देशज आधुनिकता को सृजती हैं आदिवासी कविताएँ

 

देशज आधुनिकता को सृजती हैं आदिवासी कविताएँ

डॉ. प्रवीण कुमार

सहायक आचार्य

हिंदी विभाग

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय

अमरकंटक, मध्यप्रदेश

ईमेल : pravinkmr05@gmail.com

चलभाष : 9752916192

आदिवासी साहित्य दिन-प्रतिदिन अपनी व्यापकता , सामाजिकता के साथ वैश्विकता को प्राप्त कर रहा है| साहित्य सृजनात्मकता के क्षेत्र में जो वैशिष्टय आदिवासी साहित्य ने जोड़ा है वह अब नये साहित्यिक प्रतिमान की मांग कर रहा है| इस कमी को अब भारतीय साहित्य की आलोचना महसूस भी कर रही है | आधुनिक साहित्यिक प्रतिमान के साथ देशज ज्ञान-विज्ञान की पद्धति और प्रक्रिया अब फिर से अपनी उपयोगिता की सामाजिकता को दर्ज करने लगी है | इसी कड़ी में सावित्री बड़ाईक का पहला काव्य संग्रह 'दिसुम का सिंगार' को समझा जा सकता है| जो अनुज्ञा बुक्स प्रकाशक, दिल्ली से 2023 में प्रकाशित है| संग्रह का शीर्षक बहुत ही मार्मिक और गूढ़ –गंभीर है| 'दिसुम' शब्द मुंडारी गीत 'सोना' में वर्णित है और कवयित्री ने संभवतः वहीं से लिया है| परन्तु इस दिसुम शब्द एक ऐतिहासिक चेतना का शब्द है जो आदिवासी संस्कृति में बिरसा मुंडा के उलगुलान से प्रेरित और प्रभावित है | बिरसा मुंडा के चिंतन-दर्शन के उत्स, उसकी प्रक्रिया और पद्धति ही उनके सूत्र-वाक्य "अबुआ दिसुम आबुआ राज" में निहित है| जहाँ दिसुम का अर्थ देश, राष्ट्र और मातृभूमि से है और उसी की मुक्ति हेतु आपना शासन-प्रशासन एवं तंत्र की जरुरत है | 'सिंगार' शब्द देशज भाषा का शब्द है और प्राकृतिक सौन्दर्य की विशिष्टता को रेखांकित करता है| इस सिंगार में नैसर्गिक सौन्दर्य की छटा है | इसमें नैसर्गिक जीवन के निमित्त किये गए श्रम का सौन्दर्य है| इस संग्रह में आदिवासी स्त्री के श्रम-सौन्दर्य की अभिव्यंजना है जो अपनी संस्कृति और कला से प्रेम करती है, उसे रचती है , सृजित करती है| यह श्रमशील स्त्रियाँ अपनी देशज ज्ञान-विज्ञान की पद्धति और प्रक्रिया से अपने भाव-विचार को काया-मनसा–वाचा से अपनी कला के सौन्दर्य की अदभुत छटा को प्रदर्शित करती हैं| यानि शीर्षक देश का शृंगार की अभिव्यंजना करता है| इस आधुनिकता- उत्तर आधुनिकता के वैश्विक युग में देशज आधुनिकता को धारण करने की अनुशंसा है| समाज विज्ञान में देशज आधुनिकता की क्या अवधारणा है| उससे अलग यह समझने की आवश्यकता है कि उस देशज आधुनिकता की प्राविधि अपनी माटी की सौंधी खुशबू को विखरने की प्रविधि ही है| यही काम सावित्री बड़ाईक ने किया है अपनी कलात्मक सृजन प्रविधि, प्रक्रिया और पद्धति के मध्यमा से |

