भारतीय साहित्य और सिनेमा पर पाश्चात्य प्रभाव
भारतीय साहित्य और सिनेमा पर पाश्चात्य प्रभाव
प्रवीण कुमार
pravinkmr05@gmail.com
सिनेमा ने भारतीय संस्कृति
को दुतरफा संक्रमित भी किया है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि सिनेमा ने भारतीय संस्कृति
के स्थानीय और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को एक जगह से दूसरी जगह तथा उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम
सभी स्थानों पर पहुंचाने और उभारने का काम किया है। इस प्रक्रिया में संस्कृति के पारंपरिक
स्वरूप से लेकर वैश्विक स्वरूप तक के प्रभाव को संक्रमण एवं परिवर्तन के रूप में महसूस
किया जा सकता है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि संक्रमण और परिवर्तनकामी संस्कृति में
पारंपरिक भारतीय संस्कृति से लेकर मास कल्चर, मॉल
कल्चर और फिर पॉपुलर कल्चर तक के सफर को भी सिनेमाी दुनिया ने अपनी कायनात में समेटी
है। अधुनातन समाज इन कल्चरों का अनुकरण सिनेमाों के माध्यम से ही करता रहा है। जैसे
कैफे कल्चर, डेनिम कल्चर, इन्टरटेंमेंट
कल्चर, लिव इन रिलेशनशिप कल्चर, फिटनेस कल्चर, मोबाइल कल्चर, पब कल्चर, मॉल कल्चर, डेटिंग
कल्चर जैसे पॉपुलर कल्चर ने स्थापित भारतीय संस्कृति में ‘कल्चर का संकट’ पैदा किया है। रीमिक्स
कल्चर और विज्ञापन कल्चर ने जिस नई संस्कृति को प्रचलित किया है वह पुरातनपंथियों के
लिए ‘अपसंस्कृति’ है
तो युवाजनमानस के लिए नई संस्कृृति है। जिसे ‘मास
कल्चर’ भी कहा जाता है। सबसे बड़ी यह है कि ‘मास कल्चर में कोई आदर्श नहीं होता है और न ही उसका कोई स्वरूप ही।’यही बात विज्ञापन कल्चर में भी देखी जा सकती है। विज्ञापन की कोई विचारधारा
नहीं होती है वह सिर्फ पूंजी की बाजारिक धारणाओं पर आधारित होता है जिसके कारण उसमें
आकर्षण और अपकर्षण के साथ ‘अपसंस्कृति’ का भी समावेशन रहता है। इस संस्कृति को बड़े पर्दे से लेकर छोटे पर्दे के सभी
यांत्रिक उपकरण की सभ्यता (मोबाइल, टीवी, सिनेमा और सोशल मीडिया आदि यांत्रिक उपकरण) ने सबसे ज्यादा गति प्रदान किया
है। सूचना क्रांति के इस युग में यांत्रिक उपकरण की सभ्यता ने युवाजनमानस का अपहरण
कर लिया है। इससे समाज की सभी पीढ़ी प्रभावित हैं। यह प्रभाव आज ऐसा है कि वह जीवन का
अभिन्न अंग बन गया है। यह सब संभव हुआ है सिर्फ और सिर्फ बाजार और मीडिया की सांठगांठ
की वजह से। इस संदर्भ में मास कल्चर और फोक कल्चर दोनों को अलग रखने की जरूरत है। यह
इसलिए कि मास कल्चर के पास अपना कोई आदर्श मूल्य या उच्च विचार नहीं है वहीं फोक कल्चर
के अपने बिम्ब, प्रतीक, आदर्श, विश्वास, प्रथाएं, आचार-व्यवहार
है। अद्यतन सिनेमा में अधिकांशतः मास कल्चर का प्रचलन है और यही वह वर्ग है जिसकी चाहत
़सिनेमा प्रौद्योगिकी को सबसे ज्यादा है। इसीलिए आज मास कल्चर सिनेमा का मूल कल्चर
है। यही बात आज की युवामानस में सबसे ज्यादा प्रचलित व पल्लवित-पुष्पपित हो रही है।
इसीलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सिनेमा ने युवामानस का अपहरण कर लिया है। उसके
‘स्वप्न’ को कैद कर लिया है और उसे ‘उपभोक्तावादी संस्कृति’ में तब्दील कर रहा है।
सिनेमा के बढ़ते इस प्रभाव के कारण समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं।
ये चुनौतियां और संकट वाया बाजारवाद है क्योंकि वर्तमान में सिनेमा सबसे बड़ा प्रौद्यागिक
क्षेत्र है और इस बाजारवाद का सबसे बड़ा वर्ग उपभोक्तावादी संस्कृति की गिरफ्त में आ
चुका है। बाजार ने सिनेमा के माध्यम से भारतीय संस्कृति को उपभोक्तावादी संस्कृति में
परिवर्तित कर भारतीय संस्कृति को संकट में डाला है और भारतीय जीवन मूल्यों में बदलाव
किया है। वैश्वीकरण ने मनुष्य के मन का बाजारीकरण किया है और जिसका सबसे सशक्त माध्यम
सिनेमा है। वर्तमान में यह संकट ऐसा है कि ‘सिनेमा
समाज के आगे चलने वाला मसाल हो गई है।’ यह
संकट इस कदर है कि साहित्य, समाज और संस्कृति तीनों
ही इससे प्रभावित हैं और यह तीनों के लिए ही संकट का भी संकेत है। इस पर विचार करने
की जरूरत है और यही चिंता का विषय है।
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