मुल्क की जीवंतता की शाइरीः फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (यह शोध आलेख इस पत्रिका में प्रकाशित है Praxis International Journal of Social Science and Literature Impact Factor: SJIF 2020 = 5.754 ISSN: 2581-6675 Vol - 3, Issue - 11, November - 2020 Website: www.pijssl.com, Email: editor.pijssl@gmail.com)

 

मुल्क की जीवंतता की शाइरीः फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

डॉ. प्रवीण कुमार

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग

 इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक

 चलभाषः  9752916192

pravinkmr05@gmail.com

 

सारांश :

प्रस्तुत आलेख फैज़ अहमद फैज़ की शाइरी की संवेदना पर आधारित है. इसमें उनकी शाइरी में अनुगुंजित आवाम की धड़कन को समझने का प्रयास किया गया है.यह भी देखा जा सकता है कि उनके नज्म कभी सत्ता का पक्ष नहीं लेती है. इस आलेख में शायरी की जगह शाइरी का प्रयोग किया गया है.

बीजशब्द : मुहब्बत,परम्परा, आधुनिकता, इश्क-ए-वतन, इनसानियत, इंसान, मुल्क जीवंतता़, आधुनिक भावबोध, जनता-जनतंत्र

विषय विस्तार :

जिस दौर में फैज़ अहमद फैज़ का लेखन अंतिम ऊँचाई की ओर था वह दौर औपनिवेशिक भारत का है. यह समय मानस मुक्ति के लिए बहुत ही जरुरी होता है. साहित्य की संवेदना इसी में है कि वह आपको चेतनशील करें. फैज़ साहेब ने परतंत्र भारत और आजाद भारत दोनों को बहुत ही करीब से देखा है, यही वजह है कि उनकी रचनाओं में इसकी जमीनी हकीकत बयां हुई है. देशकाल सापेक्ष अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति अपनी हर एक सीमा को अतिक्रमित करती है. फैज़ की रचनात्मक अनुभूति और उसमें निहित ध्वनि की अनुगूंज कुछ ऐसी ही है कि वह हर देशकाल में मुल्क की जिवंतता का परिचय देती है. 

मुल्क की जिवंतता के सन्दर्भ में प्रेमचन्द का यह कथन याद आता है कि जिसमें वह बार-बार अपने मुल्क के साहित्यकारों से यह अपील करते हैं कि साहित्य और उसकी कसौटी दोनों को बदलने की जरूरत है. वे लिखते है कि ”हमें सुन्दरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी तक यह कसौटी अमीरों और विलासिता के ढंग की थी।...हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें चिन्तन का स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करें, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।“1

जिस दौर में हिन्दी कथा सम्राट प्रेमचन्द यह बात कह रहे थे, बोल रहे थे उसी दौर में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लेखन कार्य की शुरूआत की। यह वह दौर था जब साहित्य ने आसमानी केंचुल छोड़कर जमीन के घूल-घूसर में अंगड़ाई लेना शुरू किया था। उसमें यथार्थ का प्रविष्ट हो रहा था। वह आधुनिक विचारों से लैस हो रहा था और साहित्य ‘रोटी-रोटी के लिए’ तथा ‘रोटी जीवन के लिए’ के रूप में प्रवहमान हो रहा था। उर्दू साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा। फै़ज़ साहब के जीवन और शाइरी पर इसका गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। उनकी शायरी में जीवन रचा-बसा है। वह संघर्ष और ‘इंसान को मय्यसर नहीं रोटी’ के बीच से होकर गुजरता है जिसमें आनंद और उल्लास का, प्रेम और सौन्दर्य का पुट है। यह प्रेम और सौन्दर्य इंसानी ज़ज्बात की उपज है। इसलिए वह हमें सुलाता नहीं है, बेचैन करता है। सोये हुए को जगाता है। जब वे लिखते हैं-

”मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूत न मांग।

और भी गम है ज़माने में मुहब्बत के सिवाय।“

यह पंक्ति साहित्य जगत में खासकर उर्दू साहित्य में पूरी एक परंपरा को तोड़ती है कि मुझसे पहली सी मुहब्बत न मांग। जब उर्दू साहित्य रोमानियत में सराबोर था। महबूबा के प्रेम-सौन्दर्य से आदि से अंत तक भरा-पूरा होता था। फै़ज साहब शायरी में यथार्थ को आमंत्रित करने वालों में से एक थे। कुछ विद्वान उन्हें गालिब और इक़बाल के सिलसिले का शायर कहते हैं। इसका मतलब है कि ”फ़ैज़ की शायरी में रोमान भी है, जिन्दगी का यथार्थ भी है, तब्दीली का एहसास भी है, मुहावरे और हुस्न का रचाव भी है और फिर नई उपमाएँ और नए प्रतीक भी हैं। फ़ैज़ की शायरी में जो बगावत का एहसास है उससे किसी को संतोष मिलता है तो किसी का मन बहलता है।“2 यही वजह है कि पाकिस्तान के साथ-साथ दुनिया के हर एक मुल्क जहाँ वे गये भी और जहाँ नहीं भी जा सके, उनका अपना वतन था। उनके ज़ज्बात और शायरी से लोगों का दिली-रिश्ता था कि उनको सुनने के लिए आम-आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों और कलाकारों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। उनकी शायरी में रोमान और यथार्थ का उद्भुत सामंजस्य है कि वह लोगों के दिलो-दिमाग में सहज स्थान पा लेती है। ‘और भी गम है ज़माने में मुहब्बत के सिवाय’ कहने वाले लेखक सचमुच में आधुनिकता को आमंत्रित करता है तो दूसरी ओर ‘और भी गम है’ कहकर ग़म की पुरानी परंपरा का वाहक भी है। मुहब्बत, प्रेम आदि शब्द अपने-आप में परंपरा को तोड़ते हैं उस देश, गांव में जहाँ प्रेम करना एक गुनाह है और जिसकी सजा मौत होती है। इस मौत की परंपरा को तोड़कर फ़ैज़ साहब ने मुहब्बत को जिंदगी माना है और लिखते हैं, ‘तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाए।’ लेकिन इसके बाद की कड़ी में दुनिया के जिस दुख की चर्चा करते हैं, वे वास्तव में जिंदगी को मुहब्बत की दुनिया से दूर हो जाते हैं और जिंदगी की असली मर्म को सामने प्रकट करते हैं वैसे लोगों की जिंदगी को, जो जुल्म की छाया में जिंदगी जीने को मजबूर है। ऐसे लोगों से आह्वान करते हुए लिखते हैं-

‘और कुछ देर सितम सहले, तड़प ले, रो ले

अपने अजदाद की मीरास है मांजूर है हम

जिस्म पर कैद है, जजबात पै जंजीरे हैं

फिक्र महबूस है गुप्तार पै ताजीरे है।

अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं।

लेकिन अब जुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं

इक ज़रा सब्र कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।“

‘जज्बात पै जंजीरे’ होने के बावजूद भी फ़ैज़ साहब हमेशा उस फिक्र में रहे थे कि अपनी सब्र और हिम्मत के बल उन जुल्मों की दुनिया से कैसे बाहर निकला जा सकता है ? मौजूदा सत्ता से कैसे टक्कर ली जा सकती है? और सत्ता को हमेशा-हमेशा के लिए आवाम की आम जनता के लिए कैसे बनाया जा सकता है ? आवाम को सत्ता के और सत्ता-तंत्र के जुल्मों से कैसे निजात दिलायी जा सकती है ? सत्ता और सत्ता-तंत्र की यह पहचान फै़ज़ साहब को आधुनिकता के करीब लाती है और परंपरा से भी जोड़ती है। परंपरा एक इतिहास बोध है न कि रीति-रीवाज़ की दुनिया। क्योंकि आधुनिकता कोई मूल्य नहीं होती है। ”वह एक गतिशील प्रक्रिया है जो वैज्ञानिक दृष्टि से संपृक्त होती है तथा समकालीन परिप्रेक्ष्य में उपजी हुई नयी संवेदनाओं, नई स्थितियों, विचारभूमियों और जीवन संदर्भों को व्यक्त करती हुई और उन्हें रचनात्मक अर्थ देती हुई प्रशस्त होती है।“3 आज की आधुनिकता कल को इतिहास और परंपरा की चीज़ बनकर रह जाएगी। ”आधुनिकता को हम उस काल की आधुनिकता की तुलना और संदर्भ में ही आधुनिक’ की संज्ञा दे सकते हैं। यही आधुनिकता का परम्परा से जुड़ना और साथ ही उससे मुक्त होना भी है। इस प्रकार परिवेश बोध और परम्परा दोनों ही आधुनिकता के अनिवार्य तत्व है।“4

