुरदे की चमड़ी खींचने
वाले से लेकर कफन-खसोटू तक कहती है। वे कहते हैं कि हमारे घर का गुजारा ही तब चलता
है जब कोई मरता है। किसी के घर में अंधेरा होने पर ही हमारे घर में उजाला होता है।’’12 यह बात आचार्य जी के अंतस को छू गई।
ब्राह्मण समाज के बीच के ‘छुआछूत’ जैसे
अनुभव को भी यह कहानी व्यंजित करती है। अपने ही समाज से आचार्य जी को मिले घृणा, उपेक्षा और तिरस्कार आदि से श्मशान के संगी दलित नंदू
के प्रति अपनत्व पैदा होता है और इस अपनापा को नंदू तृप्ति भरी नजरों से देखता है।
ओमप्रकाश
वाल्मीकि की कहानी ‘जिनावर’ में
बिरजू की बहू का शोषण उसके ससुर चौधरी द्वारा होता रहा है। चौधरी की हवेली के भीतर
शोषण-दमन का चक्र किस प्रकार चलता रहता है यह कहानी उसी को उजागर करती है। पूरी
हवेली में बिरजू की बहू के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। सतवीर की किसनी का तीन
महीने तक शारीरिक मानसिक शोषण के बाद उसकी लाश मिलती है जिसकी गवाह अकेली बिरजू की
बहू है। चौधरी के नौकर जगेसर को हवेली के अंदर चल रहे कुचक्र, शोषण और अमानवीयता की भनक तक नहीं है। बिरजू की बहू
द्वारा विरोध के बाद उसे घर से निकाल दिया जाता है। जगेसर बिरजू की बहू को उसके
मायके छोड़ने जाते हुए रास्ते में जगेसर की आत्मीयता पाकर उसकी वेदना के तार झंकृत
हो उठते हैं और वह हवेली की हकीकत जगेसर के सामने खोल कर रख देती है। यही नहीं वह
मजधार में फंस गई है क्योंकि पिता के गुजरने के बाद मां के साथ मामा के घर में ही
उसने होश संभाला। वही उसका मायका था जहां उसके मामा ने दस साल की अवस्था में ही
इसके ‘अबोध शरीर को बर्बाद कर दिया था।’ वहां भी कोई सुनने वाला नहीं था। बेवसी ने उसके मां को
डरपोक बना दिया था। वर्षों से अपने सीने में इस दुःख, दर्द और वेदना को दबाई हुई बिरजू की बहू ने जब जगेसर
से अपने अंतस की परतें खोली तो जगेसर का मन नफरत और गुस्से से भर उठा। जगेसर को यह
एहसास हुआ कि चौधरी की हवेली की सुरक्षा और सेवा करते हुए उसने अपनी जिंदगी बर्बाद
कर ली। एक ऐसे चौधरी के लिए जो ‘आदमी नहीं, जंगली
जिनावर है।’ वह खुद भी कहीं जिनावर न बन जाए इस से
पहले ही हकीकत जानने के बाद उसकी चेतना जाग उठी। और वह बिरजू की बहू को न्याय
दिलाने के लिए चौधरी की हवेली वापस चलने के लिए जोर डालता है। बिरजू की बहू कहती
हैः
‘‘यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज्यादा
सुरक्षित है। कम से कम भेड़िए आवेंगे तो रंग-रूप बदल के तो ना आवेंगे। जाके कह देना
छोड़ आए तो...।’’13 तब जगेसर ने बहू को समझाने की कोशिश की, ‘‘ना बहू जी---मैं लछमन ना हूं तो सीता कू बियाबान जंगल
में छोड़ के वापस चला जाऊं...’जगेसर ने दृढ़ आत्मविश्वास दिखाया। उसके
आत्मविश्वास को देखकर बहू भी चौंकी। धूप का एक कतरा जगेसर के चेहरे पर चमक पैदा कर
रहा था।...बहू उठकर खड़ी हो गई। उसी आत्मविश्वास से भरकर बोली, ‘चलो।’
जगेसर ने चौंककर देखा।
बहू जी के चेहरे पर हलकी-सी खुशी दिखाई पड़ रही थी। बगीचे से बाहर कच्चे रास्ते पर
धूप में अभी भी उतनी ही तपिश थी।’’14
‘जिनावर’ कहानी
का दलित पात्र जगेसर गैर दलित समाज के खोखलेपन और उनके विद्रूप चेहरे को देखकर गैर
