साम्राज्यवाद को ध्वंस्त करती है कहानी की सामाजिकता

 साम्राज्यवाद को ध्वंस्त करती है कहानी की सामाजिकता

                                     प्रवीण कुमार

pravinkmr05@gmail.com

                                                      

किसी भी रचना की सामाजिकता रचना की संवेदना, उसकी निर्मिति और कथावस्तु की वैचारिकता पर निर्भर करती है। रचना की बुनावट, उसकी समग्र ढांचा कथावस्तु की नींव होती है। हिन्दी कहानी से भिन्न दलित कहानियों की रचनात्मकता को समझे बगैर दलित कहानी की कथावस्तु को ठीक से नहीं परखा जा सकता है। दलित रचनाओं की परख के लिए उसकी वैचारिकी और एतिहासिकता को समझना अनिवार्य है। बिना इतिहासबोध और वैचारिकी को जाने-समझे दलित साहित्य की निर्मिति को समझना मुष्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में वर्चस्व की संस्कृति के इतिहास को भी समझना कठिन हो जाता है। वर्चस्व की संस्कृति को जाने बगैर न तो भारतीय समाज की वर्णसत्तावादी जातिपरक संरचना को समझा जा सकता है और न ही उसकी पहचान की जा सकती है। इस पहचान के बिना न तो जातिपरक तथा अन्य शोषण के विविध स्वरूप को रेखांकित किया जा सकता है और न ही उससे मुक्ति की बात की जा सकती है। डॉ. राम चंद्र के अनुसार ‘आदिम सभ्यता के उद्भव से लेकर आज तक के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का पुनर्विवेचन, विश्लेषण ने दलित कहानी की निर्मिति को नवीन स्वरूप दिया है। दलित कहानियां मात्र दलित जीवन की कहानियां नहीं है अपितु सम्पूर्ण भारतीय समाज की विद्रूपताओं, विडंबनाओं की भी कहानियां हैं। दलित कहानियां दलितों के दर्द का दस्तावेज हैं जिसमें धर्म, दर्शन, इतिहास, संस्कृति, परंपरा आदि का विवेचन एवं आलोचन है।’(हिन्दी दलित कहानीः संवेदना और सरोकार पक्षधर अंक 12 पृ 69    )

भारत में साम्राज्यवाद सिर्फ औपनिवेशिक नहीं है बल्कि साम्राज्यवाद की जड़ यहाँ की सामाजिक संरचना में व्याप्त है| जो कि वर्ण –धर्म –जाति के वर्चस्व को निर्धारित करता है. यूँ कह कह सकते हैं कि ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद ही भारत में है और यही साम्राज्यवादी व्यवस्था औपनिवेशिक काल में भी भारत को खोखला कर रही थी और आजाद भारत में भी यह सर्वत्र व्याप्त है और भारतीय रीतिनीति के नाम पर भारत के बहुजन समाज को लूटता है. उसके हक़ –हकूक को ख़त्म कर अपना साम्राज्य कायम करता है जिसे अशिक्षित–अन्धविश्वासी बहुजन समाज अभी भी नहीं समझ पा रहा है . जबकि बहुजन महापुरुषों ने न केवल उसे समझा बल्कि उसके खिलाफ आन्दोलन कर एक विकल्प भी दिया . डॉ. आंबेडकर , ज्योतिबा फुले , सावित्रीबाई फुले , पेरियार , शाहुजिमाहराज , संत कवियों , गौतम बुद्ध , चार्वाक , मखालिगोसल , जगदेब प्रसाद , रामस्वरूप वर्मा आदि ने अपने चिंतन , दर्शन और संघर्ष से बहुजन समाज को विकल्प दिया था और ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद से मुक्त होने का दर्शन दिया था . क्या बहुजन समाज उसे व्यक्तित्व और कृतित्व में आत्मसात किया ?इस आलेख में इसी आलोक में बात की गई है. ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद ने वर्ण-धर्म- जाति इन्हीं तीनों अवधारणा में अपना साम्राज्य तंत्र विकसित किया और कायम किया .जोकि आज भी जारी है .  इसलिए जबतक इन धारणाओं को ख़त्म नहीं किया जाता है तबतक ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद से मुक्ति संभव नहीं और न ही भारत साम्राज्यवाद से मुक्त कहला सकता है. दलित कहानी ने न केवल ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद के तंत्र के कार्य प्रणाली की पहचान किया है बल्कि उससे मुक्त होने की प्रक्रिया और प्रणाली को प्रेरित एवं प्लावित किया है .

