जंगल पहाड़ के पाठ: कुछ ज्वलंत और कुछ जीवंत
जंगल पहाड़ के पाठ:
कुछ ज्वलंत और कुछ जीवंत
डॉ. प्रवीण कुमार
pravinkmr05@gmail।com
सारांश:
प्रस्तुत शोध आलेख महादेव टोप्पो के
काव्य-सौन्दर्य पर आधारित है। इसमें महादेव टोप्पो की काव्य-रचना-प्रक्रिया और
उसके सौन्दर्यबोध के विविध पक्षों का विवेचन-विश्लेषण कर मूल्यांकन किया गया है।
बीज
शब्द :
महादेव टोप्पो, आदिवासी साहित्य, आदिवासी
कविता, काव्य-सौन्दर्य, जीवन-मूल्य, दलित-संघर्ष, जाति–दर्शन, मानवीय-मूल्य, आदिवासी
चेतना, सौन्दर्यबोध
मूल
आलेख :
‘जंगल
पहाड के पाठ’ पुस्तक महादेव टोप्पो का काव्य संग्रह है। इस
संग्रह में सन्1980 से लेकर सन्2014 तक
लिखी हुई कविताओं को शामिल किया गया है जोकि जंगल पहाड़ के परिवेश एवं अनुभव पर
आधारित है। इससे कविता की रचना-प्रक्रिया को सहज ही समझा जा सकता है। इस रचना
प्रक्रिया में स्वानुभूति की आग और जीवन सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। यह सौन्दर्य
प्राणीजन की जिंदगी, परिवेश, वातावरण,
प्रकृति, प्राकृतिक संसाधन, उसकी उपयोगिता, सामाजिकता, सरकारी
नीतियों, उन नीतियों का क्रियान्वयन एवं जनकल्याण का सामाजिक
सरोकार से सम्बद्ध प्रतिरोध की संस्कृति, आक्रोश, आदि के साथ-साथ मानवीय उम्मीद, आशा, आकांक्षा, स्वप्न, इतिहास,
मानवीयबोध इत्यादि को वैश्विक प्ररिप्रेक्ष्य में देखता है। जिसमें एक तरफ सभी प्राणियों के जीवन संकट एवं
उसको बचाने से जुड़ा चिंतन-दर्शन, अस्तित्व, अस्मिता आदि से जुड़ी संस्कृति है तो दूसरी तरफ इन सबको लिलती हुई संस्कृति
का नई-नई जादुई स्वप्न है जोकि विकास के नाम पर पूंजीवाद, विस्तारवाद,
उपभोक्तावाद, नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों
को खत्म करती हुई पुलिसिया संस्कृति है।
‘जंगल पहाड़ के पाठ’ का सौन्दर्य उसकी रचना-प्रक्रिया
और परिवेश की स्वानुभूति के बीच से छनकर निकल रहा है। 'पुरखा संस्कृति' आदिवासी ही
नहीं बहुजन समाज की मूल संस्कृति है। यह पुस्तक ‘पुरखों’
को समर्पित है। यह अचानक नहीं है और न ही रचना प्रकाशन की रीति ही
है बल्कि इसमें पूरी आदिवासी संस्कृति रची बसी है। आदिवासी संस्कृति का मूल आधार
ही जीवन-सौन्दर्य है। जीवन को सौन्दर्यपूर्ण बनाने हेतु आदिम मानव द्वारा किए गए
प्रयास जल, जंगल और जमीन आदि पर्यावरणीय तंत्र को संतुलित
बनाते हुए मानवीय संस्कृति-सभ्यता की आधारशिला रखा गया। यह समर्पण उन्हीं आदिम
मानव-पुरखा को है जिन्होंने हम सब के लिए धरती को सुन्दर बनाया, उसे सजाया-संवारा और मानवीय वातावरण तैयार किया। यह ‘हूनर-लूर जिसे आज कौशल सम्बर्द्धक भी कहा जाता है न केवल मानवीय
सभ्यता-संस्कृति को आधुनिक बनाया बल्कि हमारी रक्षा और मार्गदर्शक भी बना है;
परंतु यह विडम्बना ही है कि आधुनिक तंत्र की महत्त्वाकांक्षा के
निमित्त मानव ने अपने अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया।
इस संग्रह की पहली कविता ‘जंग लगे तीरों पर नयी धार लाने का गीत’ है। यह कविता
वर्तमान पर्यावरण संकट और आदिवासी अस्तित्व के संकट की कहानी कहती है। कविता में
नदियों को बांध कर या नदियों के ऊपर बांध बांधकर विकास की जो योजना बनाई जा रही
है। यह योजना मानव निर्मित और प्रकृति के दोहन की धारणाओं से संचालित है। इस मानव
निर्मित योजना में दूरदृष्टि का अभाव है जिसके कारण नदियों का पानी जनजीवन को
असामयिक ढंग से प्रभावित कर रहा है। परिणाम यह है कि आज बाढ़, अकाल, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि,
भूस्खलन आदि प्राकृतिक घटनाएं घटित हो रही हैं। दिन-प्रतिदिन बढ़ रही
इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि मानव-निर्मित विकास की अवधारणाएं बिना किसी
दूर्दृष्टि से तैयार की जाती हैं। इस कविता में नदियों के ऊपर स्वर्णरेखा, मयूराक्षी, कोयल, कारो,
कन्हर, दामोदर आदि के ऊपर जो बांध बांधा जा
रहा है, इस बांध के कारण नदियों का झूमना बंद हो गया है। इसकी रचना-प्रक्रिया में
आधुनिकता की फूहर संस्कृति के बीच आदिवासियों में जो नया भाव-बोध पैदा किया है।
उसके कारण वह न केवल अपनी आदिवासी संस्कृति से पलायन कर रहा है बल्कि आदिवासियत से
भी अपरिचित होने लगा है। यह जो पलायन और अपरिचित होने का बोध आधुनिक विकास के मॉडल
की खामियों की वजह से उत्पन्न किया जा रहा है या हो रहा है। यह बहुत ही खतरनाक है।
इसका यह अर्थ भी नहीं किया जाना चाहिए कि आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा या चेतना से
महरूम हुआ जाए। आधुनिक वैज्ञानिक चेतना की शिक्षा की जड़ आदिवासियत एवं आदिवासी
संस्कृति में निहित है। उसका मूल्य उसमें छिपा हुआ है। जरूरत है सिर्फ आधुनिक
वैज्ञानिक तंत्र के साथ उसकी सम्बद्धता एवं उसके विकास को बिना किसी अतिरिक्त
महत्त्वाकांक्षा के विकसित करने की। आज जब विकास का मॉडल सिर्फ और सिर्फ पूंजी
कमाने की महत्त्वाकांक्षा पर टिका हुआ है । विकास के नाम पर राष्ट्रीय संसाधनों,
प्राकृतिक संसाधनों को निजी स्वामित्व के हाथों लूट के लिए नीतिगत
रूप से दिया जा रहा है तब बड़ी सामाजिक परिवर्तन का होना अनिवार्य है। यह सामाजिक
परिवर्तन जंग लगे तीरों पर नयी धार लाने से ही होगा। महादेव टोप्पो ने इस
सांस्कृतिक गीत(सरहुल के उत्सव के बाद उराँव आदिवासी के द्वारा गाये जाने वाले
गीत) के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का आगाज़ करते हैं। उन्हीं के शब्दों में
‘‘ताकती है आशा-भरी निगाहों से
आज स्वर्णरेखा, कोयल,
कारो, दामोदर, मयूराक्षी
तुम्हारे जंग लगे तीरों की ओर
और तुम हो कि गिटार की धुन पर
मटका रहे कूल्हे
थिरका रहे पाँव -सरहुल के जुलूस में
मिलेगा नहीं इससे तुमको
कभी आत्मबल
और न होगा कभी इससे तुम्हें अपने अस्तित्व का ज्ञान
बेहतर है रचो नया कोई गीत जदुर
कैद होती स्वर्णरेखा,कोयल,
कारो, कन्हर,दामोदर की
मुक्ति का
स्वयं को जानने-पहचानने का
और जंग लगे तीरों पर
नयी धार लाने का।’’1
यह कविता सन् 1988 की है जिसमें विकास के दो मॉडल को स्पष्ट ध्वनि तरंगित हो रही है। कौन है
जो प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का उद्यम कर रहा है और कौन है जो इसे
लूटना चाहता है? इसकी पहचान जरूरी है। दूसरी बात यह वही दौर
है जब पूरी दुनिया में शीतयुद्ध और उदारीकरण के बहाने बाजारवाद को स्थापित करने का
प्रयास किया जा रहा था। भारत इससे अछूता नहीं है। नब्बे के दशक में यहां भी निजीकरण
और उदारीकरण की हवा तेज हो रही थी और साथ में सूचना क्रांति की बयार बहने लगी थी।
आज निजीकरण, उदारीकरण, सूचनाक्रांति,
बाजारवाद, भूमंडलीकरण आदि से किसको फायदा हो
रहा है? आदिवासी समाज बहुजन समाज का तो दोहन ही हो रहा है।