यूँ कह सकते हैं कि इस आधुनिक वैश्विक बाजारवाद के युग में देशज आधुनिकता के शृंगार की ओर लौटना कितना दुस्साहस का कार्य है| दुरह कार्य है . लेकिन लौटना ही होगा | यह समय की मांग है| मानवता की ओर लौटना ही होगा| उसके क्षरण को रोकना ही होगा| मानवीय संस्कृति को ख़त्म करने वाली बाजारू संस्कृति, पूंजीवादी संस्कृति और ब्राह्मण–साम्राज्यवादी संस्कृति, सामंती संस्कृति के अवशेष को ख़त्म करना ही होगा| यह कैसे होगा? क्यों होना चाहिए? उसके क्या परिणाम हैं और होंगे ? आदि के प्रतिरोध से उत्पन्न देशज आधुनिकता, प्रकृतिमय वातावरण,  प्राकृतिक सौन्दर्य, आदिवासियत, भारतीय दर्शन आदि का अद्भुत छटा , समन्वय सावित्री बड़ाईक की कविताओं की खास विशेषताएँ हैं| श्रम–सौन्दर्य का अद्भुत हुनर आदिवासी समाज में व्याप्त है| परम संतोषी, आत्ममुद्ग्धता, आत्ममग्न, आदिवासी समाज अपनी माटी की सुगंध से सुगन्धित सृजनात्मक कला की हुनर को नहीं छोड़ना चाहते हैं, क्योंकि उसमें उनकी जिंदगी की धड़कन है, उनकी सांसे उसी में बसी है| उनकी भूमि सिर्फ धरती नहीं है मातृभूमि है, उनकी जिंदगी है | इस आलोक में उनकी कविता 'माटी और गोड़ा भात' बहुत ही मार्मिक है -

" यह जो मेरी भूमि है 

सिर्फ भूमि नहीं है 

जिन्दगी है हमारी |

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फसल है तो खलिहान है 

कोठार में अनाज है 

अनाज है तो माँ के 

चेहरे पर मुस्कान है 

बेटी के बस्ते में पुस्तक है 

चूल्हे पर चढ़े 

खौलते पानी के अदहन में 

पकते गोड़ा भात की सुगंध है | (माटी और गोड़ा भात, दिसुम का सिंगार, 19 )

दिसुम का सिंगार देशज ज्ञान-विज्ञान–आधुनिकता, अन्वेषण–अनुसन्धान का कोश है . इस कविता में एक–एक शब्द भाषा–विश्लेषण की अलग मांग रखता है. देशज धान की विभिन्न प्रजाति का नाम है जिसमें किसान जीवन का सौन्दर्य विज्ञान के समाजशास्त्र को समझा जा सकता है. मानवीय संस्कृति के विकास क्रम के इतिहास को भी समझा जा सकता है. इस ऐतिहासिक यथार्थ को कौन झूठला सकता है कि भारत की मूल संस्कृति द्रविड़ आदिवासी संस्कृति है. कृषि विकास आदिम मानव का आधुनिकतम परिवर्तन का युग रहा है, परन्तु विडंबना देखिए कृषि संस्कृति मिश्रित कृषि उपेक्षित रहा है और वह मानव भी उपेक्षा का शिकार हुए जो कृषि व्यवस्था औद्योगिक व्यवस्था से जुड़े रहे हैं . बादल को घिरते देखा, बादल के माध्यम से प्रेयसी को सन्देश भेजने वाले लोग यह नहीं भूले हैं कि पहाड़ों पर बादल का सजना, धरती की हरियाली, पेड़–पहाड़ ही नहीं है बल्कि वह आदिवासी संस्कृति का आस्था केंद्र है और मानवीय संस्कृति का उत्स भी वहीं से हुआ है. भूमंडलीकरण की संस्कृति में लघु मानवीय संस्कृति पुनः आदिम मानव की संस्कृति की ओर लौट रही है. आधुनिक तंत्र आधारित वैज्ञानिकता ने पुनः यह घोषणा किया है कि 'मोटा अनाज' ही स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम है तो पुनः अंध भौतिकता की दौड़ में मशीन से चकाचौंध अनाज  की पौलिस संस्कृति की जगह खुरदुरा अनाज  जगह ले रही है. उसका बाजारीकरण हो रहा है. बाजारू संस्कृति ने उसे पुनः नये पाकेजिंग में बेचना शुरू कर दिया है. क्या संस्कृति को बेची-खरीदी जा सकती है? सांवा , कोदो , गोंदली , गोड़ा चावल, ज्वार, बाजरा, मकई, मडुवा आदि मानव की मूल खान-पान में था  और तथाकथित सभ्य समाज इसे नकार रहा था परन्तु अब वे पुनः इसी ओर लौट रहे हैं.

