साहित्य और दर्शन के सम्बन्ध

 

साहित्य और दर्शन दोनों में पारस्परिक सम्बन्ध है . जबकि दोनों का स्कूल अलग अलग है परन्तु दोनों अलग –अलग होते हुए भी एक दुसरे से जुड़ा हुआ है . पाश्चात्य और पूर्व दोनों ही दुनिया में साहित्य और दर्शन को लेकर विवाद रहा है . पाश्चात्य देशों में प्राचीन काल से लेकर दर्शन और साहित्य को लेकर गंभीर चिंतन देखने को मिलता है . प्लेटो जो कि एक दार्शनिक रहे हैं . उनका साहित्य को लेकर अलग चिंतन है . उन्होंने साहित्य पर आक्षेप भी लगाया और वह विमर्श का विषय बन गया . यह अलग बात है कि उनके शिष्य अरस्तू ने ही उनके आक्षेप की समालोचना किया और साहित्य और दर्शन के सम्बन्ध को फिर एक नयी दिशा दिया. प्लेटो और अरस्तू का यह संवाद सिर्फ दर्शन का ही आधार नहीं है बल्कि समाज को नयी दिशा देता है यही काम साहित्य करता है .

पाश्चात्य दर्शन सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, रेने देकार्त, स्पिनोजा, गाटफ्रीड लैबनिट्ज़, कांट, डेविड ह्यूम, ज्यां-पाल सार्त्र, ए जे एयर, विट्गेंस्टाइन आदि का नाम लिया जाता है . इसी कड़ी में हाबरमास, मार्क्स, हीगल, आदि का भी नाम उल्लेखनीय है. भारत में
 मीमांसा 
दर्शन, न्याय दर्शन ,  वैशेषिक दर्शन,  सांख्य दर्शन, योग दर्शन,  वेदान्त दर्शन, चार्वाक दर्शन, बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन आदि के साथ समकालीन भारतीय दार्शनिक श्री अरविन्द, जोतिबफुले, स्वामी विवेकानंद,   महात्मा गांधी, डॉ आंबेडकर, सर्वपल्ली राधाकृष्णन आदि का नाम लिया जाता है . इन दार्शनिकों के चिंतन और दर्शन में भारतीय समाज की जिन्दगी को समझने का पूरा प्रयास है . जिसका साहित्य से गहरा सम्बन्ध है .

इस सबके बीच यह हमेशा देखा जाना जाना चाहिए कि साहित्य और दर्शन का सम्बन्ध यानी दर्शन का साहित्य, साहित्य का दर्शन और साहित्य में दर्शन इन तीन रूपों में कैसा है. यह यदि सही से समझ लिया जाये तो किसी भी समाज के जीवन को सहजता से समझा जा सकता है और उस समाज का उन्नयन संभव है . इसके बिना को किसी भी समाज का विकास सही दिशा में नहीं हो सकता है . हिंदी में सिद्ध साहित्य, जैन साहित्य , संस्कृत साहित्य, मराठी, तेलगू, संगम साहित्य, भक्ति साहित्य, आधुनिक साहित्य, छायावाद , प्रगतिशील साहित्य , प्रयोगवाद, नयी कविता,  स्त्री साहित्य , दलित साहित्य , आदिवासी साहित्य आदि तो पुरी तरह से दर्शन के प्रभाव में लिखा गया साहित्य है .

 

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