संदेश

अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जीवन मृत्यु

 जीवन मृत्यु जीवन  और मृत्य के बीच भूख तुम तब भी मुझे लगोगी जब मेरी मौत हो जाएगी।

ज्योतिबा फुले का शिक्षा-दर्शन

चित्र
ज्योतिबा फुले के इस कविता में शिक्षा का पूरा दर्शन देखा जा सकता है . किसी भी समाज, राष्ट्र और शिक्षण संस्थान के लिए ज्योतिबा फुले का यह चिंतन और विचार ही उसे एक विकसित समाज , राष्ट्र बना सकता है तो उन  शिक्षण संस्थानों को उत्कृष्ट बना सकता है .यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो ज्योतिबा फुले के विचारों को आत्मसात करना होगा. अन्यथा भारत में एक समूह का विकास तो हो सकता है लेकिन सम्पूर्ण समाज का नहीं, क्योंकि भारत का बहुजन समाज अभी भी शिक्षा से महरूम है और उसकी ओर भारत सरकार और यहाँ के प्रबुद्ध वर्ग ध्यान नहीं दे रहा है . भारत के सभी मानव संसाधन और उनके विकास के तंत्र ब्राह्मणवादी सम्रज्यावाद के गिरफ्त में है . उससे मुक्त किये बिना भारत का विकास संभव नहीं है . मुक्ति का उपाय सिर्फ भारतीय संविधान के अनुरूप कार्यों और योजनाओं को तैयार करना और उससे ज्यादा लागू  करना है . सबसे बड़ी समस्या यहीं है कि योजनाओं को सही से लागू नहीं किया जाता है या होने नहीं दिया जाता है. जैसे ही आप संवैधानिक मूल्यों के अनुसार योजनाओं को लागू करते हैं तो ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद टूटने लगता है जिसे इस म...

अज्ञेय की काव्यभाषा : चिंतन और विश्लेषण

vKs; dh dkO;Hkk"kk% fparu vkSj fo'ys"k.k MkW- izoh.k dqekj pravinkmr05@gmail.com     izLrkouk% Hkk"kk flQZ vfHkO;fDr dk ek/;e ugha gS cfYd og ;qxcks/k dh lH;rk&laLd`fr vkSj bfrgkl dk Hkh okgd gSA vKs; dh dkO;Hkk"k Hkh cgqr dqN ,slh gh gSA mudh dfork dh laosnuk mudh Hkkf"kd ltZuk dh cqukoV esa ls iwjh rjg ls Nudj vkrh gSA blh ls vKs; u dsoy ;qx dh /kkjk dks LFkkfir djrs gSa cfYd fganh lkfgR; ds bfrgkl esa dfork&lalkj dks Hkh u;s fljs ls jprs gSaA ;wa Hkh dg ldrs gSa fd dfork varr% ,d Hkk"kk gS vkSj mlds vkLoknu dk vk'k; gS mldh Hkk"kk ds izfr laosnu'khy gksukA mldh vkykspuk ;k O;k[;k Hkk"kk esa O;Dr fopkjksa dk v/;;uA izLrqr 'kks/ki= eas vKs; dh dkO;Hkk"kk dk fparu muds dkO;&lalkj ds vk/kkj ij fd;k x;k gSA    cht 'kCn % Hkk"kk] vKs;] dkO;Hkk"kk] lkSUn;Z] vfHkO;fDr] iz;ksxokn] izrhd] fcEc] vuqHkotU; Kku   fo"k; foLrkj% fganh lkfgR; ds bfrgkl esa ghjkuUn lfPpknkuUn okRL;k;u^ vKs...

बहुजन दर्शन

समय है हम सब यह महसूस करें कि हम एक हैं। हम बहुजन समाज के प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। हम पर जिस प्रकार से अपने परिवार का दायित्व है वैसे ही अपने समाज का भी दायित्व है। हम अपने समाज के अधिकारों के लिए आज खड़े हैं और साथ साथ हैं। यही संकल्प होना चाहिए और हमारी एकता में ही हमारा अधिकार और जीवन मूल्य सुरक्षित है। इसे इस प्रकार से समझिए एक सवर्ण हमेशा सवर्ण होता है और वे हमेशा इसे महसूस भी करते हैं और करवाते भी हैं। उनमें जातीय चेतना भी है और एकता भी। इसलिए उनके अधिकार हमेशा सुरक्षित है और वे गलत होकर भी अपने को सही कर लेता है और हमेशा अपनी सवर्ण जातीय समूह की चेतना को महसूस करते हुए अपनी गलती पर भी जीत हासिल कर लेता है। उम्मीद है हम सब इसे महसूस करें और अपने संवैधानिक अधिकार और जीवन मूल्यों के लिए एक साथ मिलकर संघर्ष में एकता को जिंदा रखें। विगत एक दशक में ओबीसी समाज के कुछ साथी कम्फर्ट जोन की तलाश कर आजकल यह सोचने लगे कि जेनरल पोस्ट पर फॉर्म भरेंगे और नौकरी मिल जाएगी। ऐसा हो , अति उत्तम है लेकिन आज तक ऐसा कम हुआ , और अब तो नहीं होगा। वर्तमान परिदृश्य यही कहता है। बाद बाकि हम सब समझदार हैं। ...