जाति-पांति, ऊंच-नीच, आत्मा-परमात्मा, भाग्य-भगवान, कर्मकांड, अंधविश्वास, स्वर्ग-नरक एवं पुनर्जन्म की धारणाएं आदि ब्राह्मणवादी मूल्यों का नकार और विरोध दलित कहानियों की कथावस्तु को गैरदलित कहानियों से अलग करता है। दलित कहानियों की वैचारिकी ब्राह्मणवादी इतिहास और संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन की बात करती हैं। सभ्यता, संस्कृति और परंपरा की समीक्षा दलित चेतना और आंदोलन का अहम हिस्सा है। हिन्दू धर्मशास्त्रों एवं पौराणिक कथाओं में चित्रित दलित विरोधी छवियों के तिलिस्म को दलित कहानियां न केवल तोड़ती है बल्कि उसे बेनकाब भी करती है। दमन और वर्चस्व की परंपरा का नकार दलित कहानी की कथावस्तु की महत्वपूर्ण विशेषता रही है।

दलित और गैरदलित जीवन में मौजूद पुरूशवादी मानसिकता को दलित कहानियां न केवल प्रश्नांकित करती है बल्कि उसका विरोधकर स्त्री-पुरूश की सह-समवादी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना पर बल देती है। दलित स्त्री लेखन में भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को भी समझा जा सकता है। दलित कहानियों में दलित स्त्री के तिहरे षोशण के साथ-साथ जाति-उपजाति के सवालों को भी उठाया गया है। दलित कहानियों में अभिव्यक्त दलित स्त्री चेतना को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है। ओमप्रकाष वाल्मीकि की कहानी ’यह अंत नहीं‘ ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की कहानी है जो ब्राह्मणवादी मानसिकता व व्यवस्था का न केवल विरोध करती है बल्कि पंचायती राज-व्यवस्था की हकीकत को भी उजागर करती है। कहने के लिए गांव का ‘मुखिया’ बिसन दलित है, लेकिन वह वर्चस्ववादी जाति का मोहरा बनकर रह गया है। ऐसे में दलितों को न्याय की संभावना नहीं दिखती है लेकिन बिरमा की मुखरता ने दलितों में नई चेतना का संचार कर दिया, ”ना बिरमा..... यह अंत नहीं है....तुमने हमें ताकत दी है। हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि फिर कोई बिसन मोहरा ना बने।“ (ओमप्रकाश वाल्मीकि, घूसपैठिये, पृ0 29) लेखक ने बड़ी सहजता से यह उद्घाटित किया है कि जातिगत वर्चस्व का कारखाना गांव लोकतंत्र की इकाई पंचायती राज-व्यवस्था का शत्रु है । यहां डॉ. अंबेडकर का कथन चरितार्थ हो रहा है कि भारतीय गांव हिन्दू-व्यवस्था के कारखाने हैं। वह ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के जनक-जननी हैं। जहां समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के लिए जगह नहीं है। इस स्त्री चेतना के संदर्भ में सुषीला टाकभौरे की कहानी ‘सिलिया’, रजत रानी ‘मीनू’ की ‘सुनीता’ और कावेरी की ‘सुमंगली’ कहानी को भी देखा जा सकता है। सुषीला टाकभौरे की कहानी सिलिया दलित स्त्री चेतना की कहानी है। सिलिया के दृढ संकल्प-‘‘ मैं बहुत आगे तक पढूंगी, पढ़ती रहूंगी। उन सभी परंपराओं के मूल कारणों का पता लगाऊंगी, जिन्होंने हमें समाज में अछूत बना दिया है। मैं विद्या, बुद्धि और विवके से अपने आपको ऊंचा साबित करके रहूंगी। किसी के सामने झुकूंगी नहीं। न ही कभी अपना अपमान सहन करूंगी।’’(संघर्श, सुषीला टाकभौरे, कहानी संग्रह पृ48) और उसकी चेतना -‘‘ झाड़ू नहीं कलम’। हां कलम ही उसके समाज का भाग्य बदलेगी।’ ने न केवल ब्राह्मणवादी मानसिकता और व्यवस्था को ध्वस्त करती है बल्कि उसकी सफलता को भी सुनिष्चित करती है। ‘झाड़ू नहीं कलम’ की चेतना डां अम्बेडकर के दर्षन -‘षिक्षित बनो, संघर्श करो और संगठित हो’ को ही अभिव्यक्त करती है। ‘सुनीता’ कहानी की सुनीता न केवल इस धारणा को तोड़ती है कि ‘ये चमारिन की छोकरी पढ़-लिखकर का दिल्ली की गद्दी पर बैठेगी?’ बल्कि ‘दलित जन संगठन’ बनाकर सांसद भी बनती है और समाज की इस धारणा को भी ध्वस्त करती है कि ‘ यह काम तो ...बेटे ही करेंगे, वही वंष चालक है’। लड़का -लड़की की समानता की संवेदना और उसकी सामाजिकता को उपस्थित करती है कि ‘‘नहीं बेटी यह काम तो तुम्हीं कर सकती हो, बेटे नहीं।’ इस प्रकार दलित कहानियों की सामाजिकता को समझा जा सकता है कि किस प्रकार स्त्री-पुरूश की सहभागिता और बराबरी की संवेदना एकाकार हो रही है। कावेरी की ‘सुमंगली’ कहानी की संवेदना और उसकी सामाजिकता जहां स्त्री विवषता, लचारी को उजागर करती है वहीं वह ‘मर्यवादी/सामंतवादी’ मानसिकता/ प्रवृत्तियों को भी उद्घाटिक करती है ।