फ़ैज़ साहब जिस देश काल में रचनाकार रहे थे। वह देश काल स्वाधीनता आंदोलन और उसके बाद दो-तीन दशक का है जिसमें आवाम के सामने ब्रिटिश सत्ता से मुक्त होने और स्वाधीन होने के अपने अनेक स्वप्न थे। इन्हीं दो पाटन के बीच फै़ज़ साहब की शायरी अपनी चेतना और बुनावट के साथ चलती है जो आज भी उतनी ही ‘रीलीवेंट’ है जितनी कल थी। ऐसी ही उनकी एक नज़्म है- ‘निसार मैं तेरी गलियों के...।

”निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के: जहाँ

चली है रस्म के: कोई न सर उठाके चले।

जो कोई चाहने वाला नवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले जिस्म-ओ-जाॅ बचा के चले।“

‘कोई न सर उठा के चले’ ऐसी प्रथा के खिलाफ़ उनकी शायरी बोलती है और कहती है कि ये जो जुल्म के दर्द है वह दवे पांव आएगा, जो दिल में घड़कता है वह सुर्ख़ चिराग़ बनकर आएगा। सिर्फ ‘कोई इनको एहसासे -जिल्लत दिला दे/ वरना चमक उठे है सलासिले तो हमने जाना है/ केः अब सहर तेरे रूख़ पर बिखर गई होगी। इसलिए वे लिखते हैं-

”दर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है एक दिल

लाओ सुलगाओ कोई जोश-ओ-ग़ज़ब का अंगार।

मुंतजिर होगा अंधेरों की फ़सीलों के उधर

उन को शोलों के रज़ज अपना पता तो देंगे

खैर हम तक वो ना पहुँचे भी सदा तो देंगे

दूर कितनी है अभी सुब्ह बता तो देंगे।“

स्वाधीनता की अनुगूंज, जो मौजूदा हालात में आम जनता तक नहीं पहुँच पा रही थी तथा ‘सत्ता एवं उसका तंत्र अपने ... नुकिले: पांव तले उस आवाज को कुचल देता था, उसे दफना देता था। फ़ैज़ साहब की शायरी वही आवाज़ बनकर आवाम के सामने गूँजती है तथा उसे सुबह होने की सूचना देती है। सुबह यहाँ स्वाधीनता का प्रतीक है। आज़ादी के बाद ‘आम आदमी’ और मध्यवर्ग को स्वाधीन होने की जो पालित इच्छाएँ थीं, उसका मोहभंग होता है। इस मोहभंग को, फ़ैज़ साहब बड़ी सिद्दत के साथ महसूस करते हुए, ‘बोले...’ जैसी नज़्म लिखते हैं जिसमें आम-आदमी की अभिव्यक्ति की बात करते हैं और कहते हैं कि ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे।’ यह जो प्रश्नाकूलता है शायरी में। यह उसे आधुनिक बनाती है क्योंकि प्रश्नाकूलता ‘अभिव्यक्ति और वैचारिकी’ तथा सौन्दर्यशास्त्र एवं आधुनिकता की पहचान है। जब आज लोगों के पास  अभिव्यक्ति के सूचना-तंत्र मौजूद है तो जुल्म के उतने साये हैं, जब यह न था तो हमारे पूर्वजों पर कितने जुल्म हुए होंगे। इस बात को आज सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इसी बात को रेखांकित करते हुए फै़ज़ साहब इतिहास के पन्नों में अंकित जुल्म की परंपरा का जिक्र करते हैं। इसे वर्तमान में घटित ‘मौत और जीस्त’ की रोजाना सफ़-आराई’ के स्वरूप के रूप में भी समझ सकते हैं। उन्हीं के शब्दों में:

”आज तक सुर्ख़-ओ-सियद-सदियों के साये के तले

आदम-ओ-हव्वा की औलाद पे क्या गुजरी है ?