दलित समाज के स्त्री को न्याय की आस दिलाता है। चेतना आने के बाद बकायदा पक्षधरता
चुनता है। चौधरी की बेटी सरोज और जगेसर के बीच प्रेम, स्नेह और आत्मीयता दलित कहानी के कथ्य और सरोकार को
विस्तार देती है। प्रेम,
स्नेह और आत्मीयता से
जहां जीवन में सुखद अनुभूति होती है वहीं इसके अभाव में जीवन में नीरसता, यांत्रिकता,
अजनबीपन आदि दुःखद
स्थिति का आगमन हो जाता है।
हिन्दी
की नई कहानी में जहां यह नीरसता,
यांत्रिकता, अजनबीपन,
अकेलापन आदि की स्थिति
का वर्णन है और उसे आधुनिक यांत्रिक सभ्यता की देन कहा जाता है वहीं दलित कहानियां
इसके कारणों की खोज करती हैं और कहती है कि इसकी जड़ में भारतीय समाज की जातिवादी
व्यवस्था व मानसिकता है। जो जातीय अहं में जीवन की कृत्रिमता को वहन करती है। जहां
जातीय अहं में दूसरे को आत्मसात नहीं करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिवादी
मानसिकता एक दूसरे के बीच आत्मीय लगाव पैदा ही नहीं होने देती है जहां होती भी है
तो उसे कुंद करने की कोशिश करती है। जयप्रकाश कर्दम की कहानी ‘बिट्टन मर गई’
में कायस्थ परिवार की
बेटी बिट्टन की शादी अनजाने में ही दलित युवक को सजातीय समझ कर हो जाती है। बिट्टन
की शादी युवक के कार्यालय में ही कार्यरत लड़की के पिता के परिचित के माध्यम से
सजातीय समझकर खूब धूम-धाम से संपन्न होती है। लेकिन बाद में सच्चाई का पता चल जाने
पर बिट्टन के माता-पिता लड़की को पति के घर नहीं भेजते। कहानी का नायक विकास बिट्टन
की आंखों में उठते प्रश्नों में उसे ढूंढ़ता हैः
‘‘बिट्टन की उदास, तन्हा जिंदगी सहारा मांगती है। कोई सहारा नही मिलता
इसलिए वह खींझती है, चिड़चिड़ाती है, गुस्सा करती है और अंदर ही अंदर धधकती रहती है। उसे प्यार
और खुशी के दो क्षण चाहिए।...बिट्टन के मां-बाप को वह जाति की निस्सारता और
निरर्थकता समझाए तो कैसे?’’15
बिट्टन
परिवार और समाज के दोहरे दबाव के आगे बेवस हो जाती है और अतंतः वह घर में ही घुट-घुटकर
मर जाती है। यहां एक सवर्ण स्त्री की वेदना को दलित संवेदना के माध्यम से समझा जा
सकता है। किस प्रकार जाति व्यवस्था का दंश झेलती हुई बिट्टन अपनी जिंदगी समाप्त कर
लेती है। गैर दलित जीवन संदर्भों से जुड़ी दलित कहानियों में अभिव्यक्त वेदना, पीड़ा और सरोकारों को समझने की जरूरत है। इस प्रकार कहा
जा सकता है कि दलित कहानियों में सिर्फ दलित जीवन की ही अभिव्यक्ति नहीं है गैर
दलित जीवन के साथ-साथ संपूर्ण समाज का चित्रण है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि
कभी भी अपनी जाति को नहीं छुपाना चाहिए और अंतर्जातीय विवाह की स्थिति में एक
दूसरे की संस्कृति को आत्मसात करना चाहिए। अंतर्जातीय विवाह आधुनिक चेतना की उपज
है। लेकिन दलित कहानी की सामाजिकता बताती है कि यह आधुनिकता का ढोग भी है। कहने को
आधुनिक कहते हैं लेकिन रहते हैं उसी पारंपरिक मानसिकता में।
आधुनिकता
के बीच जातिवादी मानसिकता किस प्रकार काम करती है। दलित कहानियां उस मानसिकता को उजागर
करती हैं। डॉ. सुशीला टाकभौरे की कहानी ‘सिलिया’ एक
दलित लड़की के बाल्यावस्था से युवती बनने के बीच के अपमान, अंतर्द्वंद्व और संघर्ष की कहानी है जिसे आत्मविश्वास