दलित कहानी की यथार्थबोध में स्वानुभूति और सहानुभूति का सवाल केन्द्रीय सवाल बनकर उभरा है। कथावस्तु का चुनाव, घटना, चरित्र-चित्रण, देशकाल और सोद्देश्यता को दलित स्वानुभूति  प्रामाणिकता प्रदान करती है। दलित आत्मकथाओं के माध्यम से ‘स्व’ अनुभव के वृहदतर आयाम को समझा जा सकता है। अर्थात् दलित साहित्य की स्वानुभूति सामुदायिक है जो असमानता, भेदभाव और उत्पीड़ित समुदाय की संवेदना को सचेत और चेतनाशील बनाती है। इसीलिए दलित लेखन में विचारधारा का बहुत महत्व है। उपेक्षित होने की पीड़ा, अपमानित होने का दंश, उत्पीड़ित किए जाने की यातना और वंचना का क्रूर अनुभव दलित कहानी की विशिष्टता है। भेदभाव, अस्पृश्यता और जातिवादी-ब्राह्मणवादी क्रूरताओं ने दलित कहानी का कलेवर ही बदल दिया है। अभावग्रस्तता और शोषण की बारीकी को दलित कहानीकारों ने बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।

मजदूर वर्ग के अन्तर्विरोधों के सवालों को भी दलित कहानियों में उठाया गया है। ओम प्रकाष वाल्मीकि की कहानी ’प्रमोशन‘ ऐसी ही कहानी है। जिसमें ’स्वीपर‘ से ’मजदूर‘ बना सुरेश कॉमरेड की उपाधि पाकर जहां खुष होता है वहीं केमिकल प्लांट के कर्मचारी कॉमरेड जब सुरेश के हाथों दूध लेने से मना कर देते हैं तो पुनः वह स्वीपर बन कर रह जाता है। यहां वर्ण और वर्ग की धारणा को सहज ही समझा जा सकता है कि किस प्रकार वर्ग की अवधारणा भारतीय संदर्भ में जातिवाद के गिरफ्त में रही है। सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की क्रूरता ने मनुष्य-मनुश्य के बीच इतना विभाजन-विभेद कर दिया गया है कि वहां मानवीयता भी नदारद हो गई है। इस देष की विडम्बना ही कहिए कि अभी भी मैला ढोने की प्रथा कई जगह विद्यमान है। दूसरे पेषे में कार्यरत होने पर जातिगत भेद-भाव और अस्पृष्यता का व्यवहार किया जाता है। डॉ. राम चंद्र के षब्दों में ‘इस तरह की विडम्बनात्मक स्थितियों के प्रति दलित कहानियां संवेदनशील बनाती हैं और आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं।’