मौत औ ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़-आराई में

हम पे क्या गुज़रेगी, अज़दाद पे क्या गुज़री है ?“

यह जो ‘अज़दाद पे क्या गुज़री है?’ की परंपरा है। यह इतिहास में जुल्म और सितम की पूरी काली कहानी है जो इतिहास के पन्नों में कैद है। जब-जब इन पन्नों को खोलकर पढ़ने और समझने का प्रयास किया जाएगा इतिहास पूरी तरफ से मानचित्र का स्वरूप धारण कर सकता है। उस सत्ता और कानून की पूरी करतूत का अफसाना प्रस्तुत करता हुआ वर्तमान को नये रूप में ढालने की कोशिश कर सकता है। यही संदेश है फैज का साहब।

आज भूमण्डलीकरण के दौर में शहरों के बीच चकाचैंध रोशनी में खुले आसमान तले, खंडहरों में, नुक्करों पर जिंदगी और मौत के बीच भूख से तड़पते-बिकलते लोगों के बारे में फै़ज़ साहब ने बहुत पहले घोषणा कर दी थी कि इनकी जिंदगी सिर्फ मरने के लिए ही होती है और ये जिंदा रहने के लिए ही अपनी भूख मिटाते हैं। क्या भूख का सवाल सिर्फ आधुनिक युग का ही है? क्या भूख का कोई इतिहास नहीं? यदि है तो क्या उसे समझने की जरूरत नहीं? क्या यह एक देश की व्यवस्था और उसके प्रबंधन का सवाल नहीं? जिंदगी क्या इतनी सस्ती है कि किसी को मरने के लिए छोड़ दिया जाए। हिंदी में भूख की संवेदना पर तुलसीदास, दिनकर, प्रेमचंद, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह आदि से लेकर वर्तमान में दया पवार, शरणकुमार लिंबाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कौसल्या बैसंत्री, तुलसीराम, श्यौराजसिंह बेचैन आदि की आत्मकथाओं में मार्मिक रूप में चित्रित हुई है। लेकिन वहां यह भूख सिर्फ आदमी की रोटी के सवाल बनकर नहीं आया है बल्कि सामाजिक विफलता -विषमता के रूप में भी उसे समझा गया है। फैज साहब उसी व्यवस्था की ओर संकेत करते हुए लिखते हैः

”इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मखलूक

क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिमा करती है?

ये हसी खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका

किसलिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है?“

भूख से लड़ते हुए गांव, शहर, नगर की गली-चैराहों पर जिन्दगी जीने वालों का जहाँ एक तरफ कोई मसीहा नहीं है तो वहीं दूसरी तरफ चांद पर जीवन ढूँढ़ा जा रहा है। यह कैसी विडम्बना है इस समाज और दुनिया की, जहाँ आवाम के आम-आदमी की इच्छा, स्वप्न को रौंदा जा रहा है फिर भी वे आशा लगाए अपने मसीहा को ढूँढ़ रहा है जो उसे समझे और उसकी जिंदगी के बेहतरी के लिए आगे बढ़कर आए। ऐसी ही एक नज़्म है ‘शीशों का मसीहा कोई नही। जिसमें उन्होंने दामन में छुपी हुई इन आशाओं के बारे में लिखते हैं-

