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लोकतान्त्रिक अकादमिक हत्या - कैसे , क्यों और कहाँ ?

यह एक विकट समय है जिसमें लोगों को बोलना दूभर हो गया है . यह सब एक ऐसे देश में हो रहा है जो दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है . लोकतंत्र के सभी तत्व ख़त्म हो नज़र आ रहा है , जो कुछ बचा है . वह सिर्फ नाम के लिए बचा है . जिसका मतलब है आप शनैः शनैः लोकतंत्र से दूर हो रहे है और लोकतंत्र के नाम पर राजशाही का अभ्यास किया जा रहा है . यह अचानक नहीं हो रहा है बल्कि एक सुनिश्चित ढंग से धीरे-धीरे किया जा रहा है . इसमें मीडिया और प्रशासनिक तंत्र का हिटलर शाही रूप काम कर रहा है. यही दोनों ऐसा तत्व है जिसके माध्यम से लोकतंत्र को व्यावहारिक तौर पर अंजाम दिया जाता रहा है . लेकिन यह तंत्र पूर्णतः नौकरशाही का हुकुम बजा रहा है . किसी नेता और राजनेता को यह नहीं मालूम होता है कि कैसे विभाग को चलाया जाए , अपवाद को छोड़ दें तो . सब कुछ प्रशासनिक तंत्र ही करता है. मगर क्या किया जाए ? जिस देश में प्रशासनिक तंत्र अपने चंद स्वार्थ और कुछ मजबूरी में: सिर्फ नेताओं और राजनेताओं की हुकुम को आँख बंद कर पालन करते हैं . न्याय तंत्र भी अब पूरी तरह से राजनेताओं की गिरफ्त में दिख रहा है, जहाँ किसी गरीब को न्याय नहीं मिलत...

बौद्ध पूर्णिमा की हार्दिक मंगल कामनाएं!

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  आज बौद्ध पूर्णिमा है . इतिहास में यह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है . क्या यह महज़ संयोग है कि बुद्ध का जन्म, बुद्धत्व और महा परिनिर्माण बैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ . डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन के अनुसार तथागत गौतम बुद्ध का जन्म और बुद्धत्व पीपल के पेड़ के नीचे और महापरिनिर्माण दो शाल बृक्षों के नीचे है. इसलिए बौद्ध संस्कृति में इन दोनों वृक्षों का विशेष महत्व है. प्रकृतिमय जीवन का वचन संभवत: इसी से आया है . बौद्ध संस्कृति में लुम्बिनी , बुद्ध गया और कुशीनगर यह सबसे पवित्र स्थल माना गया है . गौतम बुद्ध ने इस बात पर बल दिया है कि जो कुछ भी कर्म किया जाये उसमें बहुजन की कल्याण की बात हो .  "चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, अत्थय हिताय देवमनुस्संनम| देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्यानं मज्झकल्याणम परियोसान कल्याणम सात्थं सव्यज्झनं ब्रह्म चरियं पकसेथ" अर्थात हे भिक्षुओं बहुत जनों के हित के लिए , बहुत जनों के सुख के लिए धर्मोपदेश देते हुए विचारों| भिक्षुओं ऐसे धम्म का उपदेश दो, जो आदि में कल्याण कारक हो, मध्य में कल्याण कारक हो और अंत में कल्याण कारक हो | भिक्षुओं शब्दों औ...

मुक्तिबोध: आलोचना कर्म और आलोचक की दृष्टि( यह साहित्य सेतु पत्रिका में प्रकाशित है ugc केयर लिस्ट 2020)

  मुक्तिबोध: आलोचना कर्म और आलोचक की दृष्टि प्रवीण कुमार pravinkmr05@gmail.com   सारांश : प्रस्तुत आलेख मुक्तिबोध के आलोचना कर्म और उनकी आलोचना दृष्टि पर आधारित है. इस आलेख में यह समझा जा सकता है कि मुक्तिबोध ने हिंदी आलोचना को सभ्यता-समीक्षा क्यों कहा है? कैसे उनकी यह आलोचना दृष्टि दमनकारी सत्ता की जगह आम आदमी की वालालत करती है? उनकी आलोचना दृष्टि को लेकर विद्वानों की राय क्या है ? इसकी भी पड़ताल की गई है. बीज शब्द : मुक्तिबोध, सभ्यता-समीक्षा, हिंदी आलोचना, ज्ञानात्मक संवेदना, संवेदनात्मक ज्ञान विषय विस्तार: मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के इतिहास में कवि-आलोचना की दुनिया में सबसे सशक्त हस्ताक्षर रहे हैं। उन्होंने अनुभूति से अभिव्यक्ति के सृजन-सर्जना संसार में अभिव्यक्ति के खतरे को उठाया है। आज जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार कुठाराघात किया जा रहा है. इसकी पूरी पृष्ठभूमि से मुक्तिबोध बहुत ही पहले अवगत थे। भारतीय समाज में मनुष्य की आजादी की गला घोंटने के लिए पुरानी सामाजिक संरचनाओं , विचारधाराओं , मिथकमालाओं , मानसिकताओं और इतिहास की प्रक्रियाओं का जिस तरह से स...

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद (पंडित दीनदयाल उपाध्याय चिंतन के विविध आयाम सं प्रो. संध्या गिहर में प्रकाशित है )

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