इन सबकी मार तो इन्हीं समाज पर सबसे ज्यादा पड़ रही है। आखिर क्यों? यह विचार किया जाना चाहिए। इस पर चिंता क्यों नहीं? क्यों
सरकार नीतिगत रूप से राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों को विकास, रखरखाव एवं निवेश के निमित्त निजी स्वामित्व को सौंप रहा है? इसीलिए कवि विकास के इस मॉडल की प्रकृति की पहचान करते हुए यह कहते हैं कि
‘मिलेगा नहीं इससे तुमको कभी आत्मबल’ और
न ही कभी इससे तुम्हें अस्तित्व का ज्ञान ही होगा’। आत्मबल
और अस्तित्व के ज्ञान के बिना जिंदगी का सौन्दर्य कहां? यह
दोनों ही मन-मस्तिष्क की ऊर्जा है। यह ऊर्जा नहीं तो जिंदगी कहां? विकास तो दूर की बात हो जाती है। इसी लिए कवि बेहतर हेतु किसी नये गीत
जदुर(गीत है उराँव आदिवासी समुदाय का) को रचने की बात करता है। उसी में उनकी मुक्ति है। उसी से वह स्वयं को पहचान सकता
है। और उसकी ध्वनि-उत्स है जंग लगे तीरों पर नई धार। इस नई धार के हेतु-प्रयोजन
दोनों ही स्पष्ट है। ‘विरोध’ कविता की
इस पंक्ति से इसे समझा जा सकता हैः
‘‘इसलिए करते हैं हम
अपने घर-खेतों-जमीन की बात
जिसे अपने हाथों से खोदा
बनाया हमने और सींचा
इसीलिए करते हैं
विरोध उन ताकतों का
जो इनके विरूद्ध होती हैं खड़ी।’’2 (जंगल पहाड़ के पाठः 71)
आदिवासी समाज का यह विरोध क्यों और किसलिए ?
इस पर बहुत स्पष्ट शब्दों में महादेव टोप्पो ने लिखा है कि बीमार मन
से किसी भी समस्याओं का इलाज करने पर न किसी आदमी की बीमार का इलाज हो सकता है और
न ही देश का इलाज। यानी विकास के लिए, देश की समस्याओं को
दूर करने के लिए मनोमस्तिष्क का स्वस्थ्य होना अनिवार्य है। स्वस्थ्य विचार और
स्वस्थ्य मन से ही जीवन स्वस्थ्य होता है। मन, परिवार-समाज
में खुशहाली आती है। अन्यथा वह कठोर चुभन, टीस बनकर मन में उठता है। कचोटता है।
इसीलिए को वाणी देती है उनकी कविता ‘ज्ञान’। द्रष्टव्य है कविता की पंक्तियां:
‘‘तुम्हें मेरी कविताओं में
मेरे भाव, विचार,
मेरे शब्द
कठोर या कटु लगते होंगे
कुछ अनुभव, कुछ
सवाल
तुम्हें असहज करते होंगे
लेकिन ऐसा कहना है जरूरी
.............................................
फैल गयी हैं तरह -तरह की बीमारी
जानो, दोस्त कि बीमार-मन
से
कर सकते नहीं कभी
न किसी आदमी और न किसी देश का इलाज
कि बार-बार बड़ी मछली,
छोटी मछली को निगल नहीं सकती
बदहाली देखकर अपने पूर्वजों का
हो रहा है ज्ञान अपनी सुरक्षा का।’’3 (जंगल पहाड़ के पाठः 68)
देखिये किस प्रकार से न्याय व्यवस्था,
सामाजिक समस्याओं के इलाज, के साथ-साथ प्राचीन
समस्याओं के जिम्मेदार लोगों को कवि ने कठघरे में खड़ा किया है। आदिवासी समाज की
बदहाली का सवाल केन्द्रीय तत्त्व बन कर उभरा है। इसमें इतिहासबोध भी है और भविष्य
की संकल्पना भी। तभी तो वह कहता है ‘हो रहा है ज्ञान अपनी
सुरक्षा का’। असुरक्षा, बदहाली,
संसाधनविहीनता, आर्थिक तंगी, मानवीय उपेक्षा, जीवनमूल्यों की वंचना आदि से
अनुस्यूत अनुभवजन्य ज्ञान से जब कोई शब्द निकलता है तो वह किसी को भी असहज कर देता
है। आदिवासी क्या बहुजन समाज के किसी भी समुदाय से अनुभूति की अभिव्यक्ति जब कभी
भी होगी तब वह ब्राह्मणवादी, हिन्दुस्तानी साम्राज्यवादी को
असहज लगेगा ही। इसी असहजता के कारण ये ब्राह्मणवादी हिन्दुस्तानी साम्राज्यवादियों
ने आदिवासी को मानवीय अस्तित्व-अस्मिता, गरिमा से विहीन करने
हेतु उन्हें ‘वनवासी’ कहता है। ‘वनवासी’ की धारणा ही न केवल आदिवासी समाज को मानवीय
अस्तित्व से विहीन करता है बल्कि इस धारणा में एक गहरी राजनीति के चेतनशीलता भी है
जोकि गुप्तपदेन है। वह है प्राकृतिक संसाधन और राष्ट्रीय संसाधन में लोकतांत्रिक
भागीदारी का सवाल। इस ‘वनवासी’ में
अलगाव की धारणात्मक बीज है जोकि मुख्यधारा के लोगों के लिए सहज हो जाता है उनके
स्वयं के लिए अलग करके देखने का। और शिष्ट के नाम पर ‘गोरखधंधा’
चलाने का। यह ‘वनवासी’ और ‘गोरखधंधा’ की दुकान जगह-जगह लग गई है और लगाई भी जा रही है जिसमें साम्प्रदायिकता की
बू है। ‘साम्प्रदायिकता’ इसीलिए कि
आदमी के रूप में आदमी ने पाश्विकता की क्रूर प्रवृत्ति को धारण कर लिया है। इस
साम्प्रदायिक पाश्विक प्रवृत्ति के कारण मानव और मानवता दोनों खतरे में है। ‘तुम्हारी मुख्य-धारा में’ कविता में इसकी बानगी देखी
जा सकती है। इस कविता में महादेव टोप्पो ने मुख्यधारा की परत-दर-परत रेशों को उघारकर
रख दिया है। वह स्पष्ट शब्दों उन्होंने
कहा है, ‘‘नहीं, वहां वह कुछ नहीं,
जिसे समझूं मैं’’। यह साहस ही कवि की शक्ति
है। यह शक्ति उन्हें उनके परिवेश, सामाजिक वातावरण, संस्कृति और सबसे ज्यादा पर्यावरण के सान्निध्य से प्राप्त हुआ है। वह
मुख्यधारा की धारणाओं को ठुकरा देता है और अपनी प्रकृतिमय कुटिया, बगिया में, अपने गांव को लौट जाना चाहता है। जहां
आदमी है नरपिचाश नहीं। द्रष्टव्य है कविता की ये पंक्तियां:
‘‘
नहीं, वहाँ वह कुछ नहीं, जिसे समझूँ मैं
पवित्रता तुम्हारी मुख्यधारा की
इसलिए चाहता हूँ लौटना
तुम्हारी मुख्यधारा से छिटककर
पहाड़ों में बहती क्षीण-धारा के करीब
अपनी कुटिया, अपने
गांव में
जहां आदमी कम-से-कम
आदमी के रूप में नहीं, कोई
पशु क्रूर
आदमी ही है अपने चेहरे के अन्दर और बाहर।’’4(जंगल पहाड़ के पाठः 70)
इन पंक्तियों से एक और बात गौरतलब है
कि महादेव टोप्पो मुख्यधारा बनाम हाशिये का समाज की जो बहस है, उसकी परतों को
खोलना चाहते हैं। तथाकथित मुख्यधारा के लोग आदिवासी समाज को असभ्य कहता है लेकिन
वह कभी यह नहीं सोचता है कि आदिवासी समाज भी उनकी इस प्रवृत्तियों को नकारता है।
जिस पवित्रता, सच्चाई, सहृदयता,
शिष्टाचार, स्वच्छता, ईमान,
करुणा, दया, एकजुटता आदि
का सवाल मुख्यधारा के लोग उठाते हैं वह वहां है ही नहीं। वह तो आदिवासी समाज के
लिए कोई मायने नहीं रखता है, क्योंकि वह समाज तो इसे जीता
है। वह कहता नहीं है बल्कि करता है। वहीं मुख्यधारा के लोग यह सब कहता है लेकिन वह
करता नहीं है। इसीलिए महादेव टोप्पो डंके की चोट पर मादर की थाप के साथ कहते हैं कि
वहां वह कुछ नहीं, जिस समझूं मैं। अर्थात सीधे-सीधे नकार का
भाव। यह आदिवासी समाज की दृष्टि है। आज भी कोई सूटबूट वाला व्यक्ति आदिवासी समाज
में चला जाए तो वे लोग उन्हें नकार कर छुप जाते हैं। क्योंकि वह दिकु है। जोकि
उनकी अस्मिता-अस्तित्व को संकट में डालता है। उनसे दूर रहना वह उचित समझते हैं।
परंतु परजीवी वर्ग का यह मुख्यधारा उसे अपनी कीमत पर बदलना चाहता है। यह दृष्टिदोष
है या चश्मे का फर्क। इसे समझने की जरूरत है।
आदिवासी
समाज हिन्दू है या नहीं। यह बहुत गंभीर चर्चा का विषय रहा है। यह सच्चाई है कि
औपनिवेशिक शासनसत्ता और बाहरी लोगों का भारत में प्रवेश के कारण आदिवासी समाज में
एक वख्त बहुत बड़ी संख्या में अन्य धर्मों में धर्मांतरण हुआ। यह क्यों हुआ?