भारत एक कृषि प्रधान देश है. जहाँ खेती जिन्दगी का आधार है परन्तु औपनिवेशिक शासनसत्ता के देशकाल से भारतीय कृषि का लगातार दोहन हो रहा है. खेती को पूंजीवाद का खेल बनाया जा रहा है. जबकि बहुजन चिन्तन हमेशा से ही खेती का राष्ट्रीयकरण पर बल देता रहा है. डॉ. आंबेडकर ने खेती का राष्ट्रीयकरण और फसल बीमा योजना की बात सर्वप्रथम किया था. जिससे कि भारतीय समाज का बहुजन समुदाय आत्मनिर्भरता के साथ बेहतरीन जीवन जी सकें. परन्तु वर्तमान भारत सरकार ने खेती का निजीकरण कर रहा है और फसल बीमा के नाम पर किसानों की हड्डी को चूसने का काम रही है. इस संकट के दौर में आदिवासी कवयित्री सावित्री बड़ाईक 'दिसुम का सिंगार ' के माध्यम से आदिवासी समाज को खेती के पूंजीकरण-निजीकरण का न केवल विरोध करती है बल्कि औपनिवेशिक शासनसत्ता वाली इस व्यवस्था से भारतीय कृषि को बचने का सन्देश देती है . इसलिए वे इस निजीकरण को कम्पनी की गुलामी और औपनिवेशिकालीन अर्थव्यवस्था को भारतीय आदिवासी कृषि के लिए संकट के तौर पर रेखांकित करती हैं . खेती के निगमीकरण और नई तकनीक से हो रहे पूंजीवादी हमले से समाज को आगाह करना चाहती है . वे लिखती हैं :

" हमें नहीं चाहिए बीज कम्पनी की गुलामी

और न उपनिवेशकालीन अर्थव्यवस्था

इस धरती के आदि किसान हैं

आओ कोरपोरेट खेती को न कहें

आओ जैविक खेती करें

ताना भगतों की तरह

देशज बीजों का बैंक बनायें

आओ दिसुम का सिंगार करें| (पृष्ठ. -25)

 

इस तरह आदिवासी समाज संस्कृतिविहीन खेती से पूंजी के निर्माण की व्यवस्था का विरोध करता है . उनके लिए खेती पूंजी कमाने का आधार नहीं बल्कि उनकी जिंदगी और संस्कृति है. संस्कृति विहीन समाज तो मुर्दा होता है . लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस बाजारवाद–पूंजीवाद के दौर में मानवीय संस्कृति को देशज ज्ञान –परम्परा–संस्कृति से बचा लिया जाएगा?  क्या वैश्विक गाँव में जैविक खेती और इन्डिजीनियस नॉलेज सिस्टम के आधार पर पुनि मानवीय कायनात को मानवीय संकट से जींद कर लिया जाएगा? क्या पूंजीवाद की चकाचौंध में आदिम ज्ञान व्यवस्था और जैविक खेती हेतु जल , जंगल और जमीं के लिए संघर्षरत मानवीय संस्कृति को ख़त्म तो नहीं कर दिया जाएगा ? क्योंकि जिस तरह से भारत सरकार पूंजीवाद के तंत्र को दिन –प्रतिदिन मजबूत कर रही है और आमजन की आवाज़ को स्वीट प्वैजन से परिवर्तन के नाम पर , विकास के नाम पर ख़त्म कर रही है . यह सवाल जन –जन में उठाना चाहिए . जन –जन की पुकार पुरखों की संघर्ष चेतना से आदिवासियत का निर्माण होनी चाहिए . क्या आदिम और पुरानी व्यवस्था के नाम पर गौरव–गर्व के साथ पुरानी गुलामी वाली व्यवस्था का पुनः उत्थान तो नहीं किया जा रहा है!इसलिए आज श्रम सौन्दर्य, प्रकृति, प्राकृतिक संसाधन, देशज ज्ञान-पद्धति के साथ–साथ आधुनिक भावबोध , आधुनिक चेतना और आधुनिक उपकरण आदि की भी आवश्यकता है . इससे आज इंकार नहीं किया जा सकता है. क्या भूख और खाद्य संकट का समाधान देशज खेती है ?  क्या जलवायु संकट जोकि वैश्विक मानवीय संकट है को आदिवासी दर्शन से ही बचाया जा सकता है ?क्या प्रतिरोध की संस्कृति से ही अब मानवीय संस्कृति बचाया जा सकता है ? क्या सिर्फ भारतीय संविधान से ही मानवीय संस्कृति के उत्सव के सौन्दर्य को सजाया जा सकता है? निश्चय ही भारतीय संविधान, श्रम सौन्दर्य , प्रतिरोध की संस्कृति , देशज ज्ञान -पद्धति , आधुनिक वैज्ञानिक चेतना , प्रविधि और उपकरण के साथ ही मानवीय संस्कृति के सौन्दर्य को बचाया जा सकता है . अपितु मौजूदा दौर में यह कठिन जरुर हो गया है ,परन्तु नामुमकिन नहीं . वैश्विक बाजारबाद की अंधी औपनिवेशिक पूंजीवादी संस्कृति पर लगाम लगाने की आवश्यकता है . उसकी अतिशयता से जन -जन को जागरूक करने की जरुरत है . सड़क से संसद तक प्रतिरोध के स्वर को बुलंद करना होगा. लहलहाते धान और बादल से घिरी पहाड़ी के सौन्दर्य के आस्वादन हेतु  सिंगुर , नंदीग्राम , कोयलकारों, कलिंगनगर , नगड़ी कीनगाड़ाही माटी में धान की बालियाँ और उसका स्वर संगीत गूंजता रहे . इसके लिए हमें सचेतन अपनी क्षितिज को विस्तार करने की जरुरत है. तभी हम दिसुम क सिंगार कर सकते हैं . इस हेतु हंसिया हथौड़ा , कुदाल , फावड़ा , आदि को असहमत का सौन्दर्य विस्तार करना होगा. असमति से ही दिसुम का सिंगार बचा रह सकता है . इंकार और असहमति-प्रतिरोध का सौन्दर्य है. मानवीय संस्कृति की जगह धुआं उगलता मशीनी संस्कृति को बंद करना होगा. मानवीय संस्कृति असहमति और प्रेम दोनों संपृक्त है. प्रेम और असहमति से ही जीवन सौन्दर्य का स्वरुप निर्मित होता है और विकसित भी. 