घर बे घर

देखो! देखो! वह निकल पड़ा है घर से। पार कर लिया है दहलीज अब लौट कर नहीं आ एगा कहा नहीं जा सकता आएगा या नहीं! मगर उनके पेट में लग गई है आ ग आ ग.... जिसमें झुलस कर वह मर जाएगा। शायद ऐसा क्यों? मुझे नहीं पता मगर याद आ रही है 4पीएम से 8पीएम के बीच का चक्र जिसमें फासला भी है और फैसला भी। नहीं यह तो जीवन चक्र था जिसमें वह रोज ही पिस्ता आ रहा है लेकिन यह तो 8पीएम से 12 ए एम के बीच का घनी चक्कर है इसके लपेट में जो आता है वह बचता नहीं है करो ! ना! कुछ! वह पास पास है उसे दूर करो ना उससे दूर रहो ना हुआ तो अच्छा ही परन्तु चूक हो गया इस चूक ने किया है हर बार घर बे घर उनका क्या ? शाह है शाही है जारशाही और हिटलरशाही भी उधर तो सब कुछ है खाली ! थाली है खाली। बजाओ खूब ताली जोर से और जोर से थाली हम भी! तुम भी! बजाओ ताकि सुने कोई और आये और भरी जाये थाली। @प्रवीण कुमार

भारत मां

भारत मां भारत मां देखो न तुम्हारी बेटियों के साथ क्या हो रहा है... तुम्हारा श्रवण कुमार सेवक कहीं खो गया है इस वक्त युगों युगों से यही हो रहा है क्या? तो फिर हो कहां? किस गुफ़ा में ध्यान मग्न हो भारत मां और भी बुड़ा होने के इंतजार में? सृष्टि के खत्म होने तक चिताओं की लाल लाल लपटों के बीच विश्वगुरु की ध्वनिमय वातावरण में तुम भी खाक हो सकती हो। इन ब्रह्म वादी नीति नियंताओं और नियंत्रकों के ब्रह्मनीती में जननी की यही कहानी इतिहास में दर्ज है? फिर बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ क्या ? क्यों? कैसे? हे भारत मां भारत की माताओं तुम ही बताओ हे भारत मां, गंगा मां के सपूत तुम ही बताओ? @प्रवीण कुमार

शिक्षा: चिंतन और दर्शन

  शिक्षा और शिक्षण संस्थान किसी भी देश के विकास के मॉडल को प्रस्तुत करता है। और उस देश की सरकार के दर्शन और चिंतन की ऊँचाई को बताता है। वह मानव होने का जिन्दा प्रणाम होता है और मानुष तत्व को संजोते हुए सभ्यता संस्कृति का परिचायक होता है। jnu निश्चित ही एक ऐसा संस्थान है जिससे देश की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरष्ट्रीय स्तर पर है। भारत  और भारत सरकार के विकास योजना को लागू करने में jnu का अपना योगदान है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। jnu हमेशा तर्क, वैज्ञानिक सोच, चिंतन और संवाद-विमर्श के साथ साथ सवालों , विरोध और विचारों के जाना जाता है। हिंसा की बारदात पहली बार ही सुना है। हिंसा की संस्कृति विकास और अमानुषता की संस्कृति है। यह कभी भी और कहीं भी हो उसे उचित तो नहीं कहा जा सकता है। jnu में हिंसा एक शिक्षण संस्थान की संस्कृति के खिलाफ है। यह किसी भी संस्थान के लिए सही नहीं है बल्कि यह संस्थान के प्रशासन, उसकी सुरक्षा व्यवस्था की गलती के साथ साथ सरकार की व्यवस्था की चूक है कि वहां हिंसा की बारदात हुई। आखिर सवाल उठना लाज़मी है कि जहाँ साधारण व्यक्ति नहीं जा सकता है वहां ये असामाजिक तत्व...