लोकतान्त्रिक अकादमिक हत्या - कैसे , क्यों और कहाँ ?

यह एक विकट समय है जिसमें लोगों को बोलना दूभर हो गया है . यह सब एक ऐसे देश में हो रहा है जो दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है . लोकतंत्र के सभी तत्व ख़त्म हो नज़र आ रहा है , जो कुछ बचा है . वह सिर्फ नाम के लिए बचा है . जिसका मतलब है आप शनैः शनैः लोकतंत्र से दूर हो रहे है और लोकतंत्र के नाम पर राजशाही का अभ्यास किया जा रहा है . यह अचानक नहीं हो रहा है बल्कि एक सुनिश्चित ढंग से धीरे-धीरे किया जा रहा है . इसमें मीडिया और प्रशासनिक तंत्र का हिटलर शाही रूप काम कर रहा है. यही दोनों ऐसा तत्व है जिसके माध्यम से लोकतंत्र को व्यावहारिक तौर पर अंजाम दिया जाता रहा है . लेकिन यह तंत्र पूर्णतः नौकरशाही का हुकुम बजा रहा है . किसी नेता और राजनेता को यह नहीं मालूम होता है कि कैसे विभाग को चलाया जाए , अपवाद को छोड़ दें तो . सब कुछ प्रशासनिक तंत्र ही करता है. मगर क्या किया जाए ? जिस देश में प्रशासनिक तंत्र अपने चंद स्वार्थ और कुछ मजबूरी में: सिर्फ नेताओं और राजनेताओं की हुकुम को आँख बंद कर पालन करते हैं . न्याय तंत्र भी अब पूरी तरह से राजनेताओं की गिरफ्त में दिख रहा है, जहाँ किसी गरीब को न्याय नहीं मिलता है . 'न्याय उधर है जिधर शक्ति है . इसलिए यहाँ भी लोकतंत्र पूरी  तरह से धूमिल नज़र आ रहा है . 

लोकतंत्र का सबसे अच्छा अभ्यास शिक्षण संस्थाओं में किया जाता है, ऐसा कहा जाता रहा है और अभी कहा जा रहा है , लेकिन शिक्षण संस्थानों के वर्तमान स्वरुप को देख कर ऐसा लगता नहीं है कि अतीत में भी यहाँ लोकतंत्र का सही अर्थों में पालन किया जाता रहा होगा , क्योंकि भारतीय आत्मकथाओं में शिक्षण संस्थाओं का जो चित्रण मिल रहा है वह काफी है, शिक्षण संस्थाओं के लोकतान्त्रिक स्वरुप को जानने के लिए. फिर भी यह तो शिक्षण संस्थाओं में जरूर देखने को मिलता रहा है कि वहां शिक्षक लोकतान्त्रिक चेतना को पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे. अभी भी निभा रहे हैं  और समाज एवं  राष्ट्र में लोकतंत्र का मिशाल पेश करते रहे हैं . वर्तमान में यह देखा जा रहा है और आप इसे स्वयं भी देख सकते हैं , महसूस कर सकते हैं कि शिक्षक अब लोकतान्त्रिक चेतना को पैदा करने की जगह सिर्फ पाठ्यक्रम के चीजों को किसी तरह पढ़ा कर अपना फ़र्ज़ पूरा कर रहा है और  करता हुआ दिख रहा है.वह अपना अधिकतर समय शोध और नवीन ज्ञान हाशिल करने की जगह नेताओं और राजनेताओं की चापलूसी करने में लगा रहे हैं , जबकि होना यह चाहिए कि राजनेता और नेता शिक्षक के पास आतें और अपनी समस्याओं  के निदान की राय जानते. एक वक्त ऐसा होता रहा होगा और आज भी कुछ लोग ऐसे कर रहे होंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. परन्तु वर्तमान में इसका अभाव दिख रहा है. शिक्षक अपने स्वार्थ और अपनी महत्वाकांक्षा की आपूर्ति  हेतु अपने कर्तव्यच्युत होकर अध्ययन , अध्यापन और अनुसन्धान की जगह नेताओं के भाषण  लिखने, उनके बच्चों की इच्छापूर्ती करने , उनके बच्चों को गलत तरीके से नामांकन करने , उन्हें अनुचित तरीके से नंबर देकर  पास करने आदि करके प्रशासनिक कार्यों में भागीदारी करने और कराने का प्रयत्न कर रहे हैं और करते आ रहे है. विचारणीय बात तो यह है कि ऐसा करते हुए वे स्वयं हिचक नहीं करते बल्कि आपने सहकर्मी को भी ऐसा करने की सलाह देते हैं. उसे प्रमोट करते हैं. परिणाम आज आप शिक्षा और अनुसंधान की बदहाल स्थिति को देख सकते हैं . मार्के की बात तो यह है कि जो शिक्षक सत्ता और सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं तो उनके सहकर्मी ही उनके  खिलाफ होकर उनका नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि उन्हें यह पता होता है वह व्यक्ति सही है और वह जो कुछ कह रहा है वह तथ्यात्मक, तार्किक, वैज्ञानिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुसार कर रहा है . यही से शुरू होती है उस शिक्षक की अकादमिक हत्या. और एक दिन आप ऐसे देखते, सुनते हैं कि उस अमुक शिक्षक के साथ अन्याय हो गया  है . यह अचानक नहीं होता है बल्कि इसकी भूमिका बहुत पहले से बनती रहती है. यह सब होता है ऐसा. जैसे उनकी पदोन्नति रोक दी जाती है , विलम्ब कर दी जाती है .यह सब करते हुए पूरा प्रशासनिक तंत्र जनता है कि वह गलत कर रहा है. मगर क्या किया जाए ?

इस संदर्भ में मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि हमारे देश का प्रशासनिक तंत्र, न्याय तंत्र , शिक्षण संस्था -संस्थान आदि सब के सब अलोकतांत्रिक है और घोर ब्राह्मणवादी तथा अब पूंजीवादी हो गया है . हमारा अतीत सम्राट अशोक और नालंदा, तक्षशिला की प्रशासनिक व्यवस्था , नीति और ज्ञान पद्धति -शिक्षण-अधिगम  के कारण पूरी  दुनिया में सर्वोत्तम रहा है. फिर आज क्यों हमारी शिक्षा व्यवस्था , स्वास्थ्य, जीविका उपार्जन की व्यवस्था, जीवन मूल्यों और मानवीय मूल्यों के संरक्षण आदि में बदहाली महसूस कर रहे हैं ? क्या हम यह महसूस भी कर रहे हैं ? क्या हमने कभी आत्मालोचन किए कि हम क्या कर रहे हैं ? हमसे क्या भूल हुई ? क्या हमने महसूस किया तो अपनी भूल ग़लती सुधार किए? नहीं न! फिर कल क्या होंगे यह भी आपको पता नहीं ? फिर कहाँ होंगे यह तो एक दम ही पता नहीं ?  यही मेरी चिंता है और चिंतन का विषय भी . हमारा साहित्य इसमें हमें मदद कर रहा है . इसका लाभ हमें मिल रहा है और आप भी लाभार्थी हो सकते हैं . 

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