कैसे हुआ? यह अलग से अनुसंधान का विषय है।
परंतु अब तक धर्मांतरण का इतिहास इतिहास यही कहता है कि बेतहर सम्मानपूर्वक,
समानतापरक जीवन की तलाश ही मूलतः धर्मांतरण का कारण रहा है। बड़े
पैमाने पर आदिवासी समाज ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। इसके पीछे तो ईसाई
मिशनरियों की शिक्षा व्यवस्था ही रही है। उनका चिकित्सीय पद्धति ही रहा है कि विषम
परिस्थितियों में उन्होंने रोटी, कपड़ा और दवादारू की
व्यवस्था किया है। यह अलग बात है कि ईसाई धर्म स्वीकार करने के पश्चात भी उनकी
स्थिति उतनी बेहतर नहीं हुआ जितनी उम्मीद की जा सकती है, परंतु
इससे कौन इंकार कर सकता है कि उनकी स्थिति बेहतर हुई। स्वयं बिरसा मुण्डा ने ईसाई
धर्म में ही प्रारंभिक शिक्षा पाई तत्पश्चात ही उनकी चेतना सही-गलत का फैसला किया।
बाद में चलकर उन्होंने आदिवासी धर्म की स्थापना किया। इसका अभिप्राय यह कतई नहीं
है कि आदिधर्म पूर्व में नहीं था। वह मौजूद था। उसकी संस्कृति आदिकाल से चली आ रही
थी। बिरसा मुण्डा ने तो धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाई। आदिवासी समाज को उनकी खुशी
उन्हें लौटाने की बात की। लौटाई ही नहीं बल्कि आदिधर्म की पद्धति-संस्कृति भी पुनः
स्थापित किया। आज तक आदिवासी समाज पुरखा धर्म का पालन करता आया। तत्कालीन या
कालांतर में यह देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे बाह्य हस्तक्षेप होता गया आदिवासी
समाज में विचलन पैदा किया। सर्वप्रथम वेद-पुराण, रामायण,
कुरान, बाइबल, त्रिशुल,
हँसिया के ऊपर हथौड़ा आदि दिया गया और उसी आधार पर जबरन जीवन जीने को
प्रेरित किया गया। जबकि हकीकत यह है इसके बदले आदिवासी समाज की खुशी का नष्ट किया
जाता रहा है। मुक्ति और शोषण से मुक्ति के नाम पर लगाया क्रांतिकारी अभियान
वस्तुतःआदिवासी के शोषण का आधार ही बन गया। इस द्वंद्व और अंतर्विरोध को महादेव
टोप्पो ने अपनी कविता ‘मैं खुश था’ में
बहुत ही बारीक ढंग से चित्रित किया है। और
यह समझाने का प्रयास किया है कि आदिवासी समाज तो पहले ही से पुरखों के दर्शन से
बहुत खुश था परंतु कालांतर में बाहरी लोगों-दिकुओं के हस्तक्षेप ने उनकी खुशी को
मुक्ति के नाम पर निगलता चला गया। आज आदिवासी समाज में वेद, पुराण,
रामायण, कुरान, गुरुग्रन्थ
साहेब, हँसिया, हथौड़ा, संविधान आदि सब
कुछ पढ़ा गया। हनुमान का वंशज बताया जा रहा है। सभी भाषाएं -अंग्रेजी, हिंदी, अन्य भारतीय भाषा भी है, सुख-सुविधा के सभी साजोसामान भी है लेकिन क्या नहीं है इनके पास। वे कहते
हैं कि आज उनके पास पुरखों की जमीं नहीं है। भूमिहीनता की समस्या आज आदिवासी समाज
में सबसे बड़ी समस्याएं हैं। जबकि सच्चाई यह है कि उनके पुरखों ने कितने संकट झेलकर
शेर, तेन्दुए, बाघ भालू, हाथी, सांप, बिच्छुओं आदि से
संघर्ष करते हुए मेहनत से पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेत बनाया और जीवन खुशहाल था। परंतु
उनकी इस खुशी को तथाकथित सभ्य कहे जाने वालों ने कहा वे खुश नहीं है। यह जो मानसिक
द्वंद्व पैदा किया। उसके कारण आदिवासी समाज की जमीन उनसे छीन गई। विकास के नाम पर
आदिवासियों की जमीन को कॉरपेट जगत को दे दिया गया। डैम्प बनाकर की गई विकास योजना
की हकीकत आज किसी से छुपा हुआ नहीं है। इस सब से आदिवासी समाज का विस्थापन ही हुआ।
उनकी संस्कृति छिनभिन्न हो गई। यह सब एक साजिश के तहत ही किया गया। भूमिसुधार
कानून के कारण निरंतर आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने का षड्यंत्र रचा जा
रहा है। इन सब के खिलाफ वर्तमान आदिवासी समाज चेतनशील हैं और वह इसका प्रतिरोध
करता है। पुरखा-संस्कृति और आदिवासियत के कारण निर्मित चेतना आदिवासी समाज के
विकास की नई धारा का इतिहास लिखेगा। महादेव टोप्पो की कविताएं इन्हीं जीवन
सौन्दर्य की स्थापना करती हैं। वे लिखते हैं:
‘‘बस एक चीज नहीं है- हमारे पास
हमारे पुरखों के कब्रगाहों से,
ससनदिरी से
सरचना से मसना से
उनकी आत्माओं से जुड़ी
उनके खून पसीने से सनी
खेत और जमीन हमारी।’’5 (जंगल पहाड़ के पाठः 10)
प्राचीन
काल से लेकर वर्तमान तक भारत में बहुजन समाज की सबसे बड़ी समस्या उनकी भूमिहीनता ही
है। संसाधनविहीनता ही है। यह सब हुआ हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद के कारण। औपनिवेशिक
साम्राज्यवाद तो बाद में आया। दोनों साम्राज्यवाद में हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद
सबसे ज्यादा खतरनाक है जो निरंतर आज भी धर्मांतरण और घर वापसी के नाम पर
आदिवासियों का हिन्दूकरण कर रहा है। आदिवासी साहित्य में इसके खिलाफ एक प्रतिरोध
का स्वर तो है ही। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब आदिवासी समाज इस हिन्दुस्तानी
साम्राज्यवाद की क्रियाशीलता की पहचान कर लिया है। कभी ज्ञान तो कभी विज्ञान कभी
मैरिट के नाम पर बहुजन समुदाय में अंतर्विरोध पैदा कर उन्हें छला जाता है। जाति की
नींव पर टिका हुआ हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद 90 सैकड़ा
की आबादी को छलता है। उनका शोषण करता है। उनकी पहचान जाति के आधार पर की जाती है
और उन्हें तमाम मानवीय मूल्यों से वंचित किया जाता है। आलम यह है कि सरकारी ऐजेसियों के माध्यम से आदिवासी समाज को
हिन्दू धर्म और जाति प्रमाण निर्गत किया
