साहब सब इंतज़ाम हो गया

 


साहब सब इंतज़ाम हो गया


वेदना की

घनीभूत पीड़ा का 

उमड़ना तो स्वाभाविक ही था

उसके अंदर जो

जमा हो रही थी भूख से

बेबसी से

बेरोज़गारी से

और सबसे ज्यादा अपने के बीच

न होने से

या अपनों का न होने से भी।

उनके पेट में दवानाल है

ज्वालामुखी सा

और पांव में उगे पहाड़ सा 

फफोला 

और उसमें लगी चकरी

जो गाड़ी के पहिए सा घूमता हुआ

उसे पहुंचाने में मदद करता है घर।

वह घर जिसे उन्होंने कभी

छोड़ आया था अपने सपनों के खातिर

या अपनों के उम्मीद को पूरा करने के वास्ते

सपने तो आंखों के रास्ते 

मोती बन बिखर गया

बिखरता चला गया उनका सब कुछ

एक एक कर ।

इस आश में कि

तालाबंदी के 

बाद और  पहले 

जो मधुर स्वर उनके कानों में पड़ा

अब वह 

पिघला हुआ सीसा सा महसूस हुआ।

और निकाल गया गंगा -जमुना बन

कपकपाती होंठों के बीच तो

अधखुला आहों के अधर पर लटका रह गया

जैसे गर्दन लटका हो रस्सी में

इस उम्मीद में कि

रस्सी कोई नहीं खींचेगा

मगर हुआ वही जो होना था

पांव तले की जमीन ही

खिसक गयी फिर तो कहना क्या

वही हुआ जो होना था 

या जो आका काका चाहते थे

वही मौत।

और फिर मधुर रूदाली भाषण

हम तो चाहते हैं लेकिन

वे रुकना ही नहीं चाहते है

हमने सब इंतजाम कर दिए

वे अपने के बीच अपने घर पहुंच जाएगा।

साहब वह पहुंच गया

देखिए न

लाल- लाल सोनित धारा के बीच

और लाला -लाल लपटों के बीच

वह पहुंच गया घर

रह गया तो सिर्फ चीख...

पुकार...

बिछुड़ते बिलखते अपनों से दूर

साहब सब इंतजाम हो गया।

@ प्रवीण कुमार



 



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