हिन्दी दलित कहानी में गांव-शहर, नगर-कस्बे के अंतर्द्वंद्व को भी देखा जा सकता है। भारतीय समाज में दलित-गैरदलित के बीच का संबंध कैसा और किस प्रकार का रहा है इसे दलित कहानियों के माध्यम से सहज की महसूसा और समझा जा सकता है। यहां मानवीय और अमानवीय के व्यवहार एवं उसके द्वन्द्व को भी समझा जा सकता है। सत्ता-षासन के सभी तंत्र - पुलिस, प्रशासन, राजनेता, मठाधीश, मुखिया आदि की नाकामियों और गठजोड़ की संस्कृति को दलित कहानियां सहज ही चित्रित करती है। ओम प्रकाष वाल्मीकि की कहानी ’यह अंत नहीं‘, ’सलाम‘, मोहनदास नैमिषराय की कहानी ’अपना गाँव‘, ’आवाजें‘, ‘महाशूद्र’, सूरजपाल चौहान की ’परिवर्तन की बात‘, ’बदबू‘, सुषीला टाकभौरे की ’सीलिया‘, संघर्ष‘, जयप्रकाष कर्दम का नो बार, तलाश, बिट्टन मर गई आदि कहानियों में गांव-षहर की संस्कृति में व्याप्त जातिवादी मानसिकता, सहकर्मियों की व्यवहारिकता, दलित और गैर दलित स्त्री-पुरूशों के संबंधों और अंर्तद्वंद्वों को परखा जा सकता है। ‘दलित कहानीकारों के व्यापक अनुभवों से दलित कहानियों में चित्रित पात्र एवं घटनाओं में जीवंतता का बोध होता है।’ दलित और गैर दलित संवेदना के अंतःसंबंधों दलित साहित्य में आसानी से देखा, समझा जा सकता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के ‘सलाम’ और मोहनदास नैमिशराय की ‘महाशूद्र’ कहानी दलित और गैर दलित संवेदना की ऐसी ही कहानी है। दोनों कहानियों की सामाजिकता इस बात में देखी जा सकती है कि कहानी के गैर दलित पात्र (ब्राह्मण) स्वयं अपने ही समाज द्वारा अपमानित और उपेक्षित किये जाने के बाद दलित जीवन की त्रासदी को ठीक से समझ पाते हैं। सहानुभूति को स्वानुभूति में रूपांतरित करने की यह कहानियां हैं। ‘सलाम’ के कमल उपाध्याय को दलित अपमान और उपेक्षा का बोध तब होता है जब वह दलित दोस्त हरीश के शादी में एक चाय वाला उसे चूहड़ा समझ कर चाय नहीं पिलाता। चाय वाला कहता है-‘‘चूहड़ा है। खुद कू बामन बतारा है। जुम्मन चूहड़े का बाराती है। इब तुम लोग ही फैसला करो। जो यो बामन है तो चूहड़ों की बारात में क्या मूत पीणे आया है। जात छिपाके चाय मांग रा है।’’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2004, नई दिल्ली, पृ013) मोहनदास नैमिंषराय की ‘महाशूद्र’ कहानी में ब्राह्मण आचार्य और दलित की संवेदना एक जैसी है। दोनों समाज से उपेक्षित है। एक ब्राह्मण होकर और दूसरा तो दलित है हीं। ब्राह्मण समाज आचार्य जी को खुद उन्हीं के समाज के लोग समाज का कलंक मानते हैं। आचार्य जी के बडे लड़के की चीख ‘‘पिताजी, अब और नहीं सहा जाता। सारी दुनिया हम पर थू-थू करती है। हमें मुरदे की चमड़ी खींचने वाले से लेकर कफन-खसोटू  तक कहती है। वे कहते हैं कि हमारे घर का गुजारा ही तब चलता है जब कोई मरता है। किसी के घर में अंधेरा होने पर ही हमारे घर में उजाला होता है।’’  (मोहनदास नैमिशराय, आवाजें, समता प्रकाशन, 1998, दिल्ली, पृ0 141) यह बात न केवल आचार्य जी के अंतःस को प्रभावित करती है बल्कि तथाकथित श्रेश्ठ कहे जाने वाला ब्राह्मण समाज के बीच के ‘छुआछात’ जैसे अनुभव और उसके अंतर्विरोध को अभिव्यंजित करती है। साथ आचार्य जी और नंदू का अपनत्व समाज में उपेक्षित, षोशित, अपमानित मानव की एकत्व संवेदना को व्यक्त करती है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘जिनावर’ न केवल गैरदलित समाज के खोखलेपन और उनके विद्रूप चेहरे को उजागर करती है बल्कि दलित पात्र जगेसर के द्वारा गैरदलित समाज के स्त्री को न्याय की आस दिलाती है। बिरजू की बहू का शोषण उसके ससुर चौधरी द्वारा होता रहा है। चौधरी की हवेली के भीतर शोषण-दमन का चक्र किस प्रकार चलता रहता है यह कहानी उसी को उजागर करती है। पूरी हवेली में बिरजू की बहू के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। सतवीर की बेटी किसनी का तीन महीने तक शारीरिक मानसिक शोषण के बाद उसकी लाश मिलती है जिसकी गवाह अकेली बिरजू की बहू है। चौधरी का नौकर जगेसर को हवेली के अंदर चल रहे कुचक्र, शोषण और अमानवीयता की भनक तक नहीं है। घर से बेघर कर दिए गए बिरजू की बहू और दलित जगेसर की आत्मीयता के बीच से एक नयी सामाजिकता का समीकरण निकल कर बाहर आता है। यही सामाजिकता दलित आंदोलन और दलित लेखन की सामाजिकता है। यह सामाजिकता यह दिखाती है कि ‘चौधरी’ और उसकी  की हवेली सुरक्षा का घर नहीं जिंदगी बर्बाद का घर है। ‘आदमी नहीं, जंगली जिनावर है।’ जहां स्त्रियां सुरक्षित नहीं है। और वह कहती है कि (बिरजू की बहू) ‘‘यह सुनसान जंगल हवेलियों से ज्यादा सुरक्षित है। कम से कम भेड़िए आवेंगे तो रंग-रूप बदल के तो ना आवेंगे।’’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि, सलाम, वही पृ0 101) बिरजू की बहू का यह कथन भारतीय सामाजिक संरचना में सबसे ज्यादा सुरक्षित कही जाने वाली जगह-घर के संदर्भ में स्त्री असुरक्षा के प्रष्नों को उजागर करती है।