है कि शिक्षा से ही सम्मान के शिखर पर पहुंचा जा सकता है। वह अपने में सफल भी होती
है। अंतर्जातीय विवाह का विज्ञापन हिन्दी के ‘नई
दुनिया’ में अपने ‘शूद्र
वर्ग की कन्या चाहिए’
से इस कहानी का कथ्य
शुरू होता है। इसके और हिन्दू धर्म के खोखलेपन का एहसास सिलिया को दैनंदिन
व्यवहारों के अनुभवों से होता है। सिलिया के बचपन की दो घटनाएं उसके मानस पटल पर
हिन्दू व्यवस्था की विद्रूपता की गहरी रेखाएं खींच देती हैं। पहली घटना भेड़ों, बकरियों का व्यवसाय करने वाले गाडरी मुहल्ले से पानी
पीने की है। जब सिलिया की ममेरी बहन मालती द्वारा कुएं की बाल्टी और रस्सी छू जाने
से बवेला मच जाता है। मामी के हाथों मालती की पिटाई देखकर सिलिया सहम जाती है मन
में डर घर कर जाता है। दूसरी घटना स्वयं सिलिया के साथ होती है जब अपनी पांचवी
कक्षा की सहेली हेमलता ठाकुर के बहन की ससुराल में सास द्वारा जाति जान लेने के
बाद उसके सामने से पानी का गिलास हटा लिया जाता है। जबकि सिलिया को बहुत जोर की
प्यास लगी थी। उसके बालमन में घर कर गए घाव ढेरो सवाल छोड़ जाते हैं। सिलिया के
अंतर्मन के उथल-पुथल को शिक्षा से राह मिलती है। डॉ. अम्बेडकर के ‘शिक्षित बनो,
संघर्ष करो, संगठित हो’
का नारा इस कहानी में
प्रतिफलित होती है। शिक्षा से धीरे-धीरे सिलिया का मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता गया-‘सिलिया ने मन-ही-मन दृढ़ संकल्प किया-‘‘मैं बहुत आगे तक पढ़ूंगी, पढ़ती
रहूंगी। उन सभी परंपराओं के मूल कारणों का पता लगाउंगी, जिन्होंने हमे समाज में अछूत बना दिया है। मैं विद्या, बुद्धि और विवेक से अपने आप को ऊंचा साबित करके
रहूंगी। किसी के सामने झुकूंगी नहीं। न ही कभी अपमान सहन करूंगी।’’16 यही नहीं बल्कि समाज को बदलने का संकल्प
भी लेती है-‘‘सिलिया ने तय किया, वह जीवन भर कोशिश करेगी कि समाज इन सब बातों को समझे, उनके मर्म को जाने। सम्मान और अपमान के भेद को समझे और
सही रूप में सम्मान का हकदार बने।’’17 इस तरह दलित कहानियां समाज में
मान-सम्मान और गरिमा की बात करती हैं। उसका बोध कराती हैं। यही दलित कहानियों का
सौन्दर्यबोध है।
भारतीय
समाज में आधुनिकता के इस तिलिस्म को भी दलित कहानियां नोटिस लेती हैं। जयप्रकाश
कर्दम की कहानी ‘नो बार’ जाति
के उस तिलिस्म को तोड़ती है जो विज्ञापन की दुनिया में जाति भेद को नहीं मानते
लेकिन व्यवहारिक जीवन में जाति का संस्कार कितने गहरे स्तर पर रच-बस गया है, यह शादी के वक्त उजागर होता है। मैट्रीमोनियल आधुनिकता
की खोल में सजातीय जातिवाद को बढ़ाता देता है। जिसमें ‘नो बार’
का मतलब जाति का नकार
नहीं, सजातीयता की आधुनिक ब्राह्मणवादी सोच है।
आये दिन इसका उदाहरण समाज में देखने को मिलता है। हमें इससे सावधान रहने की जरूरत
है।
दलित
समाज में विवाह एक जीवन साथी की वैचारिकता है वहां बंधन नहीं है सामाजिकता है
लेकिन गैर दलित समाज में विवाह एक बंधन है। ‘‘वैसे भी विवाह जन्म भर का बंधन होता है।’’18 यह बंधन ही पुरुषवादी मानसिकता का द्योतक
है जहां विवाह सामाजिकता नहीं,
समता व स्वतंत्रता का
विरोधी है। गैर दलित समाज में ‘नो बार’ का
