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अक्टूबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संस्कृति और समाज

जहाँ जहाँ कर्त्तव्य बोध है वहां वहाँ समाज है. संस्कृति एक व्यवस्था है और समाज उसकी परिणति की अवस्था है. समाज और संस्कृति का एकीकरण ही चरित है. समाज उस समूह को कहते है जहां पलायन नहीं कर्त्तव्य का परायण होता है. संस्कृति अनुशासन की अवस्था है. 

भारतीय शिक्षा प्रणाली और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

 भारतीय शिक्षा प्रणाली और पद्धति को जाने बिना राष्ट्रीय शिक्षा नीति को नहीं समझा जा सकता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को समझ लिए तो भारतीय शिक्षा की सनातन परम्परा को समझा जा सकता है. दोनों पूरक है. 

धर्म

मैं चाहता हूं कि प्रत्येक धर्म के झंडे पर लिखा जाए कि सहायता करो लड़ो मत , ग्रहण करों, विनाश मत करो, शांति और समन्वय सीखो, मतभेद नहीं.  स्वामी विवेकानंद   

हिन्दी भाषा:राजभाषा बनाम राष्ट्रभाषा

हिन्दी भारतीय संविधान में वर्णित राजभाषा है, परन्तु मौखिक हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा है. भारत की संपर्क भाषा है. राष्ट्रीय की अस्मिता की भाषा है.स्थानीय,  राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों की अर्जन-उपार्जन की भाषा है. बोध, शोध, अनुभूति-अभिव्यक्ति,  अन्वेषण-अनुसंधान की भाषा है. भारत की तरक्की की भाषा है परंतु विडंबना यह है कि हिन्दी बाजार की भाषा तो है उससे राजनीति की भाषा है. आमजन की भाषा है और अकादमिक दुनिया की महज़ एक भाषा है जो पिछड़े वर्ग की है. बुर्जुआ वर्ग की अकादमिक राजनीति का हिस्सा है.  भाषा का काम है कार्य को सूचित करना है . लेकिन साहित्य में जिस भाषा का व्यवहार किया जाता है वह सिर्फ अर्थ नहीं बताता है और न ही वह कार्य को ही सूचित करता है . साहित्य की भाषा का कार्य है अनुभूति की अभिव्यक्ति . वह अनुभूति रस का आस्वादन और आनंद हो सकती है और उसकी निर्मिती भी . विचार का सम्प्रेषण भी . आवश्यकता की आपूर्ति भी . मानवीय संस्कृति की विकास यात्रा का चित्रण भी . यूँ भी कह सकते हैं कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं है बल्कि प्राणियों की विकास यात्रा का आदि और...

साम्राज्यवाद को ध्वंस्त करती है कहानी की सामाजिकता

  साम्राज्यवाद को ध्वंस्त करती है कहानी की सामाजिकता                                      प्रवीण कुमार pravinkmr05@gmail.com                                                        किसी भी रचना की सामाजिकता रचना की संवेदना , उसकी निर्मिति और कथावस्तु की वैचारिकता पर निर्भर करती है। रचना की बुनावट , उसकी समग्र ढांचा कथावस्तु की नींव होती है। हिन्दी कहानी से भिन्न दलित कहानियों की रचनात्मकता को समझे बगैर दलित कहानी की कथावस्तु को ठीक से नहीं परखा जा सकता है। दलित रचनाओं की परख के लिए उसकी वैचारिकी और एतिहासिकता को समझना अनिवार्य है। बि...

रीतिकाल की उपलब्धियां: एक विश्लेषण

                       रीतिकाल की उपलब्धियां: एक विश्लेषण प्रवीण कुमार pravinkmr05@gmail.com   हिंदी साहित्य के इतिहास में संवत् 1700 से लेकर संवत 1900 तक के काल को रीतिकाल के नाम से जाना जाता है। रीतियुग उसी मध्ययुग का उत्तरार्द्ध है जिसका पूर्वार्द्ध सामाजिक चेतना से सम्पन्न और कर्तव्य की उदात्तीकृत भक्ति रचनाओं वाला युग था और उसके बाद वह भारतेन्दुयुग आता है जो नए नवजागरण का पहला प्रभात था। रीतिकाल की उपलब्धियों के पर चर्चा करने से पूर्व रीतिसाहित्य की प्रवृत्तियों पर विद्वानों की राय का सर्वेक्षण महत्वपूर्ण है। इसी संदर्भ में भगीरथ मिश्र का यह कथन बहुत ही मार्मिक लगता है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘ हिंदी रीति साहित्य की प्रवृत्ति उतनी मौलिक नहीं जितनी आवश्यकताजन्य है। ’’( हिंदी रीति साहित्य , पृ. 9)  इससे स्पष्ट होता है कि रीतिकालीन साहित्य की प्रवृत्ति मौलिकता की दृष्टि से कमजोर है। वह आवश्यकतजन्य लिखि गई है और उसकी एक परंपरा है। चाहे वह परंपरा संस्कृत की रही या फिर भारतीय साहित्य की। ‘‘ हिंदी रीत...