जयप्रकाश कर्दम की कहानी ‘बिट्टन मर गई’ में कायस्थ परिवार की बेटी बिट्टन की विवषता, जाति की निस्सारता और निरर्थकता में उसकी जिंदगी की बर्बादी की कहानी है। बिट्टन की शादी अनजाने में ही उनके पिता के परिचित के कार्यालय में कार्यरत दलित युवक को सजातीय समझ कर बड़ी धूमधाम से हो जाती है, लेकिन बाद में सच्चाई का पता चल जाने पर बिटटन के माता-पिता लड़की को पति के घर नहीं भेजतेे। ‘‘नहीं ,बिट्टन तुम्हारे साथ नहीं जाएगी। वह तुम्हारी कुछ नहीं लगती हमारा कोई रिष्ता नहीं है तुम्हारे साथ।’’(जय प्रकाष कदर्म, तलाष कहानी संग्रह, पृ0 69) बिट्टन की मां की इस कथन में एक स्त्री नहीं एक जाति की जड़ता बोलती है। स्त्री सच में एक स्त्री होती है तो वह स्त्री के दर्द, दुःख, पीड़ा आदि को समझती लेकिन ऐसा होता नहीं है। अतंतः वह घर में ही घूट-घूटकर मर जाती है। कहानी के नायक विकास के इस कथन ‘‘ मर गई या मार दी गई जो भी हुआ हो। पर बिट्टन तो उसी दिन मर गई थी जब जाति के कारण उसके मां-बाप ने उसको ससुराल न भेजकर उसकी जिंदगी को मछली की तरह तपते रेगिस्तान में झुलसकर मर जाने के लिए छोड़ दिया था।’’ (वही पृ 78) में दलित कहानी की सामाजिकता को समझा जा सकता है।  यहां एक सवर्ण स्त्री की वेदना को दलित संवेदना के माध्यम से समझा जा सकता है। किस प्रकार जाति व्यवस्था का दंश झेलती हुई बिट्टन अपनी जिंदगी समाप्त कर लेती है । यहां एक बात और गौरतलब है कि भारतीय समाज के ब्राह्मणवादी मानस में मानव की जिंदगी का मूल्य उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि जाति का मूल्य। डॉ. राम चंद्र के षब्दों में ‘‘दलित साहित्य की सीमाओं को रेखांकित करने वाले हिंदी के आलोचकों को गैर दलित जीवन संदर्भों से जुड़ी दलित कहानियों में अभिव्यक्त वेदना, पीड़ा और सरोकारों को समझने की जरूरत है।’’(पक्षधर पृ 67)

मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘आवाजे’ दलित चेतना की आवाजें हैं। वह भारतीय समाज मेें दलितों की स्थिति और उनकी दुदर्शा को अभिव्यक्त करती है। जातिगत वर्चस्व के विरोध में दलित चेतना की आवाजें इस कहानी में व्यक्त हुआ है।  मकदूमपुर गांव के ठाकुरों की लाख कोषिषों के बावजूद जब दलित समाज अपनी पुष्तैनी कार्यकाम को छोड़कर आत्मसम्मान और स्वाभिमान की जिंदगी जीने की कोषिष करता है तो यह ठाकुरों को सहन नहीं होता है और वह अंततः दलित बस्ती को जला देता है। बस्ती सन्नाटा में डूब जाती है लेकिन यह सन्नाटा नई चेतना के साथ जागती है और ठाकुर औतार सिंह जैसे ब्राह्मणवादी मानसिकता की साजिष को नकाम करती है-‘‘फिर सन्नाटे को चीरती हुई कुछ आवाजें  जहां लोग गीली आंखें लिए आकाश की ओर निहार रहे थे, वहीं नई पौध की आंखों में परिवर्तन के लिए अटूट विश्वास था। कल तक जो बच्चे जूठन पर लड़ते-झगड़ते थे उनके मन में कुछ कर गुजरने की चेतना जन्म ले चुकी थी।’’ (मोहनदास नैमिशराय, आवाजें,  पृ0 24)

जातिगत पेषे से मुक्ति की कहानी कहती है सूरजपाल चौहान की कहानी ‘परिवर्तन’ । रघु ठाकुर की मरी गाय को उठाने-हटाने की घटना क्रम में दलितों और गैर दलितों के संघर्शों को समझा जा सकता है। आष-पास के वातारण में मुक्ति आंदोलन की लहर और प्रतिरोध के स्वर की गूंज सुनी जा सकती है। किसना के कथन में -‘‘क्या आप यही चाहते हैं कि हम जीवन भर गांव के मरे जानवर की उठाते रहें। अब समय बदल रहा है, लोग अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर दूसरे कार्य करने लगे हैं। हम दूसरा अन्य कोई भी काम कर अपना पेट भर लेंगे, लेकिन मरा जानवर नहीं उठायेंगे।’’ (सूरजपाल चौहान, हैरी कब आएगा, पृ 21)  दलित मुक्ति आंदोलन और तथाकथित ब्राह्मणवादी सोच, दृश्टिकोण को देखा जा सकता है। समय, स्थान और परिवेष के अनुसार दलित उत्पीड़न, षोशण, अन्याय, अत्याचार आदि बदल जरूर गया है लेकिन समाप्त नहीं हुआ है। इसी संदर्भ में नगर, कस्बा में रहने वाले दलितों की समस्याओं को समझा जा सकता है। जहां स्थितियां भिन्न जरूर दीखती है अलग नहीं। दलित कहानियां ऐसी मनोवृत्तियों का विरोध करती है। उसके प्रति मनुश्य में संवेदनशीलता और जागरूकता पैदा करती है।