मतलब सजातीय विवाह होता है। ‘नो बार’ कहानी
का समाजशास्त्र इसी वैचारिकता को उजागर करता है। ‘‘वह
सब तो ठीक है कि हम जाति-पांति को नहीं मानते और हमने मैट्रीमानियल में ‘नो बार’
छपवाया था। लेकिन फिर भी
कुछ चीजें तो देखनी ही होती हैं। आखिर ‘नो बार’ का
यह मतलब तो नहीं कि किसी चमार चूहड़े के साथ...।’’19 यहां मैट्रोमोनियल का समाजशास्त्र और उसका सौन्दर्य
खुद बखुद उजागर हो जाता है कि उसका मतलब सजातीय विवाह है। सजातीय विवाह जाति-प्रथा
का आधार है। यहीं से दलित कहानी का सौन्दर्य बोध स्पष्ट होता है कि किस प्रकार
दलित कहानी न केवल सजातीय विवाह की प्रक्रिया को तोड़ती है बल्कि जाति व्यवस्था को
भी तोड़ती है और सजातीय विवाह के कारण इच्छा,
मान-सम्मान की भावना किस
प्रकार धाराशाही हो रही है और एक पुरुष एक स्त्री सदा-सदा के लिए जाति के बंधन में
बंध जाता है। ‘नो बार’ आधुनिकता
का प्रतीक है। लेकिन यह आधुनिकता किस प्रकार की है और ‘मैट्रीमोनियल’
एक आधुनिक संस्था है।
मगर इस आधुनिकता में निहित सौन्दर्य आधुनिकता का नहीं, आधुनिक चेतना का नहीं बल्कि पारंपरिक व्यवस्था की जड़ता
का है। ‘अनीता वहीं खड़ी रह गई थी।’20 अनीता का खड़ी रहना ही आधुनिकता के बीच
जड़ता की निशानी है। ‘जाति-पाति, धर्म-सम्प्रदाय
के बंधन को पिछड़ेपन का प्रतीक’
मानने वाले विचार किस
प्रकार जाति की जड़ता में जकड़ा हुआ है। ‘अनीता का वहीं खड़ी रहना’ आधुनिक चेतना का प्रतीक नहीं जाति की जड़ता में कैद
विचार का द्योतक है। जिसका परिवार कहने के लिए ‘एडवांस’ अंतर्जातीय विवाह का समर्थक है लेकिन अपनी वैचारिकता
में जातिवादी, उच्चवर्णीय सजातीय है।
उपजाति
या टाइटिल या सरनेम का अनुकरण आदि भी जाति का प्रतीक है। ‘सरनेम’
का अनुकरण ब्राह्मणवादी
संस्कृति का संस्कृतिकरण है जिससे जाति खत्म नहीं होती है बल्कि वह और ज्यादा
मजबूत होती है। दलित चेतना की कहानियां इसका विरोध करती हैं। जयप्रकाश कर्दम की
कहानी ‘बिट्टन मर गई’ या ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘मैं ब्राह्मण नहीं हूं’ ऐसी
ही कहानी है जो ‘जाति की संस्कृतिकरण’ का विरोध करती है और एक समतामूलक समाज बनाने का
प्रयत्न करती है। स्वाधीनता के पश्चात देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना
होती है और सामाजिक बदलाव की कवायद शुरू होती है। इसक्रम में कई बार घालमेल की
संस्कृति भी पनप जाती है। इसी घाल-मेल की संस्कृति ने संस्कृतिकरण की प्रक्रिया
में जाति या उपजाति की संस्कृति की नकल पर भी बल दिया। यह नकल सकारात्मक मूल्यों
या विकास हेतु लोकतांत्रिक मूल्यों का नहीं हुआ बल्कि उसकी जड़ता का हुआ। जोकि काफ
सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बाधक ही नहीं बल्कि घातक भी साबित हुआ है। ओमप्रकाश
वाल्मीकि या जयप्रकाश कर्दम जैसे रचनाकारों ने जब अपनी कहानियों के माध्यम से यह
कहा कि ‘‘टाइटल बदलने से जाति नहीं बदल जाती।’’21 तो उनका लक्ष्य हीनताबोध से मुक्त का रहा
है। जब तक जातीय हीनताबोध से मुक्त नहीं हुआ जाता है तब तक मानवीय सौन्दर्यमूल्य
के साथ जीवन नहीं जीया जा सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि सरनेम का अनुकरण न