”तुम नाहक टुकड़े, चुन-चुनकर

दामन में छुपाये बैठो हो

शीशों का मसीहा कोई नहीं

क्या आस लगाये बैठे हो।“

इन्हीं आशाओं के साथ आवाम के आम लोग स्वाधीनता से पूर्व चन्द पूंजीपतियों, महाजनों के बस अपना बेहतर स्थिति की क़ामना करते थे। जिसका जिक्र प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं में खूब सूरती के साथ किया है तो वहीं स्वाधीनता के पश्चात ब्रिटिश सत्ता के बदले देशी सत्ता होने के बावजूद भी आवाम के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्री, आदि की स्थिति बेहतर होने के बजाय बद से बदतर होती चली गयी। किसान कल भी महाजनी कर्ज़ में डूबे हुए थे और मौत के मुँह में समा रहे थे। आज भी वे बैंकिंग पूंजी के कर्ज में आत्महत्या कर रहे हैं। उनकी स्थिति के बारे में शायर ने आवाम के इस दृश्य को शब्द सह प्रस्तुत किया है। ‘ये फसल उम्मीदों की हमदम’ में फैज साहब उसका वर्णन करते हुए लिखते हैं कि किसान, मजदूरों को सुबह-शाम कड़ी मेहनत के बाद भी बेहतरीन जिंदगी के लिए अगली ‘रूत’ की ही फिक्र करनी होगी, नहीं तो उसे उजड़ना ही होगा। इस सुबह-शाम की मेहनत में एक किसान की जिंदगी का पूरा स्वप्न छुपा होता है। जिसकी आपूर्ति के लिए ही वह अपनी लहू की खाद और अपने आंसू से इस धरती की मिट्टी को सींचता है। नई फसल के लिए। जो फसल सिर्फ घरभर का पेट ही भरता है बल्कि उनकी इच्छाओं को भी पूरित करेगी। लेकिन उन्हें क्या पता कि फसल के पकने तक और घर तक उसे आने में उनका किया गया मेहनत अकारत ही जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया से बचते-बचाते जब वह फसल मंडी में जब वह अपनी लागत पूंजी की भी कमाई नहीं कर पाता है तो उसके पास ‘उजड़ने’ के सिवाय दूसरा और कोई उपाय नहीं होता है। क्या इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। फैज साहब का नज्म इसे बहुत ही बारीक ढंग से उकेरता हैः

”सब मेहनत सुब्हों शामों की

अब के भी अकारत जायेगी

खेती के कोनों, खुदरों में

फिर अपने लहू की खाद भरो

फिर मिट्टी सीचों अश्कों से

फिर अगली रूत की फिक्र करो

जब फिर इकबार उजड़ना है

इक फसल पकी तो मर पाया

जब तक तो यही कुछ करना है।“

‘यही कुछ करना है’ यह बात मौजूदा हालत में, जब आवाम के चन्द अमीर लोग और अमीर हो रहे हैं और गरीब लोग गरीब, इस यथार्थ को व्यक्त करती है। यह यथार्थ उतना ही कटू है जितना प्रेमचंद के यहाँ किसान जीवन की गाथा है। यह अभिव्यक्ति वायवीय नहीं है। इसकी एक ठोस जमीनी अनुभूति है जिसकी अभिव्यक्ति शाइरी में हुई है। ‘शायरी उनके (फ़ैज़) खून में थी लेकिन शाइरी उनका आखिरी मक़सद नहीं थी इसलिए वे बाहर से उस अन्दाज के कायल नहीं थे जो शायरों की निस्बत लोगों के जेहन में बैठा हुआ हाता है। लेकिन भीतर से फ़ैज़ पूरी तरह शायर थे- उतने ही लापरवाह, उतने ही भावुक और वैसा ही इनसानियत का दर्द अपने दिल से छुपाए हुए। यह उनके जैसा शायर ही कह सकता था कि ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग। और भी दुख है ज़माने में मुहब्बत के सिवा।’“5 यह दुख दुनिया का दुख है जिस दुनिया में आज इंसानियत का कत्ल होता है। ‘लाओ तो कत्लनामा सिरा’ में कहने को तो इश्क साकी, मय और मयकदे सब कुछ है लेकिन वह अभिधा उस को छोड़कर व्यंजना अर्थ ग्रहण करती है और तात्कालिक हालात को व्यक्त करती है-

