समान नागरिक संहिता?

समान नागरिक संहिता में सिद्धांतः कोई बुराई नही है, और अंततः उस तरफ क़दम बढ़ाना भी होगा, लेकिन उससे पहले जातियों को ध्वंस करके शैक्षणिक, आर्थिक, क्षेत्रीय विषमता खत्म करना बुनियादी शर्त है। धार्मिक कट्टरता, सामुदायिक अलगाव, भाषाई और क्षेत्रीय जड़ता आदि पुरातन पहचानों को भी पीछे छोड़ कर आधुनिक, वैज्ञानिक और समतामूलक नागरिक पहचान और नागरिक समाज बनाना जरुरी है। जहां सभी पहले भी भारतीय और अंत में भी भारतीय हों, और कुछ नही। बिना आम सहमति बनाए, अगर कुछ लोग समान नागरिक संहिता के नाम पर जाति विशेष की संस्कृति को सभी देशवासियों पर जबरदस्ती थोपने का प्रयास करेंगे तो यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का कोरा पागलपन होगा। जब तक देश में धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा की पहचान मजबूत बनी हुई हैं तब तक स्वतंत्र नागरिक पहचान बनना मुश्किल है। अभी तक अधिकतर लोग अपनी जाति का पुच्छले का मोह तो छोड़ नही पाए सब का भारतीय बनना तो दूर की बात है। जबरदस्ती देश को राष्ट्र नही बनाया जा सकता है। जातिवादी मानसिकता के वो लोग, जिन्होंने अपने वर्चस्व के लिए शताब्दियों से समाज को सैंकड़ों जातियों में तोड़कर रखा हुआ है, तो राष्ट्र निर्माण का यह ऐतिहासिक कार्य बिल्कुल नहीं कर सकते।

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