वैश्विक महामारी के दौर में
वे चले गए
वैश्विक महामारी के दौर में
छोड़ कर
घरबार-घरद्वार।
इस पूंजीवादी करोना ने
उनका सब कुछ लील लिया है
उनका, उन सब का सबकुछ बिखर गया।
जो निकला था अपना
सब कुछ छोड़
कुछ अपने लिए कुछ अपनों के लिए
अपने और उनके सपनों के लिए
लेकिन उनका क्या?
जो पूंजीवाद की कोख से
पैदा हुआ और
अपनी पूंजी के साथ
इसे भारत में ला बो दिया।
जैसे बोया जाता पेट के खातिर
सपनों की जाल और
रख दिया जाता है किसी बारूद की ढेर पर
और एक दिन चिथरा चीथड़ा कर देता है
उनके सपनों के
जो चलकर आया था इक
उम्मीद के साथ
कि चलो
कुछ कमा कर
कर लेंगे
मिटा लेंगे पेट की आग को।
जिनके लपटे तैयार है पूरे घर द्वार को
खाक कर देने को।
और बचा लिया गया
देशी उपनिवेशवाद को
दिया तूगलकी शाही फारवान के माध्यम से
बजा बजा घंटी और जला जला दिया।
और मूर्खो की जमात की कतार में
ज्ञान विज्ञान को धता बता कर
इस सबके बावजूद भी
हमें उम्मीद है विज्ञान की तकनीकी पर
जो ढूंढ़ निकालेगा कोई न कोई तोड़
इस वैश्विक करोना की कमर को तोड़ने के लिए।
लेकिन यह सब जबतक होगा
वह तोड़ देगा
उन हताश भूखे लोगों की कमर को
जो बांध कर निकाल पड़ा था।
अपने खून को जला कर
सेंकता है रोटी
शाही महल की भूख के वास्ते
पर आज देखो उनमहलों की शाही फरवान को
उसे भूख से तड़पने के लिए
ला दिया सड़क पर
बेतहाशा चलने को अपने आशियाने की ओर।
@प्रवीण कुमार
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