केवल जाति का संस्कृतिकरण है बल्कि ब्राह्मणवादी संस्कृति व मानसिकता का
संस्कृतिकरण है जो सच्चाई से कोसो दूर जीवन जीती है। इसी मानसिकता को दलित कहानी
का सौन्दर्यबोध तोड़ती है और कहती है कि ‘टाइटल बदलने से जाति नहीं बदल जाती।’ यदि टाइटल बदलने से जाति बदल जाती को भारतीय समाज कब
का न बदल गया होता है। इसलिए जरूरत है हमें अनुकरण करने की नहीं, बल्कि अपनी सोच,
अपनी चेतना को आधुनिकबोध
के साथ निर्मित करने की। यह चेतना ही उसे मानवीय सौन्दर्य से लैस कर सकती है।
दलित
और गैरदलित जीवन में मौजूद पितृसत्तात्मकता को प्रश्नांकित करना दलित कहानी के
कथ्य एवं संवेदना का अति महत्वपूर्ण पहलू है। दलित स्त्री लेखन में दलित समाज के
अंतर्विरोधों के लिए भी पर्याप्त जगह है। दलित कहानियों में जातियों-उपजातियों की
मनोवृत्तियों, टकराहटों के संवेदनात्मक पहलुओं और दलित
स्त्री के तिहरे शोषण को भी विषयवस्तु बनाया गया है। भेदभाव और उत्पीड़न का
स्वानुभाव दलित कहानी के यथार्थबोध की अभिव्यक्ति है। स्वानुभूति और सहानुभूति का
प्रश्न इसीलिए दलित साहित्य के केन्द्र में रहा है। कथावस्तु का चुनाव, घटना,
चरित्र-चित्रण, देशकाल और सोद्देश्यता को दलित स्वानुभव प्रामाणिकता
प्रदान करता है। दलित आत्मकथाओं के माध्यम से स्वानुभव के व्यापक दायरे को समझा जा
सकता है। अर्थात दलित साहित्य का स्वानुभव सामुदायिक अनुभव है जो असमानता, भेदभाव और उत्पीड़ित समुदाय की संवेदना को सचेत और
चेतनाशील बनाता है। इसीलिए दलित लेखन में विचारधारा का बहुत महत्व है। उपेक्षित
होने की पीड़ा, अपमानित होने का दंश, उत्पीड़ित किए जाने की यातना और वंचना का क्रूर अनुभव
दलित कहानी की विशिष्टता है। भेदभाव,
अस्पृश्यता और
जातिवादी-ब्राह्मणवादी क्रूरताओं ने दलित कहानी का कलेवर ही बदल दिया है। अभाव
ग्रस्तता और शोषण की बारीकी को दलित कहानीकारों ने बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत
किया है।
दलित
और गैर दलित जीवन में मौजूद पुरुषवादी मानसिकता को दलित कहानियां न केवल
प्रश्नांकित करती हैं बल्कि उसका विरोध कर स्त्री-पुरुष की सह-समवादी सामाजिक व्यवस्था
की स्थापना पर बल देती हैं। दलित स्त्री लेखन में भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को
भी समझा जा सकता है। दलित कहानियों में दलित स्त्री के तिहरे शोषण के साथ-साथ
जाति-उपजाति के सवालों को भी उठाया गया है। दलित कहानियों में अभिव्यक्त दलित
स्त्री चेतना को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है। ‘अंगूरी’
दलित नारी की अस्मिता की
कहानी है। अंगूरी एक दलित नारी है जो हर कीमत पर अपनी अस्मिता अक्षुण्ण रखने में
तथाकथित ऊंची जाति के लोगों पर विजय का डंका बजा देती है। अंगूरी और उसके पति
गेंदा की तरह ही खेतिहर मजदूर परिवार भारत के हर एक गांव में मौजूद हैं और मनुवादी
व्यवस्था के कारण दिन-रात परिश्रम करके रूखा-सूखा खाकर किसी तरह जीवित हैं, जिसमें न कोई रस होता है न कोई उत्साह, फिर भी अपनी अस्मिता के प्रति सजग हैं। इस कहानी के
माध्यम से लेखक ने बताया है कि दुश्मन कितना ही बलशाली क्यों न हो, यदि साहस और जान हथेली पर लेकर मुकाबला करने की