जाता है। इन्हीं प्रमाण पत्रों के माध्यम से उनकी पहचान और उन्हें चतुर्थ श्रेणी
का नागरिक समझा जाता है। इस अंतर्विरोध को महादेव टोप्पो ने शिनाख्त किया है। और
उससे सवला करता है आखिर कब तक यह सब चलेगा? उनकी कविता ‘त्रासदी, एक आशा’ इन्हीं
प्राचीन और आधुनिक ता के बीच के द्वंद और अंतर्विरोध को उजागर करती है। यह द्वंद
और अंतर्विरोध विकास के मॉडल, सभ्य-असभ्य के मानदंड, आदिवासी संस्कृति-दर्शन बनाम गैर आदिवासी संस्कृति-दर्शन, शहर बनाम गांव, श्रम सौन्दर्य के प्रति दृष्टि आदि
का है। हिन्दुस्तानी साम्राज्यवादियों ने अपनी महत्त्वाकांक्षा की आपूर्ति हेतु
आदिवासी-बहुजन समाज को एक पहिया बना है जोकि निरंतर अनवरत घूम रहा है ब्राह्मणवादी
विचारधारा की परिधि में। यदि कोई सवाल पूछा जाता है तो सवालिया निगाहों से न केवल
देखा जाता है बल्कि विदेशी हाथ का आरोप मढ़कर षड्यंत्र भी रचा जाता है। बौद्धिक
संकट का आलम यह है कि आदिवासी समाज के उत्थान के लिए खूब पुरस्कार और योजनाएं बनाई
जाती हैं लेकिन आज भी आदिवासी समाज में मानवीय मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखा जा
सकता है। ऐसा क्यों है? यह न केवल चिंता का विषय है बल्कि
विचारणीय और पुनर्मूल्यांकन का भी विषय है। 'जंगल पहाड़ के पाठ' हमें इस पर विचार
करने के लिए विबस करता है। साहित्य, भाषा, संस्कृति, सौन्दर्यबोध, सरकारी-गैरसरकारी
योजनाओं आदि सभी का पुनर्मूल्यांकन करने पर बाध्य करता है। इस आशा और त्रासदी को
महादेव टोप्पो की इन पंक्तियों से समझा जा सकता हैः
‘‘आधुनिकता और प्राचीन परम्परा
इन दो पाटों के बीच दबा
शहर और जंगल की ओर
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की यात्रा करता
होता हूं सवार कभी कार पर
कभी बैलगाड़ी पर
दुविधाओं की धूल पीछा नहीं छोड़ती
जंगल से शहर
और शहर से जंगल की सड़कों तक
तब-
मैं एक जंगली, एक
आदिवासी
महसूस करता हूं घुटन
कि असभ्य से सभ्य बनने की कोशिश में
जीवन की अन्धी दौड़ में
एक पुर्जा बनता जा रहा हूं
न बन पा रहा हूं अमीर और न सभ्य
और न बचा पा रहा हूं अपना आदिवासीपन
न पुरखों की विरासत।"6 (जंगल पहाड़ के
पाठः 16)
कविता की इन पंक्तियों से यह समझ में
आता है कि मूल समस्या कहां है? समस्या तो दृष्टिदोष
की है। आदिवासीपन और आदिवासियत को न समझ पाने की है। सभ्य-असभ्य की दृष्टि की है।
शहर और जंगल के दो पाटों के बीच की है। इन सब से मुक्त होने का एक ही आधार है कि
स्वयं के अनुभव से स्वयं को देखना।
क्योंकि हममें से ही कोई था बिरसा, तांत्या, जतरा, सिदो, कान्हू, तिलका और भी अनेक नाम। पंरतु आज क्या है? अपनी ही
धरती पर सोने, हीरे की खान होते हुए भी हमारी हैसियत एक
मजदूर की सिर्फ होती है और सारी सम्पदा कोई और लेकर जाता है। कस्तूरी मृग की तरह
हमारी स्थिति है। हमें अपने अनुभव की कला से अपने सूरज की रोशनी की तलाश करनी
होगी। इन प्रस्थिति की बहुत ही बारीक समाजशास्त्रीय अध्ययन है महादेव टोप्पो की।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि परायी आंखों से खुद को देखने के कारण ही
हमें अपने ही अंदर छिपी शक्ति का एहसास नहीं होता है और हम हाथ जोड़े दास बने रहते
हैं। हम हनुमान के वंशज नहीं है। यह आत्मसंदेह पैदा करता है हमें और हमें नशे में
डुबाता है। ईसाराम हतो इनके ही चांद,
सितारे हैं। जिसे हम निहारते हैं। हमें ‘अपने
अनुभवों के सूरज से इसकी चकाचौंध को समझना होगा। अन्यथा हम अपरिचित रहेंगे । औैर
हमारा दोहन-शोषण अनवरत जारी रहेगा। इसीलिए वे सवाल करते हैं। आत्मलोचन करते हैं।
यही आत्मलोचन उनकी कविता की खास विशेषता भी है। यह आत्मलोचन उन्हें बार-बार प्रश्न
के कठघरे में खड़ा करता है। सन्देह पैदा करता है। जब तक यह संदेह और प्रश्न नहीं
उठेगा तब तक न तो आत्मलोचन की ही दिशा तय हो सकती है और न ही विकास की। द्रष्टव्य
है उनकी ये पंक्तियां:
‘‘अपने अनुभवों के सूरज से
इसकी चकाचौंध से
हैं लेकिन अपरिचित अब तक क्यों?’’7 (जंगल पहाड़ के पाठः 18)
देखिये
कवि सिर्फ प्रश्न ही नहीं करता है बल्कि आत्मलोचन करता है कि अपरिचित अब तक क्यों?
यह आत्मबोध ही उनका सहज ज्ञान है। इसी सहज ज्ञान का सौन्दर्य उनकी
जिंदगी है और उनकी ज्ञान परम्परा भी। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के मतांध लोगों को ठेगा
बता देता है आदिवासी समाज देशज ज्ञान और उनकी आधुनिकता से। ‘आप
क्यों हंसते हैं?' कविता इस दृष्टि से बहुत ही मार्मिक है।
पूरी कविता प्रश्नोत्तर की शैली में है। सवाल और फिर उसका जवाब। सिर्फ कपड़ों और
गोरचमड़ी से मानुष की पहचान उचित नहीं। शास्त्र का अक्षर ज्ञान ही सिर्फ ज्ञान का
प्रतीक नहीं। जंगल के पत्तों की पहचान, वनऔषधियों का ज्ञान,
रात के तारे को देखकर समय का ज्ञान, जीवजन्तुओं
की हरकतों से पर्यावरण की गतिविधि का ज्ञान, बारिस-मौसम की
जानकारी भी ज्ञान की परम्परा है। इसकी जानकारी आधुनिक घड़ी और शास्त्र के अध्येता
को कहां? फिर भी आदिवासी मानुष अज्ञानी ? यह कैसी विडम्बना है। ज्ञान के प्रयोग से ही विज्ञान बना। मगर ज्ञानी
मानुष मानुष नहीं। आखिर क्यों? सूनामी की पहचान कर अंडमान
में आदिवासी समाज ने अपना जान बचा लिया लेकिन कम्प्यूटर का ज्ञान फेल हो गया।
आधुनिक यांत्रिक सभ्यता-संस्कृति के युग में देशज ज्ञान, परम्परा,
खान-पान, जीवन-शैली की बात क्या उलटबांसी है?
