लोकतान्त्रिक अकादमिक हत्या - कैसे , क्यों और कहाँ ?
यह एक विकट समय है जिसमें लोगों को बोलना दूभर हो गया है . यह सब एक ऐसे देश में हो रहा है जो दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है . लोकतंत्र के सभी तत्व ख़त्म हो नज़र आ रहा है , जो कुछ बचा है . वह सिर्फ नाम के लिए बचा है . जिसका मतलब है आप शनैः शनैः लोकतंत्र से दूर हो रहे है और लोकतंत्र के नाम पर राजशाही का अभ्यास किया जा रहा है . यह अचानक नहीं हो रहा है बल्कि एक सुनिश्चित ढंग से धीरे-धीरे किया जा रहा है . इसमें मीडिया और प्रशासनिक तंत्र का हिटलर शाही रूप काम कर रहा है. यही दोनों ऐसा तत्व है जिसके माध्यम से लोकतंत्र को व्यावहारिक तौर पर अंजाम दिया जाता रहा है . लेकिन यह तंत्र पूर्णतः नौकरशाही का हुकुम बजा रहा है . किसी नेता और राजनेता को यह नहीं मालूम होता है कि कैसे विभाग को चलाया जाए , अपवाद को छोड़ दें तो . सब कुछ प्रशासनिक तंत्र ही करता है. मगर क्या किया जाए ? जिस देश में प्रशासनिक तंत्र अपने चंद स्वार्थ और कुछ मजबूरी में: सिर्फ नेताओं और राजनेताओं की हुकुम को आँख बंद कर पालन करते हैं . न्याय तंत्र भी अब पूरी तरह से राजनेताओं की गिरफ्त में दिख रहा है, जहाँ किसी गरीब को न्याय नहीं मिलत...