सौन्दर्यबोध की अवधारणा

सौन्दर्यबोध की अवधारणा

प्रवीण कुमार 

सौन्दर्यबोध ‘पदबंध’ का संबंध एक मानवीय विकास की प्रक्रिया से है। जैसे-जैसे मनुष्य की चेतना आकार ग्रहण करती गई उनके सौन्दर्यबोध ने वैसा ही स्वरूप अख्तियार किया है। एक ही व्यक्ति और समाज में समय-सापेक्ष सौन्दर्यबोध को परिवर्तित होता हुआ देखा जा सकता है। चूंकि यह परिवर्तन चेतना और चैतन्य अवस्था से विकसित विचार-मूल्यों एवं विचारधारा की सम्बद्धता से होता है। इसीलिए सौन्दर्यबोध का सम्बंध विचार-मूल्य एवं जीवन-मूल्य से सम्बद्ध है जोकि किसी भी रचना-कलाकृति में व्यक्त सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनागत संस्थाओं के बीच निर्मित मनुष्य की वैचारिकी की उपज होता है। जिसका लक्ष्य मानवीय मुक्ति चेतना को पैदा करना है। यही कला की शक्ति की होती है। इसका संबंध किसी भी कला के सिर्फ फॉर्म(रूप) से उतना नहीं है जितना कि उसकी अंतर्वस्तु से। अंतर्वस्तु में विन्यस्त विचार-मूल्य अपने अनुरूप रूप की संरचना स्वयं तैयार कर लेता है। इसलिए सौन्दर्यबोध रचना के बाह्य रूप पर बल नहीं देता है। कलाकृति के बाह्य रूप पर जोर देना पारंपरिक सौन्दर्यशास्त्र की प्रचलित धारणाएं हैं जोकि एक तरफ सौन्दर्य को सिर्फ कला(साहित्य के अतिरिक्त कला) को ध्यान में रखकर चीजों को देखती हैं तो दूसरी तरफ सिर्फ काव्य की अनुभूति तक सीमित रहा है। गद्य साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र पर तो अब तक विचार ही नहीं किया गया है। जिसकी पूरी संभावना थी। खैर! यह उदासीनता एवं अभाव दोनों क्यों एवं कैसे है?

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