लोकतांत्रिक राष्ट्र में ज्ञान का यह विभाजन विकास की राह में सबसे
बड़ा बाधक है। इसे जितना जल्द खत्म किया जाएगा। भारत उतना ही जल्द एक समृद्धशाली
समतामूलक राष्ट्र बन सकता है।
आदिवासी-बहुजन
समाज की अवधारणा साम्यवादी विचारधारा पर आधारित है परंतु गैर-आदिवासी समाज की
अवधारणा हिन्दुस्तानी साम्राज्यवादी विचारधारा पर आधारित है। इस संदर्भ में यह
ध्यान देने वाली बात है कि हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद का संस्कृतिकरण बहुजन समाज
के कुछ समुदाय में हो गया है जिसके कारण उनमें वर्गीकरण-विभाजन की वही परम्परा
कायम हो गई है जो हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद की है। अनुसूचित जनजाति,
अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग का विभाजन इसी पर हिन्दुस्तानी
साम्राज्यवाद के सांस्कृतिकरण का प्रतिफलन है। जो समय सापेक्ष आर्य-अनार्य,
वर्ण-जाति कालांतर में दलित-गैर दलित, आदिवासी-गैर
आदिवासी की एजेंडा में तब्दील हो गया है। परंतु है यह सब आदिवासी, मूलनिवासी बहुजन ही, जो हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद
का शिकार है। हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद सिर्फ कर्म के नाम पर सिर्फ श्रम(शारीरिक
परिश्रम और मानसिक परिश्रम) का विभाजन ही नहीं करता है बल्कि श्रमिकों का विभाजन
करता है। यह विभाजन भौतिक ही नहीं है बल्कि मानसिक भी है। मानसिक ही नहीं बल्कि
सामाजिक और सांस्कृतिक भी है जिसके कारण विभाजन के खिलाफ लम्बे अर्से से आंदोलन और
संघर्ष के बावजूद भी समानता की दिशा में सिर्फ राजनीतिक सतही सफलता मिली है। इसका
ज्ञान और प्रबोधन अनिवार्य है। वर्तमान सभी आंदोलन का जो समतामूलक समाज और राष्ट्र
निर्माण की अवधारणा में विश्वास करता है एवं उसके लिए उद्यम करता है को
हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद की प्रकृति की पहचान कर उसको उजागर करना चाहिए।
राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन, शासन-प्रशासन, एवं ज्ञान सत्ता-संस्थान सर्विस
में ‘नब्बे सैकड़ा बनाम दस सैकड़ा’ की
सुनिश्चितता को स्थापित करना होगा। यूं कह सकते हैं कि सभी राष्ट्रीय संसाधनों पर
से हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद के स्वामित्व को खत्म करना होगा। वर्तमान में इसका
चरित्र निजी स्वामित्व की ओर तेजी से बढ़ रहा है। विकास एवं उन्नति के क्षेत्र के
संसाधनों में राष्ट्रीयकरण बनाम निजीकरण का सवाल हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद का
अद्यतन रूप है। जिसमें आदिवासी बहुजन समाज के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है। एक
अंतहीन शोषणचक्र में धंसता हुआ आदिवासी बहुजन समाज। जिन्हें उग्रवादी, आतंकवादी, माओवादी, राष्ट्र
विरोधी कहकर एक भंवरजाल में फसाया जा रहा है। महादेव टोप्पो ने ‘आप क्यों हँसते हैं?', ‘रूपान्तरण’
और ‘प्रजातंत्र में’ कविता
में इसी भंवरजाल को उजागर किया है। प्रजातंत्र में तो सभी समान है फिर मानुष-मानुष
में अंतर क्यों? सोचने, बोलने, हिस्सा मांगने पर पाबंदी क्यों? जल, जंगल, जमीन के हक-हकुक के आंदोलन पर प्रतिबंध क्यों?
आदिवासी समाज की प्रस्थिति एवं दयनीय जीवन पर हँसी क्यों? इन सबको ‘जंगल पहाड़ के पाठ’ में
सहजता से समझा जा सकता है। कितनी सरलता से और सहज रूप में सादगी में साम्यवाद की
स्थापना करती हैं कविता। द्रष्टव्य है पंक्तियां:
‘‘हँसो!हँसो!हँसो!
लेकिन हमें बताओं-
आप हमसे बेहतर खाते और रहते हैं
बेहतर घरों
में रहते हैं
तब भी आपका और हमारा खून लाल क्यों हैं?
आप भी मरते हैं!
हम भी मरते हैं!
जलकर या गलकर
इसी धरती में समा जाते हैं
तब भी मेरे भाई! आप मुझ पर हँसते क्यों हैं?’’8( वहीः 20)
साम्यवाद की ऐसी बानगी और कहाँ मिलेगी?
इसीलिए कल तक सीधे साधे आदिवासी आज जब हिन्दुस्तानी
साम्राज्यवादियों को चुनौती देने लगा है और मानवीय संसाधनों में हिस्सेदारी की
मांग करने लगा है तो उग्रवादी, माओवादी, आतंकवादी आदि क्या-क्या संज्ञा से नवाजे जाने लगा है। यह विडम्बना नहीं तो
क्या? लेकिन इन सब से अलग महादेव टोप्पो की कविता में संसदीय
राजनीतिक चेतना का ऐतिहासिक स्वरूप मिलता है। जिसमें आंदोलनधर्मिता की ऐसी ऊर्जा
मिलती है जो सचमुच में सामाजिक परिवर्तन का आगाज है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘अपनो के लिए/भाषा, संस्कृति बचाने के साथ/रोटी के
लिए जूझता/जल, जंगल, जमीन, पेड़ बचाता/अल्बर्ट एक्का चौक पर रायफल छोड़/बिरसा चौक पर बंधे हाथ से होकर
मुक्त/प्रवेश कर रहा हूं अब संसद के द्वार से/मिलूंगा तुमसे जल्द ही अन्य मंचों पर
भी/पहाड़ों, जंगलों को/रूपये की आंखों से देखने को/नजरिये को
तुम्हारी/ देता रहूंगा चुनौती/लिख कर, बोल कर/शब्दों की
ऊर्जा भर रहा हूं इसलिए/दिल में, दिमाग में/शरीर के रोम-रोम
में।’’9(जंगल पहाड़ के पाठः 22)
इस प्रकार जंगल पहाड़ के पाठ सामाजिक परिवर्तन की ध्वनि से ध्वनिमय
है।
सामाजिक
परिवर्तन के मूल में सत्ता के साथ मुठभेड़ की गाथा है। हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद
और औपनिवेशिक साम्राज्यवाद दोनों से टकराने का, संघर्ष
और उलगुलान करने का मद्दा तो सिर्फ आदिवासी समाज में ही रहा है। जिन्हें बीहड़ में
जीवन जीना मंजूर लेकिन सत्ता की गुलामी मंजूर नहीं थी। यह एक ऐसा सवाल है जो हमेशा
से सबके लिए रहस्यमय बना रहा है। सिदो कान्हू, तिलका माझी,
बिरसा मुण्डा, आदि तो इसी समाज से था
जिन्होंने अपनी राष्ट्रीयता और स्वशासन की संप्रभुता के लिए अंग्रेजों से कभी भी
समझौता नहीं किया। जंगल पहाड़ का इतिहास इसी की गाथा सुनता है। फिर भी वह इतिहास
में नहीं। आखिर क्यों? यह सिर्फ दृष्टिदोष है या कुछ और भी।
महादेव टोप्पो ने इन्हीं सवालों को ‘प्रश्नों के तहखाने में’
उठाया है। देखिए, यह कवि की महानता है या उनकी संस्कृति कि उन
साम्राज्यवादियों को भी जोहार कहना नहीं भूलते तो उन इतिहासकारों एवं लेखकों,
चिंतकों को धन्यवाद कहना नहीं भूलते हैं जिन्होंने अपने लेखन,
चिंतन और उद्यम से आदिवासी समाज की उन्नति, उत्थान
के लिए अपनी दृष्टि और सीमाओं में आदिवासी समाज की समस्याओं को दर्ज किया है। उनका
इतिहास भी लिखते हैं और कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं। लेकिन सवाल पूछने से रूकते
नहीं है कि आखिर इतिहास-ग्रंथों में आदिवासी समाज का इतिहास क्यों नहीं गढ़ा गया है?
क्यों दर्ज नहीं हो सका है? इतिहास में हाशिये
पर क्यों? क्यों बन्दर, भालू या अन्य
किसी जानवर के रूप में चित्रित किया गया है? उनकी उन्नति के
लिए बड़ी-बड़ी योजना बनाई गई लेकिन वह योजना उन तक पहुंची क्यों नहीं? इसलिए वे अपने विद्वान दोस्तों से सीधे-सीधे सवाल करते हैं और इसके रहस्य
खोलने की बात कह दिया है। वे लिखते हैंः
‘‘मगर विवश बेबस क्यों हम ?