”तोहमत तुम्हारे इश्क़ की हम पर लगी हुई

रिन्दों के दम से आतश-ए-मय के बगैर भी

है मयकदे में आग बराबर लगी हुई

लाओ तो कल्नामा मिरा. मैं भी देख लूँ

किस किसकी मुहर है सर-ए-महजर लगी हुई।“

‘लाओ तो कत्लनामा मिरा मैं भी देख लूँ। किस किसकी मुहर है सर-ए-महजर लगी हुई,’ तो फ़ैज़ साहब उर्दू शायरी की पुरानी रवायत को तोड़कर नई परंपरा कायम करते हैं जिसमें शब्दों के पुराने अर्थ समाप्त होते हुए दिखाई पड़ते हैं और शब्द नये अर्थों के साथ शायरी को अख्तियार करते हैं। ‘इश्क़ के तोहमत’ कोई रूमानियत अर्थ में नहीं है बल्कि वह इश्क-ए-वतन के रूप में है जो कि अपनी धार्मिक, कट्टरता के कारण देश में फैली साम्प्रदायिकता की आग और कत्ल के यथार्थ को व्यक्त करती है। यह बात तब और गौरतलब है जब अरूण कमल, ‘कत्लनामें की वजह इश्क को मानते हुए, रोमानियत के अन्तर्गत वक्त की क्रांतिकारी कविता कहते हैं- ”इश्क के तोहमत के रूमानीवादे से शुरू करके फ़ैज़ उसे कत्लनामे तक ले जाते हैं और यह अपने वक्त की क्रांतिकारी कविता साबित होती है। लेकिन यह सब कुछ होता है एक रोमानियत के अन्तर्गत ही।“6 इश्क के तोहमत, कत्लनामें, क्रांतिकारी कविता और रोमानियत के अन्तर्गत, ये सारी बात जँचती नहीं है। रोमानियत यदि है तो वह, यह कि फै़ज़ साहब आवाम की बात, आवाम की ज़बान में करते हैं जो पढ़ने-सुनने वालों के दिलों में उतरती चली जाती है और वे अपनी समस्या को समझने लगते हैं। यह रोमानियत स्त्री-पुरुष के प्रेम-सौन्दर्य की रोमानियत नहीं है जैसा कि उर्दू शयरी में हुआ करती है। वरना फ़ैज़ इन्तिसाब, यतीमलहू शाम, ऐ वतन ऐ वतन आदि जैसी शायरी नहीं कर पाते। एक दूसरी बात क्रांति और प्रेम में चोली दामन का सम्बन्ध होता है बिना प्रेम क्रांति असंभव है। उनकी शायरी इंसान की बेहतर जिंदगी के लिए ‘जुल्मों-सितम’ से टक्कर लेती है। इसलिए एक तरफ वे कहते हैं कि ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’, तो दूसरी तरफ लिखते हैं-

”देखेंगे

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन के: जिसका वादा है

जो लोहे अजल में लिक्खा है

जब जुल्मों-सितम के कोहे-गराँ

रूई की तरह उड़ जायेंगे

जब महकूमों के पॉवों तले

ये धरती धड़धड़ धड़केगी

और अहले करम के सर ऊपर

जब बिजली उछाले जायेंगे

और तख्त गिराये जायेंगे

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे।

जब बिजली उछाले जायेंगे

और तख्त गिराये जायेंगे

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे।“

जुल्म-सित़म की रूई की तरह उड़ जाना, तख्त का गिरना, धरती का धड़कना और फिर ताज का उछालना, हम देखेंगे- ये सारी बातें बरबस मुक्तिबोध की इन पंक्तियों की याद दिला जाती है-

‘‘समस्या एक सभ्य नगरों और ग्रामों में

कि सभी मानव

सुखी सुन्दर व शोषण युक्त कब होंगे?’’