सामर्थ्य है और उसके बल पर मुकाबला किया जाए तो दुश्मन को खदेड़ना कठिन नहीं है।
अंगूरी के कथन ‘‘चाहे जान चली जाए पर इन दरिन्दों के सामने
नहीं झुकूंगी।’’ में आत्मविश्वास है इसी आत्मविश्वास के
सहारे दुश्मन को ललकारते हुए वह कहती है-‘‘यदि तूने हाथ भी लगाया तो तेरा खून पी
जाऊंगी।’’22 उसका हाथ में हंशिया पकड़ना एवं भूखी
शेरनी का रूप धारण करना और कहानी के अंत में ‘‘मैं
अहिल्या ना हूं, मैं अंगूरी हूं अंगूरी’’ से तथाकथित सौन्दर्य, कलात्मक
साहित्य के मिथक को उलट कर यह नवीन संदर्भ में स्थापित किया गया है कि दलित
महिलाएं अपनी अस्मिता बचाने के लिए जान दे सकती हैं, पर
वह अहिल्या नहीं हो सकती हैं। वहीं दलित स्त्री की चेतना के स्वर को रेखांकित करती
हुई कहती हैं कि ‘अरे कम्बख्तों, तुम्हारा तो सत्यानाश ही होगा।’ यही प्रतिरोध की चेतना है जो समाज में पितृसत्ता को
खत्म कर सकती है।
ओमप्रकाश
वाल्मीकि की कहानी ‘यह अंत नहीं’ ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की कहानी है जो
ब्राह्मणवादी मानसिकता व व्यवस्था का न केवल विरोध करती है बल्कि पंचायती
राज-व्यवस्था की हकीकत को भी उजागर करती है। कहने के लिए गांव का ‘मुखिया’
बिसन दलित है, लेकिन वह वर्चस्ववादी जाति का मोहरा बनकर रह गया है।
ऐसे में दलितों को न्याय की संभावना नहीं दिखती है लेकिन बिरमा की मुखरता ने
दलितों में नई चेतना का संचार कर दिया,
‘‘ना बिरमा...यह अंत नहीं
है...तुमने हमें ताकत दी है। हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि फिर कोई बिसन मोहरा ना बने।’’23 लेखक ने बड़ी सहजता से यह उद्घाटित किया
है कि जातिगत वर्चस्व का कारखाना गांव लोकतंत्र की इकाई पंचायती राज-व्यवस्था का
शत्रु है। यहां डॉ. अम्बेडकर का कथन चरितार्थ हो रहा है कि भारतीय गांव
हिन्दू-व्यवस्था के कारखाने हैं। वह ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के जनक-जननी हैं।
जहां समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व
और न्याय के लिए जगह नहीं है। इस स्त्री चेतना के संदर्भ में सुशीला टाकभौरे की
कहानी ‘सिलिया’, रजत
रानी ‘मीनू’ की
‘सुनीता’ और
कावेरी की ‘सुमंगली’ कहानी
को भी देखा जा सकता है। सुशीला टाकभौरे की कहानी ‘सिलिया’ दलित स्त्री चेतना की कहानी है। सिलिया के दृढ संकल्प-‘‘मैं बहुत आगे तक पढ़ूंगी, पढ़ती
रहूंगी। उन सभी परंपराओं के मूल कारणों का पता लगाऊंगी, जिन्होंने हमें समाज में अछूत बना दिया है। मैं विद्या, बुद्धि और विवके से अपने आपको ऊंचा साबित करके रहूंगी।
किसी के सामने झुकूंगी नहीं। न ही कभी अपना अपमान सहन करूंगी।’’24 और उसकी चेतना-‘झाड़ू नहीं कलम’। हां कलम ही उसके समाज का भाग्य बदलेगी।’ ने न केवल ब्राह्मणवादी मानसिकता और व्यवस्था को
ध्वस्त करती है बल्कि उसकी सफलता को भी सुनिश्चित करती है। ‘झाड़ू नहीं कलम’
की चेतना डॉ. अम्बेडकर
के दर्शन-‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो’ को ही अभिव्यक्त करती है। ‘सुनीता’
कहानी की सुनीता न केवल
इस धारणा को तोड़ती है कि ‘ये चमारिन की छोकरी पढ़-लिखकर का दिल्ली की