डॉ राम चंद्र ने हिन्दी दलित कहानी की संवेदना और सरोकारों को स्पश्ट करते हुए लिखा है कि ‘‘दलित कहानी रिरियाहट, याचना एवं निरीहता को पूरी तौर पर नकारती है। यहां वेदना का आक्रोश में रूपांतरण है। धर्म और संस्कृति की पवित्रता को चिन्हित कर नैतिकता और आदर्श के मानदंडों को दलित कहानी तोड़ती है। नए मानदंड और सौन्दर्य बोध का सृजन दलित कहानी के साहित्यिक सरोकार हैं। घृणा और हिंसा के स्थान पर समता, करूणा और भ्रातृत्व का भाव दलित कहानी के सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार हैं। यही दलित कहानी की वैचारिक प्रतिबद्धता भी है। वर्ण-जाति आधारित व्यवस्था का पूर्णतः खात्मा और ईश्वर का नकार दलित कहानी का मुख्य उद्देश्य है। व्यवस्था के क्रूरतम चेहरे को बेनकाब कर नियतिवाद से मुक्त करना दलित कहानी की जिम्मेदारी हैै।’’ (हिन्दी दलित कहानीः संवेदना और सरोकार, पक्षधर, अंक 12 पृ 72)यहीं से दलित कहानियां अपनी वैचारिकता की सामाजिकता सिद्ध करती है। जहां परिवर्तन की लगातार संभावना है और उसकी कवायद भी।

दलित कहानियां जातिगत समस्याओं के साथ-साथ उपजाति के सवाल को भी उजागर करती हैं। यह वैचारिकता दलित लेखकों के साथ-साथ दलित आंदोलन की सामाजिकता को मजबूती प्रदान करती है। ओम प्रकाश वाल्मीकि की ’शवयात्रा‘ कहानी ऐसी ही कहानी है जिसमें दलित समाज के अंतर्विरोध और अम्बेडकरवादी चेतना की ढोंग को बेनकाब किया गया है। यह कहानी आत्मलोचन को रेखांकित करती है। दलित साहित्य आंदोलन की मजबूती उसकी वैचारिकता प्रतिबद्धता, चेतनषीलता तथा समाजिकता में निहित है। ओम प्रकाश वाल्मीकि की कहानी ’मुम्बई कांड‘ में दलित आंदोलन की वैचारिक प्रतिबद्धता स्पश्टतः देखी जा सकती है। जहां प्रतिरोध और प्रतिषोध का फर्क स्पश्ट दीखता है और दलित साहित्य प्रतिषोध का नहीं, प्रतिरोध का साहित्य है यह स्थापना करती है। सुमेर का आत्मालोचन उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता को ही रेखांकित करता है। ”अरे! मैं यह क्या कर रहा हूँ। मुंबई में किसी ने मेरे विश्वास पर चोट की और मैं यहाँ किसी की आस्था पर चोट करने जा रहा हूँ। कुछ गांधी को ’बापू‘ कहते हैं और कुछ अम्बेडकर को ’बाबा‘; वहाँ ’बाबा‘ कहने वाले मारे गए, यहाँ बापू वाले मारे जा सकते हैं। ’बाबा‘ कहने वालों पर भी गाज गिर सकती है। जो भी हो मारे तो निर्दोष ही जाएँगे..... नहीं..... यह रास्ता न बुद्ध का है और न ही अंबेडकर का।“ डॉ. राम चंद्र की कहानी ‘बयार’ दलित साहित्यांदोलन की वैचारिकता, उसकी प्रतिबद्धता और उसकी सामाजिकता को बेवाक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कहानी जीवन में प्रकृति, प्रेम और वैचारिकता का समन्वित स्वरूप स्थापित करती है।