निष्कर्षतः यही कहा जा कसता है कि इन्हीं ज़ज्बातों के साथ फ़ैज़ साहब की शायरी की अनूगूँज पूरी दुनिया में है कि ‘मेरे दिल मेरे मुसाफिर’, पाँवों से लहू को धो डालो, कि ‘चले भी आओ के: गुलशन का कारोबार चले’। जब तक दुनिया में मानवता का दमन होता रहेगा, उनकी शायरी जन-मानस के लिए संघर्ष और उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक बनकर उठ खड़ी होगी। ‘दुनिया के मज़दूरों एक हो’ की आवाज बनकर गूँजती रहेगी। शमशेर बहादुर सिंह के शब्दों में, ‘‘फैज़ वहीं हैं जहाँ अस्लीयत बोलती है, भाषा की हदों से ऊपर उठकर बोलती है, और अपने लहजों के नर्म और गर्म तेवर से हमारी आज की जिंदगी के बहुत से राज खोलती चलती है...वो राज जिनसे रूह तो वाकिफ है मगर जिन पर बूर्जुआ और सामंती सियासत और तानाशाही ने शोषण और अत्याचार के धुआंधार पर्दे डाल रखे हैं, अगर्चे वह बहुत कुछ ढक नहीं भी पा रहे हैं। हां, इसी मंच पर फैज की शाइरी अपनी आवाज बुलन्द करती है।’’7 वही फिराक गोरखपुरी का मानना है कि उनकी रचनाओं में एक जीवन्त आधुनिक क्लासिक है। ‘‘फैज़ की शाइरी आजकल के पढ़े-लिखे सुसंस्कृत नौजवानों की भावनाओं और भावशैली का बोलता हुआ साज़ है।’’8 इतना ही उन्होंने अपनी प्रगतिशीलता के बीच उर्दू की भाषा सौष्ठव की परवाह नहीं किया, बल्कि को कैसे आधुनिक भावबोध से लैस किया जा सकता है। यह उनकी चिंता रही है। यही चिंता उनकी शाइरी में बोलती है। दुनिया की किसी भी जगह, किसी भी भौगोलिक खण्ड में जब भी मानवता का दमन होगा या उसके अंत की कहानी गढ़ी जाएगी फै़ज़ की शाइरी उन दमित मानवता की आवाज़ बनती है। उनकी शाइरी की खासियत और शक्ति जन-मानस से उनका जुड़ाव है। जन-मानस के लिए और जनता-जनतंत्र के लिए उनकी शाइरी संघर्ष और उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक है। मुल्क की जीवंतता की पहचान है। ‘फूलों की शक्ल और उनकी रंगो-बू से सराबोर शाइरी से भी अगर आंच आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहां पूरी तरह मौजूद हैं। फै़ज की शाइरी की खास पहचान ही है-रोमानी तेवर में भी खालिस इन्किलाबी बात।’ इनसान और इनसानियत के हक में उन्होंने एक मुसलसल लड़ाई लड़ी है और उसे दिल की गहराइयों में डूबकर, यहां तक कि ‘खूने-दिल में उंगलियां डुबोकर, काग़ज़ पर उतारा है।’9 हर युग-देशकाल में जब भी संघर्षशील समाज की आवाज़ को दबाने का कार्य सत्ता पक्ष करेगा फै़ज़ की शाइरी-नज़्म उनकी संघर्षशील समाज की आवाज़ बन कर उठती है और उठेगी।

 

संदर्भ सूचीः

1.            साहित्य का उद्देश्य - प्रेमचन्द, पृ. 20-26, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001

2.            फै़ज़ और उनकी शायरी - सं. प्रकाश पंडित, पृ. 24, राजपाल एंड संस, 2003

3.            साहित्य के मूल्य - देवेश ठाकुर, पृ. 80 संकल्प प्रकाशन, मुम्बई, 1992

4.            वही

5.            समकालीन भारतीय साहित्य - अंक 29, जुलाई-सितम्बर 1987 फै़ज़ अहमद फै़ज़ - शरद दत्त

6.            आलोचना - अक्टूबर-दिसम्बर - 81/87 ‘अब वही कै़फियत सभी की है - अरूण कुमार

7.            फैज़, सं.-शमशेरबहादुर सिंह, मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी, पृ. 5, राजकमल प्रकाशन, 2010

8.            वही, 218

9.            फै़ज़ अहमद फै़ज़ - प्रतिनिधि कविताएँ, कवर पेज,  राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1991

सभी नज़्म - ‘फै़ज़ अहमद फै़ज़ - प्रतिनिधि कविताएँ,  राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1991 पेपर बैक से ली गई है। 

 

 

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