आदिवासी कविता में प्रेम का सौन्दर्य अद्भुत रूप में है . प्रकृति ने मानव को प्रेम का संगीत दिया है , उसके उपकरण दिया है . उसकी संस्कृति दिया है परन्तु हम मानव बौना संस्कृति में प्रेम की छटाक से प्रेम सौन्दर्य का लावण्य आस्वादन करना चाहते हैं . आदिवासी संस्कृति में धरती ने प्रेम के लिए स्पेस दिया है अपितु गैर आदिवासी संस्कृति में  यह दिन -प्रतिदिन गायब होता दिख रहा है तो वहीं यह भी देखा जा सकता है कि वह देश -देह में तब्दील होता जा रहा है. आदिवासी सौन्दर्य में प्रेम जीवन जलप्रपात की कल -कल ध्वनि की तरह बहती धारा है. ऐसी ही कविता है धरती ये प्रेम के लिए स्पेस दिया और द:सोम जलप्रपात . ढोल , नगाड़ा, मटकी , टिमटिमया, मंदार, बासुरी , आदि आदिवासियत का प्रतीक है और इससे प्रस्फुटित ध्वनि संगीत का स्वर आदिवासी संस्कृति का उत्सव सौन्दर्य है. इसलिए कवयित्री लिखती हैं :