गद्दी पर बैठेगी?’ बल्कि ‘दलित-जन-संगठन’ बनाकर सांसद भी बनती है और समाज की इस धारणा को भी
ध्वस्त करती है कि ‘यह काम तो...बेटे ही करेंगे, वही वंश चालक है’। लड़का-लड़की की समानता की संवेदना और उसकी
सामाजिकता को उपस्थित करती है कि ‘नहीं बेटी यह काम तो तुम्हीं कर सकती हो, बेटे नहीं।’
इस प्रकार दलित कहानियों
की सामाजिकता को समझा जा सकता है। उसके सौन्दर्यबोध को समझा जा सकता है कि किस
प्रकार स्त्री-पुरुष की सहभागिता और बराबरी की संवेदना एकाकार हो रही है। कावेरी
की ‘सुमंगली’ कहानी
की संवेदना और उसकी सामाजिकता जहां स्त्री विवशता, लचारी
को उजागर करती है वहीं वह ‘सामंतवादी’ मानसिकता/प्रवृत्तियों
को भी उद्घाटित करती हुई उससे मुक्ति की चेतना भी पैदा करती है।
दलित
स्त्रियां सामाजिक परिवर्तन के लिए क्रांति के लिए हमेशा से ही इतिहास में तत्पर
दिखाई देती रही हैं। दलित आंदोलन में उसकी एक लंबी परंपरा और इतिहास रहा है। यह
दीगर बात है कुलीनवादी सोच से लिखे गए इतिहास में दलितों की भूमिका को रेखांकित
नहीं किया गया है। बौद्धकालीन परंपरा से लेकर आधुनिक युग में दलित स्त्रियां हमेशा
से ही इतिहास बनाने का काम करती रही हैं। यही कारण है दलित समाज में दैनंदिन में
भी स्त्रियां बराबरी की स्थिति में रही हैं। उनमें प्रतिरोध की चेतना रही है। यही
प्रतिरोध की चेतना दलित कहानियों में भी दिखाई देती है। इस दृष्टि से ओमप्रकाश
वाल्मीकि की कहानी ‘यह अंत नहीं’, अम्मा,
मोहनदास नैमिशराय की ‘अपना गांव’,
सुशीला टाकभौरे की ‘सीलिया’,
रजत रानी मीनू की ‘सुनीता’,
‘वे दिन’, कावेरी की ‘सुमंगली’ आदि
कहानियों के सौन्दर्य को देखा जा सकता है।
निष्कर्षतः
कहा जा सकता है कि दलित कहानियां भारतीय समाज में व्याप्त अमानवीय प्रथाओं, अमानवीय सोच-मानसिकता को उजागर करती हुई मानवीय जीवन-मूल्यों
को पाने की चेतना जाग्रत करती हैं। ये कहानियां सिर्फ विषय-वस्तु की दृष्टि से ही
नहीं बल्कि रूप के स्तर पर भी पूर्व की कहानियों से अपने-आप को अलग करती हैं। दलित
कहानियों में जातियों-उपजातियों की मनोवृत्तियों, टकराहटों
के संवेदनात्मक पहलुओं और दलित स्त्री के तिहरे शोषण को भी विषयवस्तु बनाया गया
है। भेदभाव और उत्पीड़न का स्वानुभाव दलित कहानी के यथार्थबोध की अभिव्यक्ति है।
स्वानुभूति और सहानुभूति का प्रश्न इसीलिए दलित साहित्य के केन्द्र में रहा है।
कथावस्तु का चुनाव, घटना, चरित्र-चित्रण, देशकाल और सोद्देश्यता को दलित स्वानुभव प्रामाणिकता
प्रदान करता है। दलित आत्मकथाओं के माध्यम से स्वानुभव के व्यापक दायरे को समझा जा
सकता है। अर्थात् दलित साहित्य का स्वानुभव सामुदायिक अनुभव है जो असमानता, भेदभाव और उत्पीड़ित समुदाय की संवेदना को सचेत और
चेतनाशील बनाता है। इसीलिए दलित लेखन में विचारधारा का बहुत महत्व है। उपेक्षित
होने की पीड़ा, अपमानित होने का दंश, उत्पीड़ित किए जाने की यातना और वंचना का क्रूर अनुभव
दलित कहानी की विशिष्टता है। भेदभाव,
अस्पृश्यता और
जातिवादी-ब्राह्मणवादी क्रूरताओं ने दलित कहानी का कलेवर ही बदल दिया है। अभाव
ग्रस्तता और शोषण की बारीकी को दलित कहानीकारों ने बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत
किया है। पारंपरिक व्यवसाय और उन मान्यताओं का विरोध, उसे तोड़ने की कोशिश, हीनताबोध
से मुक्ति, गुलामी का अहसास, आत्मसम्मान,
गरिमा, मैत्री आदि हेतु दलित कहानियां न केवल चेतना पैदा करती
हैं बल्कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, न्याय,
संसदीय लोकतंत्रिक-मूल्यों
एवं जीवन-मूल्यों की प्राप्ति हेतु प्रेरित करती हैं। उत्प्रेरित करती हैं। यही
दलित कहानियों की शक्ति है और इन्हीं शक्तियों से सौन्दर्यचेतना का निर्माण होता
है और हो रहा है जो पूर्व के ब्राह्मणवादी साहित्यिक सौन्दर्य से भिन्न है और नए
प्रतिमान स्थापति कर रही हैं। इस प्रक्रिया और पद्धति से दलित कहानियां पुरानी
जड़वादी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा,
रीति-रिवाज और मानसिकता
से मुक्ति की आकांक्षा उत्पन्न करती हैं।
संदर्भ
ग्रंथ सूचीः
1- हसन इमाम, जोस
कलापुरा, दलित
लोकगाथाओं में प्रतिरोध,
दानिश बुक्स, दिल्ली, 2009, पृ.
37
2- मोहनदास नैमिशराय, आवाजें, समता
प्रकाशन, दिल्ली, 1998, पृ.
20
3- वही, पृ. 24
4- ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, राधाकृष्ण
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2004, पृ.
15
5- वही, पृ. 16
6- वही, पृ. 17
7- वही, पृ. 18
8- विश्वनाथ त्रिपाठी, दलित
कहानियां, ओमप्रकाश
वाल्मीकि की कहानियां में सामाजिक लोकतांत्रिक चेतना, सं-
हरपाल सिंह ‘अरुष’, जवाहर
पुस्तकालय, मथुरा, 2008, पृ. 16
9- ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, राधाकृष्ण
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2004, पृ.
18
10- विश्वनाथ त्रिपाठी, दलित
कहानियां, ओमप्रकाश
वाल्मीकि की कहानियां में सामाजिक लोकतांत्रिक चेतना,(सं.)
हरपाल सिंह ‘अरुष’, जवाहर
पुस्तकालय, मथुरा, 2008, पृ.
19
11- ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, राधाकृष्ण
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2004, पृ.
13
12- मोहनदास नैमिशराय, आवाजें, समता
प्रकाशन, दिल्ली, 1998, पृ.
141
13- ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, राधाकृष्ण
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2004, पृ.
101
14- वही, पृ. 102
15- जयप्रकाश कर्दम, तलाश, विक्रम
प्रकाशन, दिल्ली, 2005, पृ.
73
16- सुशीला टाकभौरे, संघर्ष, शरद
प्रकाशन, नागपुर, 2006, पृ.
49
17- वही, पृ. 49
18- जयप्रकाश कर्दम, तलाश, विक्रम
प्रकाशन, दिल्ल, 2005, पृ.
37
19- वही, पृ. 45
20- वही, पृ. 45
21- वही, पृ. 71
22- सूरजपाल चौहान, हैरी
कब आएगा, सम्यक
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2003, पृ.
46
23- ओमप्रकाश वाल्मीकि, घुसपैठिये, राधाकृष्ण
प्रकाशन, नई
दिल्ली, 2003, पृ.
29
24- सुशीला टाकभौरे, संघर्ष, शरद
प्रकाशन, नागपुर, 2006, पृ.
48
संपर्क: डॉ. प्रवीण कुमार, सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, इंदिरा गाँधी
राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक, मध्यप्रदेश-484887 ईमेल : pravinkmr05@gmail.com
संपर्क न.- 9752916192
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