औपनिवेशिक शासनसत्ता से मुक्ति और राष्ट्रीय आन्दोलन

 

औपनिवेशिक शासनसत्ता से मुक्ति और राष्ट्रीय आन्दोलन 

राष्ट्रीय आन्दोलन का सीधा सम्बन्ध राष्ट्र की मुक्ति की अवधारणा से है। इस सन्दर्भ में राष्ट्र की निर्मिति और उसके स्वरुप पर विचार करना अनुचित नहीं होगा। "राष्ट्र (रावत: 242)एक ही राजनैतिक व्यवस्था के अंतर्गत स्वेच्छा से रहने या रहने का प्रयत्न करने वालों का एक ऐसा सांस्कृतिक समुदाय है जो सामान नैतिक भावनाओं के शक्तिशाली सूत्रों द्वारा आवद्ध होता है। भौगोलिक और आर्थिक एकता, एक भाषा तथा समान इतिहास एक राष्ट्रीयता की पूर्व दशाएं अवश्य हैं, किन्तु राष्ट्र निर्माण के लिए ये पर्याप्त नहीं हैं । राष्ट्र बनता है लोगों की राष्ट्र बनाने की आम नैतिक भावना से।" अब यहाँ से जरा ठहर कर विचार करने की जरुरत है। भारत एक राष्ट्र के रूप में कब अस्तित्व में आया? तब, क्या इन विचारों को देखा गया? निश्चय ही यह अवधारणा राष्ट्रीय आन्दोलन के समय निर्मित होती है और भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन राष्ट्रीय भावनाओं और चेतनाओं के साथ राष्ट्रीय मुक्ति की विचारधाराओं के साथ आगे बढता है और 1950 में एक संप्रभु सम्पन्न राष्ट्र के तौर पर अपना स्वरुप निर्मित एवं विकसित करता है। इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय आन्दोलन ने भारतीय समाज के इतिहास, इतिहासबोध और समाज के जनमानस के मनोविज्ञान से गहरा ताल्लुक रखा और समाज को राष्ट्रीय मुक्ति हेतु आंदोलित किया। भारतीय राष्ट्रवाद क्या है और उसका निर्माण कैसे हुआ। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय हमारे महापुरुषों ने राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रीय भावनाओं को लेकर क्या-क्या मत रखा है और राष्ट्रीय आन्दोलन को कैसे निर्मित और विकसित किया है ।  इसे दोहराना यहाँ संभव नहीं है। इसके लिए सिर्फ एस इरफान हबीब की सम्पादित पुस्तक 'इंडियन नेशनलिज्म: द एसेंशियल रेटिंग्स' जिसका हिंदी अनुवाद 'भारतीय राष्ट्रवाद एक अनिवार्य पाठ' शीर्षक से प्रकाशित है, को यदि पढ़ लिया जाये तो राष्ट्रीय आन्दोलन की निर्मिति की कहानी और उसकी विचारधारा सहित उसके स्वरुप को समझा जा सकता है, क्योंकि इस पुस्तक में महादेव गोविन्द रानाडे, सुरेन्द्र बनर्जी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल, श्री अरबिंदो, अल्लामा इक़बाल, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, रवीन्द्रनाथ टैगौर, सरोजिनी नायडू, प्रफुल्ल चन्द्र राय, महात्मा गाँधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरु, बी आर आंबेडकर, सी राजगोपालाचारी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, एम.एन रॉय , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, ख्वाज़ा अहमद अब्बास, जयप्रकाश नारायण तक के विचारों को समेटने का काम किया है. उन्होंने लिखा है कि "इन स्वरों ने यद्यपि विविध प्रस्थान बिन्दुओं से राष्ट्रवाद को परिभाषित किया था, बावजूद सभी एक नतीजे पर पहुंचे कि भारतीय राष्ट्रवाद मूलतः समावेशी और बहुलतावादी है तथा अपने इस चरित्र पर उसे नाज़ है"। (हबीब: 14)

राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्ष्य ही था औपनिवेशिक दासता से भारत की मुक्ति । यूँ तो मुक्ति का मतलब ही रहा है दासता के बन्धनों को तोड़ना । राष्ट्रीय आन्दोलन के देशकाल और परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह कहा जा सकता है कि मुक्ति की इस अवधारणा में 'स्व', 'समाज' और 'राष्ट्र' तीनों ही रूपों में मत भिन्नता के बावजूद एक समानता थी और राष्ट्रीय मुक्ति के क्षेत्रप में आन्दोलन निरंतर मुक्तिकामी रहा। इस मुक्तिकामी आन्दोलन में साहित्य की अपनी भूमिका रही है और साहित्य ने अपनी प्रकृति को राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन का वाहक बनाया। इसी कड़ी में राष्ट्रीय साहित्य और राष्ट्रवाद की अवधारणा जन्म लेती है। जिसका विस्तार समय-सापेक्ष आज भी देखा जा सकता है। राष्ट्रीय साहित्य में भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों को समझा जा सकता है। यूँ भी कह सकते हैं कि उस दौर के साहित्यकारों ने जिस मुक्तिकामी चेतना और संवेदना को जनमानस में उद्वेलित करने का प्रयत्न किया; उसमें नवजागरण, स्वदेशप्रेम, देशभक्ति, भारतीयता, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद आदि की भावनाओं का विचार प्रबल रूप में मिलता है। उसमें भारत की स्थिति और प्रस्थिति को दर्शाने हेतु अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों देशकाल में देशवासियों की स्थिति, परिस्थिति और मनोभाव का चित्रण है। इस सन्दर्भ में लाल बहादुर वर्मा का विचार बहुत मार्मिक है कि भारत की ऐतिहासिकता में प्राचीन काल से ही मुक्ति के प्रेरक तत्त्व विद्यमान रहा है जोकि तत्कालीन औपनिवेशिक शासनसत्ता के खिलाफ भारतीय गर्व-गौरव के लिए अनिवार्य पहलू रहा है । इसलिए उस दौर में राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े लोगों ने अतीत की ओर झांककर अपनी शक्ति अर्जित करने का प्रयास करते हैं। "प्राचीन कल में ही जन्मे धर्मों में एक खास तरह की मुक्ति की बात दिखाई पड़ती है। भारत में उसे मोक्ष या निर्वाण कहा गया । इस तरह की मुक्ति को कुलमिलाकर आध्यात्मिक ही कहा जा सकता है, पर यह भी सच है कि प्राचीन काल में ही स्पार्टाकस ने इटली में मुक्ति के लिए विद्रोह किया था। उसकी मुक्ति की कामना कैसी थी?" उनकी मुक्ति थी दासता से मुक्ति। यह दासता राजनीतिक से लेकर आध्यात्मिक तक अनेक आयामों में रही। मुक्ति का मतलब ही है दासता के बंधनों को तोड़ना। विडंबना यह है कि दासता का एक रूप ख़त्म होता है तो कई अन्य स्वरुप निर्मित हो जाते हैं । वर्मा कहते हैं कि "आज का मनुष्य जितना मुक्तिकामी है उतना पहले कभी नहीं था पर यथार्थ यह है की मनुष्य आज जितना दास है उतना पहले कभी नहीं था" (वर्मा:12 ) क्या हमारा वर्तमान ऐसा ही है? यदि हाँ , तो हमें राष्ट्रीय आन्दोलन की जड़ में अपनी मुक्ति की तलाश करनी चाहिए ? क्योंकि भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन ने ही भारतवासियों को औपनिवेशिक शासनसत्ता की दासता से मुक्त कराया है। हमारा वर्तमान क्या हमें पूंजीवाद की चंगुल में दिन-प्रतिदिन नए सपनों के साथ जकड नहीं रहा है? क्या यह सच नहीं कि पूंजीवाद धर्म और सत्ता के माध्यम से हमारे मन–मस्तिष्क को नई गुलामी का अभ्यास करा रहा है? कंप्यूटर, परमाणु हथियार, और अन्य आधुनिक उपकरण जो आत्मनिर्भरता की ओर ले जाने के प्रयास के निमित्त तैयार किया है । क्या यह हमें और ज्यादा निर्भर नहीं बना रहा है? क्या हमारी आत्मनिर्भरता इन्हीं पर निर्भर नहीं हो गई है? लालबहादुर वर्मा के शब्दों में कहें तो आज आज़ादी की जरुरत पहले से कहीं ज्यादा है। (वर्मा:17)यहीं से राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना और मुक्ति की अवधारणा को महसूस करने की जरुरत सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगती है। नहीं तो आज़ाद भारत में आजादी एक विडम्बना के सिवाय और कुछ होगा। क्योंकि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था धर्म और सत्ता के माध्यम से ऐसा ही संकेत दे रही है जो युवाओं को एक तरफ मुंगेरी लाल के हसीन सपनों को दिखा रहा है तो दूसरी तरफ अतीत के मोहपास में जकड़ रही है। हमारे राष्ट्रीय आंदोलन ने हमें अतीत की ऊर्जा से वर्तमान को संवारने की नीति और मुक्ति की चेतना दिया है। उन्हीं के शब्दों में:

"मुक्ति की अर्थवत्ता तो यही है कि मनुष्य में विवेक, न्यायबोध, और सौन्दर्यबोध का संचार करे ताकि एक की मुक्ति दूसरे की दासता का कारण न बने। ऐसी मुक्ति का आधार आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक होगा। यह सब हो जाने के बाद भी बहुत कुछ मनोविज्ञान के स्तर पर होना शेष रहेगा और तब जाकर मुक्ति नैतिक स्तर पर न्यायसंगत हो पाएगी यानी मुक्ति तब वास्तव में चरितार्थ होगी जब मानव को मुक्ति से भी मुक्ति मिल जाये, यानी मानव के लिए मुक्ति की एक सहज स्थिति-परिस्थिति बन जाएगी, उसकी अलग से कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी। वह नैसर्गिक हो जाएगी। "वह कैसा संसार होगा जब मुक्ति नैसर्गिक व्यव्हार बन चुकी होगी, तभी सभी बंधन मुक्त होंगे।" (वर्मा :160) बालगंगाधर तिलक का यह कथन –'आज़ादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' और रूसो का कथन 'मनुष्य जन्मना मुक्त है'।

उपर्युक्त तथ्यों एवं विचारों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि औपनिवेशिक शासनसत्ता के दौर में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यकर्त्ताओं ने मुक्ति के लिए यदि एक तरफ राजनीतिक आंदोलन का राष्ट्रीय स्वरुप निर्मित किया तो दूसरी ओर भारतीय जनमानस में मुक्ति की सहज स्थिति की अनुकूलता को भी पैदा किया। राष्ट्रीय आंदोलन के देशकाल में सृजित साहित्य की संवेदना और उसका सौन्दर्यबोध मुक्तिकामी चेतना की है। इसी कड़ी में माखनलाल चतुर्वेदी के रचना संसार को समझने का प्रयत्न है । क्या राष्ट्रीय आंदोलन की मुक्तिकामी चेतना से आप्लावित है और वैसी ही रसधारा उनके साहित्य में बह रही है? साहित्य और आंदोलन का अन्योन्य संबंध है। साहित्य में निहित समाज के लिए आंदोलन ऑक्सीजन के समान है। इसी आंदोलन से साहित्य में गतिशीलता आती है। बिना गतिशील हुए बिना आंदोलन की सार्थकता नहीं रेखांकित किया जा सकता है। मेरी जानकारी के अनुसार आघुनिक काल में ही भारत में आंदोलन की शुरूआत होती है। इससे पूर्व आंदोलन का कोई इतिहास नहीं है। निश्चय ही इस स्थिति में जब पहली बार आंदोलन की शुरूआत होती है तो उसकी बहुत सी कमियां रहती हैं लेकिन धीरे-धीरे वह दूर कर लिया जाता है या दूर करने का प्रयास किया जाता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलन की शुरूआत हुई और भारतीय साहित्य में उसकी अनुगूंज में सुनाई पड़ती है। हिन्दी साहित्य इससे अछूता नहीं रहा। 

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