"आसमान पर बादलों के नगाड़े 

नगाड़े की तरह 

बजता है द:सोम जलप्रपात |" पृष्ठ 122

आदिवासी समाज के लिए जल, जंगल,जमीन, पहाड़, पठार, नदियाँ, झरना आदि सिर्फ प्राकृतिक संशाधन नहीं है बल्कि प्राकृतिक जीवन का, मानवीय सभ्यता-संस्कृति का मूल स्रोत है. उसी से जीवन का उत्स हुआ है और जीवन दर्शन का मूल भी वही है. प्राकृतिक जीवन और जीवन दर्शन का  'आदि पाठशाला है धरती'. यह दुनिया की सभी दार्शनिक दृष्टि कहती है फिर भी धरती को बचने की दृष्टि उसके पास नहीं . क्योंकि उन दृष्टि में धरती के दोहन का भाव है वहीं आदिवासियत में धरती जीवन का आदि और अंत दोनों है. इसलिए आदिवासी समाज धरती सहित अन्य प्राकृतिक संशाधनों को बचने की बात करता है. आदिवासी समाज किसी भी औपचारिक शिक्षा में शिक्षित होने से पूर्व प्रकृति की पाठशाला में दीक्षित होता है. प्रकृति में उन्होंने माँ-बाबा और पुरखों का प्यार, स्नेह,शिक्षा-दीक्षा, अनुभव-अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान, अनुसन्धान-अन्वेषण, बोध-शोध, उपचार-उपकरण, जीवन-मृत्यु, जीवनचक्र आदि की प्रक्रिया और पद्धति सभी कुछ पाया है और उसे संरक्षित करना अपना धर्म समझता है. जीवन-दर्शन से लेकर जीवन-उत्सव तक के सौन्दर्य और गतिशीलता सभी कुछ प्रकृति और प्राकृतिक वातावरण में पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है. दर्शनशास्त्र, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र, अभियान्त्रिकिशास्त्र, पर्यावरणविज्ञान, भूविज्ञान, भूगोलशास्त्र, नागरिकशास्त्र, जैवविविधता आदि सभी शास्त्रों का ज्ञान-विज्ञान, उसकी प्रक्रिया-पद्धति एवं उसके मूल्यों को सबसे पहले प्रकृति की पाठशाला में आदिवासी समाज सीखता है तत्पश्चात किसी औपचारिक शिक्षण संस्थानों में. इसलिए जहाँ विज्ञान विफल होता है वहां आदिवासी देशज पारंपरिक  ज्ञान-विज्ञान काम करता है. यही वजह है 21वीं सदी का विकसित राष्ट्र देशी पारंपरिक ज्ञान की ओर लौटने का संकेत दे रहा है. उसकी कवायत कर रहा है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि आदिवासी साहित्य में देशज ज्ञान -विज्ञान बनाम आधुनिक मशीनी ज्ञान-विज्ञान का द्वन्द भी देखा जा सकता है. यह द्वन्द प्रकृति बनाम अप्रकृति का भी है. यह द्वन्द गाँव बनाम शहर की है .इस सबके बिना यह चिंता का विषय है ही क्या 21 वीं सदी के युग में मानवीय समाज ने क्या खोया है ? इस चिंता पर जब भी विचार किया जाएगा तब यह स्पष्ट होगा ही मानवीय समाज से सहजीविता और सामूहिकता ख़त्म होती चली गयी. यही आदिवासी समाज की विशेषता है और आज भी यह अन्य समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में ही बचा है जो उसकी संस्कृति का अहम् हिस्सा है और उसका अभ्यास जीवंत है. जहाँ प्रकृति और मानव के बीच जीवन की सम्बद्धता में जीवित है .गौर आदिवासी समाज में यही ख़त्म हो गया है . जिसकी पराकाष्ठा संयुक्त परिवार से चलकर एकल परिवार की  धारणाओं में देखने को मिलती है . जहाँ पुरखा ही नहीं बचा है तो पुरखों की जीवन पद्धति कहाँ से होगी! आदिवासी समाज में पुरखा-ज्ञान -कौशल -जीवन-पद्धति ही महत्त्वपूर्ण है . उनकी जीवन शैली और संस्कृति की ज्ञान-पद्धति का विकास ही पुरखों के देशज ज्ञान 'से' और 'पर' विकसित हुआ है . जोकि अन्य समाज में लुप्त हो गया है या वहां यह पद्धति ही नहीं थी . आदिवासी साहित्य में देशज ज्ञान-विज्ञान की प्रक्रिया और पद्धति पुरखों की पाठशाला 'में' और 'से' ही विकसित हुई है . द्रष्टव्य है "आदि पाठशाला है धरती" की यह पंक्तियाँ :

" पुरखों ने सीखा होगा 

चीटियों , मधुमक्खियों से सामूहिकता , सहभागिता 

जानवरों की मांद से 

बया पक्षी से सीखा होगा 

घर बनाने की आदि तकनीक|

पक्षियों के मधुर स्वर से 

घोंसला बनाने से पायी होगी 

बरसात की सूचना 

बगैर किसी मौसम बिभाग के 

जाना है मौसम का ज्ञान |

बरसात कब होगी कितनी होगी ?

कौन सी फसल लगानी है ?

जीवन जल कितना बरसेगा ?

पुरखों ने जाना होगा 

धरती और प्रकृति की हलचल से 

पाया होगा सामूहिक रूप से 

पारम्परिक ज्ञान 

पुरखों की ज्ञान परम्परा के प्रति आभार 

सभी पुरखों को जोहार !जोहार !" पृष्ठ - 68

इस प्रकार आदिवासी समाज ज्ञान-विज्ञान की परम्परा के साथ -साथ अपने इतिहास , कला और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करता है . उनके घर की दीवारों से लेकर पहाड़ों की दीवारों पर बनी बना चित्र सिर्फ चित्रकला नहीं है बल्कि आदिवासी समाज का इतिहास , संस्कृति और कला है . सावित्री बड़ाईकके अनुसार तो यह आदिम उत्सव है . इसलिए वे लिखती हैं कि "घर की दीवारें सजाने का /प्रकृति के साथ . सहजीवी रिश्ता बनाने का . आदिम उत्सव है|(पृष्ठ 124) "संस्थालियों का पुराना रिश्ता है सोहराय से / जितना पुराना आदि शैली चित्रों की परम्परा |" इसलिए आदिवासी समाज की संस्कृति एक साथ जीवनोत्सव से लेकर प्रतिरोध के सौन्दर्य तक की गाथा को समेटती है -