...मेरे विद्वान दोस्त यह नहीं बताते
इस प्रश्न के तहखाने का रहस्य कौन खोलेगा?
शायद हमारे बीच से ही कोई।’’10 (जंगल पहाड़ के पाठः 27)
ध्यान देने वाली बात यह है कि ‘हमारे बीच से ही कोई’ यानी स्वयं के नेतृत्व में ही
इतिहास को समझने की जरूरत है और इतिहास लिखने की भी। ‘रचने
होंगे ग्रंथ’ कविता इतिहास के निर्माण की कविता है। यह कविता
इस बात को चरितार्थ करती है कि जिस समाज का इतिहास नहीं उसका विकास या तो बाधित है
या विकास के इतिहास में वह उपहास का पात्र है। आदिवासी समाज का इतिहास क्या है और
कैसे लिखा जाएगा। इस कविता के केन्द्र में यह दृष्टि निहित है। यह कविता दो
अनुच्छेद में है जिसमें पहला भाग आदिवासी समाज का इतिहास कैसा है यह बताया गया है
तो दूसरे भाग में इतिहास रचने की दृष्टि-चेतना को बताया गया है। परंतु अध्ययन की
दृष्टि से पहले इतिहास दृष्टि की चर्चाः
‘‘उन्हें नहीं है स्वीकार
इसलिए तुम इतिहास के ग्रंथों में
हाशिये पर डाल दिये गये हो
या कर दिये गये हो उससे बाहर
इससे पहले कि वे पुनः तुम्हारा
अपने ग्रंथों में बन्दर, भालू
या अन्य किसी जानवर
के रूप में करें वर्णन
तुम्हें अपने आदमी होने की
खोजनी होगी परिभाषा
उनके सिद्धांतों, स्थापनाओं,
मन्तव्यों के विरूद्ध
उनके बर्बर वैचारिक हमलों के विरूद्ध
रचने होंगे
स्वयं ग्रंथ।’’11
इसमें कवि ने स्पष्ट किया है कि
आदिवासी समाज को स्वयं अपना इतिहास लिखना होगा। अन्यथा अबतक के इतिहास में उनका
चित्रण मानव के रूप में नहीं किया गया है। वह इतिहास से गायब है। या उसका स्वरूप
विकृत है। इससे बड़ी विडम्बना भारतीय इतिहास और ग्रंथ की और क्या हो सकती है?
वह अपने ही समाज के मानव को जानवर के रूप में तब्दील कर दिखा है।
क्या यह मानवता का कलंकित रूप नहीं? इसीलिए कवि कहता है कि
स्वयं इतिहास ग्रंथ रचा जाए। चेतनशील होकर सक्रियता के साथ और उन सब विचारों,
मंतव्यों, सिद्धांतों, स्थापनाओं
के विरूद्ध जो मनुष्य को मनुष्य नहीं जानवर समझता है। उन सब इतिहास दृष्टि के
विरूद्ध आदिवास समाज का इतिहास उनकी लोकगीतों, पुरखों की
विरसात, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों के बीच जीवित है जिसमें आदिवासी समाज का जीवन धड़कन रचाबसा है।
इस कविता का पहला भाग इसी पर केन्द्रित है। प्रस्तुत है इतिहास का वह पन्ना जिसपर
निर्मित है आदिवासी समाज का इतिहासः
‘‘इतिहास तुम्हारा
इतिहास के पन्नों पर
गढ़ा नहीं शब्दों में
ना ही दर्ज हो सका है ग्रंथों में
तुम्हारी विजय गाथाओं और संघर्षों के गवाह
पेड़ हैं, नदियां
हैं, चट्टानें हैं,
पुरखों की आत्माएं हैं
ससनदिरी हैं
जाहेरथान हैं
तुम्हारे लोकगीत हैं।’’12(जंगल पहाड़ के पाठः 14)
आदिवासी इतिहास का एक बहुत बड़ा भाग
झारखंड राज्य का आंदोलन है। यह आंदोलन आदिवासी राष्ट्रीय अस्मिता का आंदोलन रहा
है। परंतु विचारणीय बात तो यह है कि झारखंड राज्य के बनने के बाद रांची और झारखंड
के अन्य क्षेत्रों में क्या-क्या परिदृश्य बदला और बदलने की संभावना है। इसकी
बानगी ‘झारखंड गठन के बाद-कुछ दृश्य’ कविता में देखी जा
सकती है। रांची को राजधानी बनने के बाद वहां गलाकाट प्रतिस्पर्धा का दौर शुरू हो
जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। यह सत्ता-शासन के केन्द्रीय क्षेत्रों में आम
बात है। सवाल यह है ऐसा क्यों?झारखंड सभी के लिए कामधेनु बन
गया। सरकारी-अर्द्धसरकारी संस्थानों के अधिकारी, कर्मचारी
लोगों की खुशी सिर्फ भत्ता एवं सुविधाओं के बढ़ने से है तो प्रकाशक को झारखंड की पुरखा-साहित्य
सम्पदा की विक्री से। माफियाओं और मालिकों को झारखंड की खनिज सम्पदा और जमीन की
खरीद आदि से मतलब है। क्या यही झारखंड आंदोलन का लक्ष्य था? इन
सब सवालों के आदिवासी समाज की चुनौतियां अलग ही कथा बयां करती हैं। यह कथा आदिवासी
समाज की नई यात्रा है। जिंगदी को बेहतर बनाने की जद्दोजहद से लेकर उनकी तस्करी सब
कुछ इसमें शामिल है। कवि की चिंता बहुत ही वाजिब है। क्या उनके इस यात्रा का समय
और स्टेशन सही है। देखिये यह समय और स्टेशन एक प्रतीक है जो आदिवासी समाज के विकास
का उचित समय और दिशा की ओर संकेत करता है। एक अंतहीन यात्रा की आशंका? आखिर क्यों? इसकी चिंता महादेव टोप्पो को है। आखिर
कब तक यह सब चलेगा? कब आदिवासी समाज अपने जीवन सौन्दर्य को
शोषणमुक्त-भयमुक्त-आशंकामुक्त होकर जी सकेगा? उनकी एक कविता
इसी नाम से है जिसमें विकास की पंचवर्षीय योजनाओं और आदिवासी समाज के विकास की
हकीकत को रेखांकित किया गया है। इतना ही नहीं, तथाकथित
मुख्यधारा द्वारा की जा रही घोषणाओं , चिंताओं और योजनाओं की
फलशफा की सच्चाई को भी प्रश्नांकित किया गया है। और सवाल पूछा गया है कि ‘कब तक?' बहुत ही मार्मिक और चिंताजनक सवाल है जिसका
जवाब मिलना अभी बाकी है। वे लिखते हैं:
‘‘लेकिन एक सवाल तब भी बचा रहेगा कि
इस देश में कास्ट सर्टिफिकेटों के माध्यम से ही
पहचाने जाते हम लोग
चौथी श्रेणी के नागरिक होने का
दर्द भोगते रहेंगे कब तक?13 (वही, 11)
देखिये कैसे जाति-वर्ण की संरचना
वाले में मानुष की पहचान उनकी जाति और वर्ण से होती है। वह समाज भी इससे अनुभव कर
रहा है जिसमें कभी जाति या वर्ण था ही नहीं। याद करिये बुद्ध,
कबीर, रैदास, ज्योतिबा
फुले, बिरसा, डॉ. अम्बेडकर, पेरियार, कांशीराम, बाबू जगदेव
प्रसाद आदि बहुजन समाज के दार्शनिकों को जिनकी चिंता इसी जाति-वर्ण आधारित
समाजव्यवस्था और उससे सम्बद्ध शोषणकारी हिन्दुस्थानी साम्राज्यवाद से मुक्ति की
रही है। जिन्होंने भारत को कौशलयुक्त समृद्धशाली समतामूलक राष्ट्र निर्माण का रहा
है। जिसमें सभी अस्मिता, अस्तित्व, गरिमा,
मैत्री, करुणा, समता,
स्वतंत्रता और बंधुत्व से
सयुक्त वैज्ञानिक जीवन-सौन्दर्य की सोंधी महक थी।
21वीं सदी में जब मूलनिवासी आदिवासी बहुजन समाज की अस्मिता का सवाल उठना
लाजिमी था। हम कौन है?, हमारा हक-हकूक क्या है? और हमारी पहचान कैसी है? आदि सवालों को साहित्य से
अलग करके नहीं देखा जा सकता है। साहित्य इससे अछूता भी नहीं है। महादेव टोप्पो ने
आदिवासी दर्शन के संदर्भ में यह सवाल उठाया है। इस दृष्टि से उनकी कविता-‘मैं पूछता हूं’ महत्त्वपूर्ण कविता है। द्रष्टव्य है
पंक्तियां:
‘‘संविधान की भाषा में हम
अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति हैं
मनु की भाषा में शूद्र
कम्युनिस्टों की भाषा में शोषित
ईसाइयों की नजरों में अपवित्र लोग
भाजपाइयों की भाषा में पिछड़े हिन्दू
मैं पूछता हूं तुम सबसे
आखिर इस देश में, इस
प्रजातंत्र में
हम क्या है?
