शिक्षा: चिंतन और दर्शन
शिक्षा और शिक्षण संस्थान किसी भी देश के विकास के मॉडल को प्रस्तुत करता है। और उस देश की सरकार के दर्शन और चिंतन की ऊँचाई को बताता है। वह मानव होने का जिन्दा प्रणाम होता है और मानुष तत्व को संजोते हुए सभ्यता संस्कृति का परिचायक होता है। jnu निश्चित ही एक ऐसा संस्थान है जिससे देश की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरष्ट्रीय स्तर पर है। भारत और भारत सरकार के विकास योजना को लागू करने में jnu का अपना योगदान है। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। jnu हमेशा तर्क, वैज्ञानिक सोच, चिंतन और संवाद-विमर्श के साथ साथ सवालों , विरोध और विचारों के जाना जाता है। हिंसा की बारदात पहली बार ही सुना है। हिंसा की संस्कृति विकास और अमानुषता की संस्कृति है। यह कभी भी और कहीं भी हो उसे उचित तो नहीं कहा जा सकता है। jnu में हिंसा एक शिक्षण संस्थान की संस्कृति के खिलाफ है। यह किसी भी संस्थान के लिए सही नहीं है बल्कि यह संस्थान के प्रशासन, उसकी सुरक्षा व्यवस्था की गलती के साथ साथ सरकार की व्यवस्था की चूक है कि वहां हिंसा की बारदात हुई। आखिर सवाल उठना लाज़मी है कि जहाँ साधारण व्यक्ति नहीं जा सकता है वहां ये असामाजिक तत्व कैसे लाठी रॉड और अन्य हिंसात्मक चीजों के साथ घुसता है और तांडव मज़ा कर बाहर निकल जाता है जबकि पुलिस गेट पर तैनात हैं।
एक सवाल इस संदर्भ में मन में हिलोर ले रहा है आखिर सस्ते दर पर वहां के शिक्षार्थी शिक्षा ही तो मांग रहे थे फिर ऐसी हिंसा क्यों? क्या हिंसा करने वालों को यह नहीं लगा कि हमे भी सस्ती और अच्छी, ऊँची शिक्षा लेनी चाहिए। किसके इशारे पर ये युवा कलाम किताब की जगह हिंसात्मक चीज हाथों में उठाया है!
शिक्षण संस्थानों में ऐसी हिंसा से हम विश्वगुरु बन जायेंगे। या फिर अपने देश की हर एक नागरिक की शिक्षा, ऊँची शिक्षा और चिंतन दर्शन से बनेंगे। क्या हमारी और भारत सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं कि युवा को सस्ती, अच्छी और ऊँची शिक्षा और वैज्ञानिक तथा इंसानियत की शिक्षा मिले।
इसी क्रम में यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि हर मातापिता को अपने बच्चों से नहीं पूछना चाहिए कि तुम हिंसा की हिस्सा कैसे बने? तुम्हे तो पढ़ने लिखने भेजा था और इस वक्त तुम्हे पुस्तकालय में होनी चाहिए थी। तुम कैसे हिंसा की भीड़ में शामिल हो गए?
हिंसा को कभी भो उचित नहीं कहा जा सकता है।
हिंसा को अंजाम से विश्वगुरु नहीं बन सकते हैं
सोचिये, विचारिये और आइये मिलकर बुद्ध धरती से एक बार फिर मानवता की शिखर पर पहुंचे।
@प्रवीण कुमार
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