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नाटक और नृत्य में अंतर

 नाटक अनुकरण है पर नृत्य नहीं . नृत्य में बाह्य उपकरण की आवश्यकता नहीं होती , नाटक में होती है . 

रचना की सीमा और सौन्दर्य

देश काल की सीमाओं के साथ व्यक्ति की भी सीमा होती है . यह सीमा रचना कौशल में और रचयिता की ग्राहिका शक्ति में निहित होती है . जीवन सौन्दर्य में वृद्धि करने वाली सभी अभिव्यक्ति का नाम कला है . मनुष्य की सौन्दर्य रचना के मूल में उसके चित्त के लालित्य भाव ही है . इसीलिये लालित्य को ही उस सौन्दर्य का रूप मन जा सकता है जो मनुष्य के लालित्य भावों की अभिव्यक्ति करता है . लालित्य अर्थात् प्राकृतिक सौन्दर्य से भिन्न किन्तु उसके समानान्तर चलने वाला मानव रचित सौन्दर्य है . 

मुक्तिकामी विद्या और बंधनमुक्त कर्म

 तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्ते | आया साया परं कर्म विद्यान्य शिल्पनैपुनम ||                                                                            विष्णुपुराण २ १९ ७६ कर्म वही है जो बंधन में ना बांधे, विद्या वही है जो मुक्त करें | अन्य सभी कर्म निरर्थक क्रिया व अन्य सभी अध्ययन मात्र कारीगिरी है |