हम क्या है?’’14(जंगल पहाड़ के पाठः 90)
इस प्रकार देखा जा सकता है कि कैसे
महादेव टोप्पो ने विभिन्न विचारधारा और दृष्टिकोण से आदिवासी समाज की अस्मिता को
कैसे और किस रूप में रेखांकित किया है और क्यों? इस
पर सवाल उठाया है और पूछते हैं कि इस लोकतांत्रिक देश में ‘हम
क्या हैं?’ हैं, हमें मानव क्यों नहीं
समझा जाता है, भारत का नागरिक क्यों नहीं समझा जाता है?
देखिये यही महत्त्वपूर्ण है और प्रतिरोध का सौन्दर्य है कि आखिर
भारतवर्ष के सभी नागरिक समान क्यों नहीं? सभी को समान नागरिक
सुविधाएं क्यों नहीं? जबकि संविधान में सब नागरिक समान और
समानता की सामाजिकता के हकधार है। दिक्कत यही है नागरिक क्यों नहीं? ये विभिन्न संज्ञाएं क्यों? लोकतांत्रिक राष्ट्र का
नागरिक होने और नागरिकता का मतलब ही यही है कि संविधान प्रदत्त सभी अधिकरों का
समान अधिकारी होना और राष्ट्रीय-प्राकृतिक संसाधनों में समान हिस्सेदारी। क्या अब
तक ऐसा हुआ है ? नहीं हुआ है तो यह चिंता का ही नहीं संकट का
संकेत है। मानवीय संकट का। अस्मिता-अस्तित्व का सवाल है। दिनप्रतिदिन आदिवासी
बहुजन समाज का नरसंहार या उनके साथ घट रही घटनाएं इसी संकट की ओर इशारा करती हैं।
इसकी जड़ को समझिए। संविधान प्रदत्त हक-हकूक से वंचना हेतु ही हिन्दुस्थानी
साम्राज्यवादियों द्वारा इस प्रकार के विभिन्न संज्ञाओं का आख्यान रचा गया है और
रचा जाता है।
इस
संग्रह की सबसे महत्त्वपूर्ण कविता है ‘पहाड़ के
पाठ’। यह एक लम्बी कविता है जिसमें चार खंड-‘जिन्होंने पहाड़ नहीं देखा’, ‘पहाड़ चेढ़ते’, ‘चुपचाप पहाड़’ तथा ‘पहाड़ और
बच्चे’ हैं। इसमें पहाड़ी जीवन और गैर पहाड़ी जीवन के द्वंद्व
एवं संघर्ष को दिखाया गया है। जिन्होंने पहाड़ कभी नहीं देखा और जिनका जीवन ही पहाड़
की कंदराओं के बीच ही बीता ‘दोनों के जीवन संघर्ष, दृष्टि आदि में जो अंतर है’ उसका वर्णन है। पहाड़ का
जीवन संघर्ष है। पहाड़ी मानुष के लिए जीवन सहज और मैदानी पर्यटक के लिए वही जीवन
कितना कठिन है पहाड़ों पर। यहां पहाड़ प्रतीक है जीवन संघर्ष में साहस, धैर्य का। पहाड़ चढ़ते खण्ड में कवि ने स्पष्ट लिखा है कि पहाड़ मनुष्य को
बनाता है धैर्यवान। इससे यह स्पष्ट होता है कि पहाड़ का जीवन सौन्दर्य मनुष्य की वह
शक्ति है जिसके सहारे ही लक्ष्य, मंजिल तक पहुंचा जा सकता है
अन्यथा नहीं। 'पहाड़' चुनौती का प्रतीक है। वह निशब्द, निश्चछलता
स्थित है पंरतु उसकी खामोशी आपको चुनौती पेश करती है। आपको चुपचाप जीवन-सौन्दर्य-संघर्ष
का पाठ पढ़ाता है। उसकी खाई-ऊंचाई को धैयपूर्वक पार करने की प्रेरणा देता है। उसे
फतह करने की शक्ति देता हैं बच्चों को खुशी देता है। उनमें जिज्ञासा भावबोध
उत्पन्न करता है। उन्हें दुनिया को देखने की उत्सुकता और नवीन दृष्टि देता है। तभी
तो शिक्षक पहाड़ यात्रा को सफल कहते हैं। उदाहरण स्वरूप इन पंक्तियों को देखा जा
सकता हैः
‘‘उनका सौन्दर्यबोध देख
उनकी एकजुटता देख
दुनिया जानने की उत्सुकता देख
उनका संकल्प देख
पास खड़ा शिक्षक मुस्कराता है
बच्चों की
पहाड़ यात्रा सफल रही।’’16(जंगल पहाड़ के पाठः 96)
इस काव्य संग्रह की एक और खासियत है
कि कवि साहित्य की विविध क्षेत्रों को और उसकी संवेदना को बदलाव के रूप में देखता
है। अब तक साहित्य में और साहित्य पर गैरआदिवासियों का कब्जा रहा है। महादेव
टोप्पो इस एकाधिकार को बदलना चाहते हैं। और इस बदलाव की प्रक्रिया में वे सफल भी
हैं। इस दृष्टि से ‘कविता को झारखण्ड घुमाना
चाहता हूं’ बहुत ही मार्मिक कविता है। जिसमें साहित्य-कला को
दिकुओं की दुनिया से बाहर झारखण्ड की दुनिया में लाना चाहता है। इसे यूं कह सकते
हैं कि शहरों में बैठकर आदिवासी जीवन के विषय में रचना करने वाले लेखकों की दृष्टि
दोष को साफ करना चाहते हैं और इसके लिए वे स्पष्ट शब्दों में कहना चाहते हैं कि आओ
आदिवासी समाज के कुनबे में, उनके टूटे-फूटे शब्दों में सृजित
जीवन सौन्दर्य के साहित्य को देखो। कितना फर्क है खुली आंखों में उतारी गई तस्वीर
में और ‘रंगीन चश्मा’ पहनी आंखों में
उतरी तस्वीर में। यही फर्क साहित्य के सौन्दर्यबोध का फर्क है। भाषा और दृष्टि में
फर्क सिर्फ साहित्य में ही फर्क नहीं करता है बल्कि साहित्य की रचना-प्रक्रिया और
सौन्दर्यबोध के साथ-साथ साहित्य के प्रतिमान में भी अंतर निर्धारित करता है।
आदिवासी और गैरआदिवासी साहित्य में अंतर का कारण भी यही है। लाजिम है जब साहित्य
में अंतर है तो उसकी आलोचना के प्रतिमान में अंतर होगा। इस आलोक में महादेव टोप्पो
की कविता ‘माँदर का साथ’ बेजोड़ कविता
है।
‘माँदर का साथ’ दो संस्कृतियों के बीच निर्मित दृष्टि
के अंतर को स्पष्ट करती हुई कविता है। ‘माँदर छोड़ देने’
और माँदर के साथ जीवन जीने वाले
कहने वाले लोगों की दृष्टि अंतर को इस कविता के माध्यम से समझा जा सकता है।
माँदर को छोड़ देने और माँदर के साथ जीवन जीने की धारणा एक सांस्कृतिक अवधारणा के
बीच जीवन सौन्दर्य को देखने की दृष्टि है। ‘माँदर’ गैर आदिवासियों के लिए असभ्य का द्योतक हो सकता है लेकिन आदिवासी समाज और
दर्शन में यह संस्कृति का प्रतीक है। माँदर की थाप पर आदिवासी समाज का पूरा
जीवनचक्र गतिमान है। जीवन की सांस, धड़कन, आंसू, हर्ष, विषाद, प्रेम आदि मानवीय गुणों के साथ-साथ जीवन जीने का आधार खेतिबारी, अन्न-धन सब कुछ ‘माँदर’ की
थापों से बंधा हुआ है। इसे कोई त्याग देने की बात कैसे कर सकता है? यह तो जीवन की पूंजी है। खजाना है जिससे जीवन सौन्दर्य की कल-कल करती
धाराएं बहती हैं। इसे छोड़ने का मतलब है जीवन सौन्दर्य की धाराओं का सूख जाना। यह