"जब तक दुरंग गाते रहेंगे 

जब तक झूमर नाचते रहेंगे 

जब तक सोगोय नाचते रहेंगे 

जाहेर थान में जुटते रहेंगे 

पहन कर पारंपरिक परिधान 

पंची पाड़ हांट

सखुआ पत्तों से विचारों को बांटते रहेंगे 

वर्चस्व कारी सत्ता और पूंजी से 

लोहा लेते रहेंगे 

जंगल -जंगल पहाड़ -पहाड़ 

बजेंगे प्रतिरोध के नगाड़े |" पृष्ठ -126

इन पंक्तियों में पूरा का पूरा इतिहास है , इतिहासबोध है . जो फूलों , झानो , चाँद भैरव , सिदो कान्हु, बिरसा का है . जिसने औपनिवेशिक शासनसत्ता से लोहा लिया है और अपने समाज को नयी दिशा -जिन्दगी दिया है . जतरा के माध्यम से यह इतिहास , इतिहासबोध , संस्कृति आदि सब कुछ एक पीढी से दूसरी पीढी तक हस्तांतरित होती रहती है .'जतरा में महा जुटान के सपने ' कविता ऐसी ही कविता है जो वैश्विक युग में देशज जतरा के माध्यम से आदिम पड़हा व्यवस्था को मजबूती के साथ अभिव्यंजित करती है . जतरा का सम्बन्ध मौसम से लेकर जीवनानंद सौन्दर्य तक है . संवाद से लेकर बंधुत्व , समानता , स्वतंत्रता , गरिमा , अस्तित्व से लेकर अस्मिता तक है . जिसकी सुरक्षा का सवाल है इस वैश्विक संकट के दौर में . 'जतरा टांड' एक मानवशास्त्र है , समाजशास्त्र है , इतिहास है , संस्कृति है. इससे बढ़कर यह जीवन सौन्दर्य की भूमि है . जीवन संकट के रक्षार्थ जतरा जुटान चाहती है :

"आओ जतरा का वैश्विक जुटान कर लें 

मध्य भारत के आदिवासी मिलें 

पूर्वोत्तर के आदिवासिओं  से 

विश्व के सभी हिस्सों के आदिवासी 

मिलें वैश्विक जतरा में 

अपने गीतों , अपनी कविताओं के साथ 

पूरी धरती के आदिवासियों का हो 

जतरा में महा जुटान 

हम देखते रहेंगे 

जतरा में महा जुटान के सपने |" पृष्ठ 128

यह सवाल सिर्फ कवयित्री की नहीं है बल्कि आदिवासी समाज-संस्कृति के बोध , शोध , अनुसन्धान -अन्वेषण का है . इस वैश्विक युग में जब युवा के सपनों को तांत्रिक सभ्यता के पिटारा में बंद किया जा रहा है वहां खुले आसमान के आँगन में बैठ कर खुली आँखों से सपनों को देखना अपनी जिन्दगी के सौन्दर्य के क्षितिज -आकाश के आयामों के बीच पलक परिधि की रेखाओं की पहचान करना है . यह वैश्विक संकट में 'सपनों का मर जाना तो सबसे खतरनाक होता है' . इसलिए जतरा का जुटान आदिवासी जीवन सौन्दर्य की धारती है . धान है खेत -खलिहान है . उसका स्वर संगीत है .

भूख की समस्या पूरी दुनिया में है . वर्तमान में भारत का स्थान ग्लोबल इंडेक्स 2022 के अनुसार 107 वां है . यह दिन प्रतिदिन बढ़ ही रहा है . जिसकी सबसे अधिक मार आदिवासी समाज पर ही पड़ती है . सावित्री बड़ाईक ने भूख शीर्षक से एक कविता लिखी है . जिसमें भूख के कारण हुई संतोषी की मौत  का वृतांत है . कवयित्री ने भूख , कुपोषण , आदि के कारणों हो रहे मानवीय मूल्यों क के क्षरण और बढ़ती मानवीय समस्याओं को बहुत ही बारीक ढंग से उठाई है:

भूख का परिसर बढ़ता जा रहा है 

भूखों के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं 

मध्याहन भोजन 

राशन कार्ड 

सर्व शिक्षा अभियान के बावजूद 

आधारहीन हो गया है जीवन 

अनुत्तीर्ण हो गई है व्यवस्था "| पृष्ठ - 92

यह जो अनुभूति , सवाल और व्यवस्था के मद्देनजर भूख की बदती समस्याएँ हैं . उसका उत्तर व्यक्ति के पास तो नहीं है . सरकार जिसकी जिम्मेदारी है वह भी उतना ही लाचार -बेवस है . फिर क्या करें और कहाँ जाये आम आदमी ? इसके लिए हर व्यक्ति को चेतनशील होना जरुरी है . यही चेतना 'छउवा' नमक कविता में दर्ज है. जिन्हें जीवन का गणित सीखना है. हुनर-कौशल सीखना है , क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उनके  हुनर-कौशल को मार्गदर्शित करती है ? क्या वह करेगी ? या संतोषी की तरह उनकी जिन्दगी को ख़त्म कर देगी ? क्या वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आदिवासी समाज सहित सभी बहुजन समाज को सस्ती एक सामान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करेगी ?क्या क्या कहीं शिक्षा के नाम पर एकलव्य और शम्बूक का वध तो नहीं किया जा रहा है आधुनिक रामराज में? कवयित्री ने इस आधुनिक रामराज में शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था की पूरी पड़ताल की है अपनी कविता में ;

" छउवा को 

सीखना है जीवन का गणित 

पुरखों का हुनर कौशलभरना है अपनी आवाज में 

बादल -जलप्रपात की आवाज़ |

बनना है 

सखुआ के सीधे तने सा स्वाभिमानी 

इनके छोटे छोटे पांव

बढ़ते जा रहे हैं 

पहाडी झरिया की ओर

दूसरी ओर है पाठशाला |

सिर पर बस्ता 

हाथों में हाथों की मजबूत पकड़ 

हाथ छूटेंगे 

पांव उखाड़ेंगे 

तो वह जाएँगे 

झरिया के जबर बहाव में |" पृष्ठ 94-95

क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इन छउवा को पुरखों के हुनर से मुक्त करेगा? या इन्हें प्राचीन ज्ञान व्यवस्था के नाम पर पारंपरिक व्यवस्था में जीने-मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा? क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का निजीकरण प्रबंधन की प्रक्रिया मॉडल आदिवासी समाज सहित बहुजन समाज को शिक्षा से महरूम करने का काम नहीं करेगी ?आदिवासी रचनाओं में देशज प्राचीन ज्ञान के प्रति लगाव बहुत है. क्या यह लगाव उन्हें देशज आधुनिकता से वंचित तो नहीं कर देगा? इस सब के सन्दर्भों के साथ आत्मालोचन की संभावना बनती है और वर्तमान के साथ भविष्य को देखने का काम करने की जरुरत है. अतीत में बहुत कुछ है परन्तु अतीत का सब कुछ अच्छा नहीं है. वर्तमान हमें इन्हीं वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की बात करता है और भविष्य के बारे में संकेत करता है, कर रहा है. आधुनिक बाजारबाद, पूंजीवाद की व्यवस्था आमजन की जिंदगी को तबाह कर सकती है. यह चिंता सावित्री बड़ाईक के इस प्रथम काव्य संग्रह में है. हमें इस दृष्टि से भी विचार करने की जरुरत है.

'अधिकारों की पगडंडियाँ ' कविता ऐसी हेई है जिसमें एक ओर शब्दों में विद्यालय की घंटी के स्वर की बात है तो दूसरी ओर दादा -पोतों के संवाद में पग डंडियों की भाषा में जंगल का आदिम राग की बात भी है . जीवन भर अधिकारों की पग डंडियों पर चलने की बात है . 