जय प्रकाश कर्दम की कहानी ‘नो बार’ जाति के उस तिलिस्म को तोड़ती है जो विज्ञापन की दुनिया में जाति भेद को नहीं मानते लेकिन व्यावहारिक जीवन में जाति का संस्कार कितने गहरे स्तर पर रच-बस गया है, यह शादी के वक्त उजागर होता है। ‘‘बेटी एक बात तो बताओ।’ क्या पापा? इस लड़के की कास्ट क्या है? आई कान्ट से पापा। मैंने उससे कभी पूछा ही नहीं।’ ...‘पर क्यों पापा, जब हम जाति-पांित को मानते ही नही ंतो फिर वह किसी भी कास्ट का हो उससे क्या फर्क पड़ता है।’ लड़की ने बड़ी सहजता से कहा। ‘ वह सब तो ठीक है हम जाति-पांति को नहीं मानते और हमने मैट्रीमोनियल में ‘नो बार’ छपवाया था। लेकिन, फिर भी कुछ चीजें तो देखनी ही होती हैं। आखिर ‘नो बार’ का यह मतलब तो नहीं कि किसी चमार-चूहड़े के साथ...।’’ (जय प्रकाश कर्दम, तलाश, पृ0 45)‘तलाश’ कहानी  एक ऐसी कहानी है  जिसके दलित पात्र को एक ऐसे मकान की तलाश है जहां सहज सामान्य ढंग से रहा जा सके। कमलेश्वर के शब्दों में, ‘‘कहानी के नायक रामवीर सिंह को केवल किराये के मकान की तलाश नहीं है । उसे ऐसे घर की ‘तलाश’ है जहां अपनापन हो, ऐसे समाज की तलाश है-जहां जाति का विभेद न हो।’’ (वही पृ0 15) वहीं महेन्द्र बेनीवाल के अनुसार ‘‘वर्तमान दलित कहानी ने आक्रामता से ही मुक्ति नहीं पाई है बल्कि उसमें आक्रोष भी संयम में ढलकर नव आकार ले रहा है। (महेन्द्र बेनीवाल, समकालीन हिन्दी दलित कहानी, कथादेष, मार्च 2012, पृ 42)

सूरज बड़त्या की कहानी ‘कामरेड का बक्सा ’भारतीय मार्क्सवाद की षिनाख्त करती है। मार्क्सवादी आंदोलन में रहते हुए दलित समाज का जो अनुभव है वह यह कहानी बयान करती है। सूरज लिखते हैं कि ‘‘ यह दीवार की गड़ब ड़ी थी या विचारों की कुछ समझ में नहीं आता था।’ यहां विचारधारा को लेकर कई दिक्कतें हैं। समस्या वहां होती है जब मार्क्सवाद और ब्राह्मणवाद में मिश्रण होता है या मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद का मिश्रण सतही ढंग से होता है। विचारधारा सामाजिक संरचना के अनुसार ही निर्मित होती है तब विचारधारा सामाजिक समस्याओं का हल आसानी से ढूंढ सकती है। भारतीय सामाजिक संरचना के अनुसार पहले अम्बेडकरवादी विचारधारा की प्रमुखता बनती है फिर मार्क्सवादी विचारधारा की। प्रो चौथीराम यादव ने सही ही लक्ष्य किया है कि भारत में मार्क्सवाद को बाया अम्बेडकरवाद से होकर गुजरना होगा।यूँ भी कह सकते हैं कि भारत में वर्ण-धर्म-जाति का सवाल पहले है उसके बाद ही वर्ग का सवाल आता है. इस सन्दर्भ में यह भी समझने की जरुरत है कि यह अर्थ भी वर्ण-धर्म-जाति से नियंत्रित एवं संचालित है. जिसके कारण वर्ग की धारणा ही बन पाती है.

निष्कर्ष : दलित कहानियां भारतीय समाज की वर्णासत्तावादी व्यवस्था ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद की जमीनी हक़ीकत को प्रस्तुत करती हैं।दलित कहानियों की सामाजिकता कहानी की कथावस्तु में व्यक्त समस्याएं, दो टूक भाषा में अभिव्यक्त संवेदना, उसकी ऐतिहासिकता, स्त्री-पुरुष सह-सम-संबद्धता, परिवर्तनकामी वैचारिकता-‘बुद्ध, फुले-अम्बेडकर का दर्शन एवं संघर्ष तथा समतापरक सामाजिक-व्यवस्था की स्थापना में निहित है। यही ब्राह्मणवादी साम्राज्यवाद से मुक्ति का दर्शन है और भारतीय समाज के विकास का विकल्प भी. दलित कहानी की संवेदना, उसकी सामाजिकता न केवल भारतीय सामाजिक व्यवस्था की यथास्थिति की जड़ता को तोड़ती है बल्कि अपनी वैचारिकता के आधार पर समतापरक समाज के निमार्ण का विकल्प प्रस्तुत करती है।

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