पूरी संस्कृति है, सभ्यता है जिसमें समान लयताल में जीवन का
गीत, आरोह-अवरोह में भाव-भंगिमाओं का प्रदर्शन, अखड़ा का शिक्षण-प्रशिक्षण, साथी नर्तकों या जोड़ीदार
नर्तकों का संगीतमय ताल, बदलते मौसम के साथ बदलते कदमों का
ताल, किलकारियां आदि सब कुछ तो माँदर के संग ही होता है। फिर
उसे कैसे भूलाया जा सकता है, त्यागा जा सकता है और किसी के
कहने भर से कैसे छोड़ा जा सकता है? उसमें तो मिट्टी की सोंधी
महक है। वसन्त की मादक सुगंध है, खेत-खलिहानों का रक्षक,
जीवन संगिनी है, जीवन की ऊर्जा है, अंगार है। ध्यान दीजिए अंगार रक्षक और प्रतिरोधक दोनों है। फिर उसका त्याग
कैसे? यह तो जीवन संगिनी की मौत की सदमा की तरह है इसका
त्याग-अलगाव। यह विरेचक है। मुक्ति का वाद्ययंत्र है। संजीवनी है। यह संघर्ष और
आंदोलन है, भाव है भाषा है, आशा है,
हिम्मत है, विरोध-प्रतिरोध है। एकता है,
उलगुलान है, शंति है, सपना
है, अन्तरंगता है और इतिहास भी है। इसे कैसे त्यागा जा सकता
है? इसीलिए कवि माँदर को छोड़ने की सलाह देने वालों को दोटूक
कहता है कि आप इन सब का अनुभव नहीं कर सकते हैं। न ही आप माँदर को समझ सकते हैं और
न ही आदिवासी समाज के जीवन को। द्रष्टव्य है ‘माँदर का साथ’
कविता की ये पंक्तियाँ :
‘‘इन सबको करोगे नहीं अनुभव तुम
न माँदर को समझोगे
न जीवन को मेरे
स्पष्ट है-
मुझे भी नहीं समझोगे।
करते रहोगे घोषित
खुद को सभ्य और मुझे असभ्य या हाशिये का आदमी
लेकिन, हम गाते
रहेंगे माँदर की थाप पर-
धरती की सांसों के गीत
धरती की हरियाली के गीत
कोयल, कारो, दामोदर, स्वर्णरेखा,
नर्मदा की मुक्ति-कामना के गीत
सरई फूलों की पवित्रता के साथ
सिन्दूर बनी धरती के, पलाश
के लाल फूलों के साथ
नदियों के कल-कल लयबद्ध तालों के साथ
पहाड़ की ठण्डी, शान्त
हवाओं के साथ
बार-बार गाते रहेंगे
कलम में धार लाने के गीत
जीवन को संवारने के गीत
अपने गांव से लेकर-
देश, दुनिया को बेहतर
बनाने के गीत-माँदर के साथ।’’16 (जंगल पहाड़ के पाठः 39)
कविता की इन पंक्तियों में मानवीय
जीवन-सौन्दर्य के साथ-साथ पर्यावरणीय संपूर्ण जीवन-सौन्दर्य का बोध होता है। पूरी
कायनात का 'ईको सिस्टम' आज जिस तरह से तबाह है उसे देखते हुए यही अनुभव होता है काश
हम भी माँदर के साथ जीवन-सौन्दर्य के तरंगों का अनुभव कर पातें। हमने जो यह
सभ्य-असभ्य का पैमाना समाज में पैदा किया है इससे तो मानवीयता का क्षरण ही होता
है। यह दृष्टि दोष तो हमारी संस्कृति का है जो हमें यह बोध देता है। मानवीय
सभ्यता-संस्कृति के जीवन मूल्यदर्शन की समझ का फर्क है। आदिवासी संस्कृति से इस
सबसे मुक्त मानवीयबोध की संस्कृति है जिसमें मनुष्य और पर्यावरणीय जीवन दोनों एक
साथ है। आदिवासी समाज में माँदर सभ्यता-संस्कृति का वह जीवन-सौन्दर्य मूल्य है
जिसका त्याग मीन को पानी से निकाल देने की कथा होगी। माँदर की ताल बेहतर जीवन और
बेहतर मानवीय सभ्यता-संस्कृति बनाने का उद्यमी गीत है। इतना ही नहीं,
‘भारत की समृद्ध परम्परा निभाता झारखण्ड’ यानि
आदिवासियत है। यह कविता ‘अबुआ झारखण्ड’ से बना नया झारखण्ड की भी कहानी कहती है।
और
अंत में समग्रतः यह कहा जा सकता है कि ‘जंगल
पहाड़ के पाठ’ संग्रह आदिवासी दर्शन, संस्कृति,
जीवन सौन्दर्यमूल्य आदि से लबरेज अनुभूतिपरक साहित्य का वह प्रतिमान
स्थापित करता है जिसमें मानवीय जीवन-सौन्दर्य के साथ पर्यावरणीय जीवन-सौन्दर्य की
छटा चांद की चांदनी की तरह फैली हुई है। सूरज की रोशनी में अबुआ झारखण्ड से जिस
राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय जीवन की परिकल्पना की गई है उसकी हकीकत को भी बयां करती
है यह कविता। दिकुओं के हस्तक्षेप और दृष्टिदोष के कारण आदिवासी में जो परिवर्तन
आया है। उसकी जमींनी रिपोर्ट तय करती हैं इसमें सम्मिलित कविताएं। जिसमें इन दिकुओं
के दृष्टिदोष और हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिरोध का सौन्दर्य विद्यमान है। प्रतिरोध
का सौन्दर्य इस काव्य संग्रह का प्रतिमान है। यूं कह सकते हैं कि महादेव टोप्पो की
काव्यानुभूति और अभिव्यक्ति आदिवासी दर्शन, सौन्दर्यबोध और
जीवनमूल्य से झारखण्ड की सोंधी मिट्टी की महक से आनन्दमय मानवीय सभ्यता-संस्कृति
के जीवन-सौन्दर्य को स्थापित करती है जिसमें प्रतिरोध का सौन्दर्य है और आदिवासी
समाज के जीवन सौन्दर्य को हिन्दुस्तानी साम्राज्यवाद से मुक्त रखने हेतु सामाजिक
परिवर्तन का आगाज भी। कुँड़ुख(उराँव) लोकगीत की इन पंक्तियों -‘पहाड़ पर लगी आग को देखती है दुनिया सारी/हृदय के भीतर लगी लाग को कोई नहीं
देखता’ को चरितार्थ करती है उनकी कविताएं। कविता का भाषा-शिल्प
आदिवासी समाज के दैनिक जीवन-संघर्ष से छनकर आया है। संवाद और प्रश्नोत्तरी शैली
में कविता की बुनावट उसके सौन्दर्य को परिमार्जित एवं परिवर्द्धित करता है।
सन्दर्भ सूची:
- महादेव टोप्पो.
जंगल पहाड़ के पाठ, अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली, 2017, पृ. 7
- वही, पृ. 71
- वही, पृ. 68
- वही, पृ. 70
- वही, पृ. 10
- वही, पृ. 16
- वही, पृ. 18
- वही, पृ. 20
- वही, पृ. 22
- वही, पृ. 27
- वही, पृ. 14
- वही, पृ. 14
- वही, पृ. 11
- वही, पृ. 90
- वही, पृ. 96
- वही, पृ. 39
संपर्क: सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, इंदिरा
गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,अमरकंटक, मध्यप्रदेश-484887 ईमेल : pravinkmr05@gmail.com संपर्क न.-
9752916192
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