दिसुम का सिंगार" में देशज आधुनिकता का बिम्ब , प्रतीक आदि का बहुत ही मार्मिक अभिव्यंजना है . हँसिया, हथोडा , कुदाल , फावड़ा , हल , खुरपी , धान की बालियाँ , ढेंकी का संगीत , हाट-हटिया , अखड़ा, मसना, धान , चावल , हंडिया , ताना भगत , बिरसा मुंडा , पुरखा , बैशाख , जेठ , पानी भात , पोखल भात , धकुड-धकुड ढेंकी का संगीत , मोटिया, पड़िया. सांवा, कोदो , गोंदली , चावल , ज्वार, बाजरा , मकई , खलिहान , गोहार आदि बिम्ब -प्रतीकों के माध्यम से काव्य भाषा में उत्कृष्टता का स्वरुप निखरा है जोकि अनुभूति की अभिव्यक्ति में कहीं भी बाधक नहीं है बल्कि पूरक और सहज -सरल -संवेदनशील बना है . आधुनिक यांत्रिक सभ्यता- संस्कृति ने मानव के जीवन में उदासी का आलम दिया है . उदासी को बतौर बिम्ब आदिवासीसाहित्य में देखा जा सकता है . यह उदासी सिर्फ व्यक्ति की नहीं है बल्कि मानवीय सभ्यता के प्रति उदासीनता का जो भाव तेजी से फैल रहा है , उसी की अभिव्यक्ति है . जैसे पहाड़ उदास है , धरती का उदास रंग , घर घोंसला उदास है .  इस तरह से कवयित्री ने आदिवासी समाज में पांव पसार रहा आधुनिक यांत्रिकी और उसके दुस्स्परिणाम को रेखांकित किया है . आदिवासी कला सृजन ने अपने क्षितिज को विस्तृत किया है . उलिहातु -1  और 2, कोविड महामारी -1, 2 और 3 आदिवासी रचना संसार के विस्तृत फलक को दर्शाता है . कोविड के कारण जब लघु मानव जब बौना संसार में छुपने -रहने की कोशिश कर रहा था तब प्रकृति के अन्य प्राणियों का संसार बसंत की तरह लहलहा रहा था . तब भी निर्दोष का शिकार किया जा रहा था . कवयित्री ने उन्हें 'कोबरा ' नाम दिया है . निश्चय ही कोबरा प्रतीक है उनलोगों का जो जहर देकर कोविड से पीड़ित साधारण लोगों का प्राण ले रहे थे पैसों के लिए . भारत में कोविड कैसे वायुयान से आया . ऑक्सीजन , अम्बुलेंस , दावा आदि की कमी के कारण रुलाई का कोरस ' और लाशों से पटे हुए गाँव शहर -शमशान . सब तरफ स्तब्ध . यह जो भयानक तस्वीर थी उसका शब्दांकन कवयित्री ने किया है . कोविड महामारी -3 में कोविड के कारण उत्पन्न बीमारियाँ , समस्याएँ आदि का चित्रण है . उन्हीं के शब्दों में :

" आत्महत्या , अवसाद , निराशा से 

कोसो दूर थे हम आदिवासी 

पहुंचाते नहीं थे  हम रांची के 

मानसिक आरोग्यशाला में 

जीवन से प्रेम रखने वाली आदिवासी युवती 

बताओ तो कैसे आत्महत्या करती 

ऑनलाइन पढाई के लिए 

मोबाइल न खरीद पाने की पीड़ा 

इतनी सघन क्यों थी कि

उस प्रतिभाशाली आदिवासी छात्रा ने 

कर लिया अपने जीवन का अंत 

अपने माँ -बाप के सपनों का अंत |" पृष्ठ - 102

यह कविता अवसाद , निराशा , और फिर आत्महत्या का चित्रण ही नहीं करती है बल्कि हमें चिंतन के लिए मजबूर करती है . आखिर ऐसा क्या है जो आत्महत्या करनी पड़ती है ! गहराई से छानबीन करने पर पता चलेगा की यह व्यवस्था जन उत्पन्न समस्याओं का प्रतिफलन है . यह एक प्रकार से व्यवस्थाजन द्वारा की गई हत्या है . रोहित बेमुला , पायल तडवी , आदि का इतिहास यही है . मूलतः यह विकास के मॉडल के विरोधाभास से उत्पन्न संकट का सवाल है . कवयित्री ने आदिवासी समाज के विकास को लेकर भी अपनी चिंता और चिंतन को अभिव्यक्त किया है . इस तरह देखा जा सकता है कि आदिवासी साहित्य का फलक दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है . उसका क्षितिज विस्तृत हो रहा है . यह साहित्य संसार के लिए एक सुखद पहलू है . सावित्री बड़ाईक आदिवासी साहित्य संसार की उभरती हुई साहित्यकार हैं जिनका चिंतन और दर्शन आदिवासियत से लबरेज है और उनकी अनुभूति की अभिव्यक्ति में देशज आधुनिकता की प्रक्रिया एवं पद्धति है जो मानवीय संकट से निजात पाने का सन्देश देती है .  


 


 

 

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